कैसे रावण की मृत्यु का कारण बनी ‘दासी मंथरा’?

रामायण और महाभारत की कहानियां

टीवी धारावाहिक देखने के बाद आजकल हर दूसरे इंसान के लिए ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसी कहानियां काफी बदल गई हैं। यह दोनों कहानियां मूल रूप से तो वही हैं, और उसी प्रकार दिखाई जाती हैं लेकिन हर बार जैसे ही कोई नया टीवी धारावाहिक आरंभ होता है, हमें उसमें एक नया ही मोड़ दिखाई देता है।

कहानियों में बदलाव

आज तक शायद ही किसी ने यह जाना होगा कि सीता स्वयंवर में रावण भी आया था। क्योंकि महर्ष वाल्मीकि रचित रामायण में इसका कोई भी उल्लेख नहीं है। इसी तरह से आज आप टीवी पर जब महाभारत देखेंगे, तो आपको नई कहानियां मिलेंगी।

नई कहानियां आई हैं

उदाहरण के तौर पर टीवी के माध्यम से महाभारत की एक कहानी काफी प्रचलित हो रही है जिसके अनुसार पानी के तालाब को फर्श समझ उसमें गिर जाने के बाद द्रौपदी ने दुर्योधन का मज़ाक बनाया, और उसे अंधे का पुत्र बताया था। ऐसी कोई भी घटना असली महाभारत ग्रंथ में मौजूद नहीं है।

संस्करणों में हैं ये कहानियां

ये नई कहानियां कैसे जन्मीं और कहां से आईं, इसके जवाब में कई उप-ग्रंथ सामने आए हैं। कई लोग रामायण एवं महाभारत के विभिन्न ऐसे संस्करणों का दावा करते हैं, जिनमें कई ऐसी कहानियां हैं जिन्हें असली ग्रंथों में शामिल नहीं किया गया था। इसलिए आम लोग इन्हें नहीं जानते।

एक नया मोड़ लाई हैं

ये कहानियां रामायण एवं महाभारत के काल को एक नया मोड़ देती हैं, इस काल के उत्पन्न होने पर एक नया निष्कर्ष निकालती हैं और इनसे जुड़े पात्रों के बारे में कुछ अलग ही व्याख्या करती हैं।

श्रीराम का वनवास

रामायण काल में श्रीराम के वनवास जाने, पीछे से पिता राजा दशरथ की मृत्यु एवं अयोध्या के बुरे समय आने का भागीदार रानी कैकेयी को माना जाता है। रामायण काल में बुरा समय आरंभ होने का सारा जिम्मा ही रानी कैकेयी को दिया गया है, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है।

रानी कैकेयी को ठहराया जिम्मेदार

शोधकर्ताओं ने यह बयान दिया है कि रानी कैकेयी किसी भी बुरे कार्य में अकेली भागीदार नहीं थी, अपितु वे तो स्वयं पुत्र राम को ही अयोध्या के महाराज एक रूप में देखना चाहती थीं। लेकिन उन्हें भड़काने वाली थी उनकी कुबड़ी दासी मंथरा।

लेकिन मंत्र की थी साजिश

विवाहोपरांत कैकेयी के ही साथ अयोध्या आई कुबड़ी मंथरा हर पल कैकेयी के कान भरती रहती। अयोध्या के राजा दशरथ के खिलाफ भी उसे भड़काती रहती और सिर्फ और सिर्फ भरत ही अयोध्या का भावी राजा हो, ऐसा उसने कैकेयी के दिमाग में भर दिया था।

जो बानी रावण की मृत्यु का कारण

कैकेयी भी मंथरा को अपनी दासी कम और अपना शुभचिंतक अधिक मान, उसकी बातों में आ गई। और फिर आगे जो हुआ यह सभी को मालूम है। लेकिन एक और तर्क एक अनुसार मंथरा ना केवल श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास भोगने का कारण बनी, बल्कि साथ ही वह ‘रावण की मृत्यु’ का कारण भी थी।

आश्चर्य की बात

जी हां… यह जान आपको आश्चर्य हो रहा होगा, लेकिन मंथरा को लंकापति रावण की मृत्यु का कारण माना जा रहा है। यह निष्कर्ष केवल कुछ तथ्यों को आधार बनाकर ही दिया गया है। जिसके अनुसार यदि मंथरा कैकेयी के साथ विवाहोपरान्त ना आती तो वह हमेशा केवल कैकेयी के हित की बात ना करती। वह स्वार्थी ना बनती और कैकेयी को कभी ना उकसाती कि कैकयी की कोख से जन्मा पुत्र ही अयोध्या का राजा बने।

स्वार्थ बन कारण

उसके स्वार्थ ने कैकयी के मन में भी स्वार्थपूर्ण विचारों को जगह दी। कैकयी अपने मातृत्व धर्म तथा राम के प्रति अपने स्नेह को भूलकर उस स्वार्थ के चक्रव्यूह में उलझ गई। इस स्वार्थ ने अयोध्या से उनका सर्वश्रेष्ठ राजा राम छीन लिया, एक पिता से अपना पुत्र दूर कर दिया और एक राजकुमार और उनकी पत्नी को वन में रहने के लिए मजबूर कर दिया।

एक अलग दृश्टिकोण

यहां से यह ज्ञात होता है कि शायद सारे गलती कैकेयी की ही थी, और उनके पीछे हाथ था मंथरा का जिसने अयोध्या का भाग्य बदलकर रख दिया। लेकिन इन सभी परिस्थितियों को यदि एक अन्य दृश्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल अयोध्या के ही नहीं, बल्कि साथ ही रावण के भाग्य को भी बदलने की क्षमता रखती थी।

आरम्भ हुआ रावण का विनाश

यही से रावण के विनाश का अंकुर फूटता है। विश्व कल्याण हेतु भगवान राम वन गमन करते हैं तथा ऋषियों को राक्षसों के भय से मुक्त कर रावण का वध करते हैं।

माँ सरस्वती जी की आरती

यह तर्क कितने सत्य हैं इसका आशय हमें सरस्वती माता की आरती में से प्राप्त होता है। आरती की एक पंक्ति में मंथरा, रावण की मृत्यु से कैसे जुड़ी है, यह उल्लिखित है – “पैठि मन्थरा दासी रवण संहार किया। (कहीं कहीं असुर संहार भी प्रयोग किया जाता है) ओम् जय सरस्वती माता।।“

इसमें हैं उल्लेख

इस पंक्ति से यह ज्ञात होता है कि सरस्वती माता जो कि वाक शक्ति हैं ने मन्थरा दासी को वो स्वार्थ भरे शब्द उच्चारण के लिए प्रेरित किया जिसके चलते सारे घटनाक्रम के बाद रावण का संहार हुआ।

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Ram Navami

‘Ra’ in Sanskrit means ‘That which is Radiant’ and ‘Ma’ stands for ‘Myself’. That which shines forth within me, is Rama. That which is radiant in every particle of the Being is Rama.

Rama is born to Dasharatha and Kaushalya. Dasharatha (In Sanskrit this means ‘the ten charioted one’) signifies the five organs of sense and the five organs of action. Kaushalya (Sanskrit for ‘skilled’) stands for skill. The skillful reiner of the ten chariots can give birth to Ram. When the ten are used skillfully, radiance is born within.

Rama was born in Ayodhya (Sanskrit for ‘the place where no war can happen’). When there is no conflict in our mind, then the radiance can dawn.

Often we try to look for radiance within. Just realize that you are radiant. Once when Guruji was 5 or 6 years old, he closed his eyes and asked a visiting saint, ‘Swamiji, I do not see any light’. The saint replied, ‘You are the light! How can you see the light?’

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Intelligence means alertness. When we are alert what happens? Our perception and our observation improves, and our expression becomes perfect.

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Accept whatever is inside and outside of you. This is the way to go inward. So just let things be.

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Remember that you are a match stick. The purpose of a match stick is to light the lamps. You know, you strike the match stick and it burns and it lights several candles. Like that so many match sticks in a box can light so many lives. So think you are a super-sized match box. You are here to bring light, wisdom and happiness into the lives of people.

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Q: Does Birth and rebirth exist? If yes, then what does it mean to be a human?

Guruji: Why human birth? Human Life is there to know life.

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Harmony in diversity makes life vibrant, joyful and more colorful.

Om Namah Shivay

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राम स्तुति

भगवान राम का नाम लेने मात्र से ही जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। भगवान राम को प्रसन्न करने के लिए कई स्तुतियां, मंत्र, आरती आदि की रचना की गई है। इनके माध्यम से श्रीराम को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है। ऐसी ही एक स्तुति का वर्णन रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में आया है। भगवान राम की यह स्तुति मुनि अत्रि द्वारा की गई है। इस स्तुति का पाठ करने से भगवान राम भक्त पर प्रसन्न होते हैं तथा उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। यह राम स्तुति इस प्रकार है-

राम स्तुति
नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु शील कोमलं ॥
भजामि ते पदांबुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥
निकाम श्याम सुंदरं । भवाम्बुनाथ मंदरं ॥
प्रफुल्ल कंज लोचनं । मदादि दोष मोचनं ॥
प्रलंब बाहु विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं ॥
निषंग चाप सायकं । धरं त्रिलोक नायकं ॥
दिनेश वंश मंडनं । महेश चाप खंडनं ॥
मुनींद्र संत रंजनं । सुरारि वृंद भंजनं ॥
मनोज वैरि वंदितं । अजादि देव सेवितं ॥
विशुद्ध बोध विग्रहं । समस्त दूषणापहं ॥
नमामि इंदिरा पतिं । सुखाकरं सतां गतिं ॥
भजे सशक्ति सानुजं । शची पतिं प्रियानुजं ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नरा: । भजंति हीन मत्सरा ॥
पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥
विविक्त वासिन: सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥
निरस्य इंद्रियादिकं । प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥
तमेकमभ्दुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं ॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं । तुरीयमेव केवलं ॥
भजामि भाव वल्लभं । कुयोगिनां सुदुर्लभं ॥
स्वभक्त कल्प पादपं । समं सुसेव्यमन्वहं ॥
अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं ॥
प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥
पठंति ये स्तवं इदं । नरादरेण ते पदं ॥
व्रजंति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुता ॥

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श्रीराम के पाँच गुण

नीति-कुशल व न्यायप्रिय श्रीराम

भगवान राम विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। उन्होंने वेदों और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावना व सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। फिर चाहे राज्य त्यागने, बाली का वध करने, रावण का संहार करने या सीता को वन भेजने की बात ही क्यों न हो।

सहनशील व धैर्यवान
सहनशीलता व धैर्य भगवान राम का एक और गुण है। कैकेयी की आज्ञा से वन में 14 वर्ष बिताना, समुद्र पर सेतु बनाने के लिए तपस्या करना, सीता को त्यागने के बाद राजा होते हुए भी संन्यासी की भांति जीवन बिताना उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा है।

दयालु व बेहतर स्वामी
भगवान राम ने दया कर सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उनकी सेना में पशु, मानव व दानव सभी थे और उन्होंने सभी को आगे बढ़ने का मौका दिया। सुग्रीव को राज्य, हनुमान, जाम्बवंत व नल-नील को भी उन्होंने समय-समय पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया।

दोस्त
केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण। हर जाति, हर वर्ग के मित्रों के साथ भगवान राम ने दिल से करीबी रिश्ता निभाया। दोस्तों के लिए भी उन्होंने स्वयं कई संकट झेले।

बेहतर प्रबंधक
भगवान राम न केवल कुशल प्रबंधक थे, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। वे सभी को विकास का अवसर देते थे व उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते थे। उनके इसी गुण की वजह से लंका जाने के लिए उन्होंने व उनकी सेना ने पत्थरों का सेतु बना लिया था।

भाई
भगवान राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न सौतेली माँ के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने सभी भाइयों के प्रति सगे भाई से बढ़कर त्याग और समर्पण का भाव रखा और स्नेह दिया। यही वजह थी कि भगवान राम के वनवास के समय लक्ष्मण उनके साथ वन गए और राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भरत ने भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता को न्याय दिलाया। भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के लिए स्वामी, प्रजा के लिए नीति-कुशल व न्यायप्रिय राजा, सुग्रीव व केवट के परम मित्र और सेना को साथ लेकर चलने वाले व्यक्तित्व के रूप में भगवान राम को पहचाना जाता है। उनके इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है। सही भी है, किसी के गुण व कर्म ही उसकी पहचान बनाते हैं।

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आप शंकर मेरे हृदय में रहते हैं

भगवान् श्रीराम भगवान् श्रीशिव से कहते हैं—
ममासि हृदये शर्व भवतो हृदये त्वहम् |
आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ||
ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरुपयो: |
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्त्रकम् ||
ये त्वद्भक्ता: सदासंस्ते मद्भक्ता धर्मसंयुताः |
मद्भक्ता अपि भूयस्या भक्त्या तव नतिङ्करा: ||
(पद्म० पाता० ४६ | २०—२२)
‘आप शंकर मेरे हृदय में रहते हैं और मैं आपके हृदय में रहता हूँ | हम दोनों में कोई भेद नहीं है | मुर्ख एवं दुर्बुद्धि मनुष्य ही हमारे अंदर भेद समझते हैं | हम दोनों एक रूप हैं, जो मनुष्य हम दोनों में भेद-भावना करते हैं वे हजार कल्प पर्यंत कुम्भीपाक नरकों में यातना सहते हैं | जो आपके भक्त हैं वे धार्मिक पुरुष सदा ही मेरे भक्त रहे हैं | और जो मेरे भक्त हैं वे प्रगाढ़ भक्ति से आपको भी प्रणाम करते हैं |’
…..श्रीरामचरितमानस में भगवान् श्रीराम ने कहा है—
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास |
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ||
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि |
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि ||
ऐसी अवस्था में जो मनुष्य दूसरे के इष्टदेव की निन्दा या अपमान करता है, वह वास्तव में अपने ही इष्टदेव का अपमान या निन्दा करता है | परमात्मा की प्राप्ति के पूर्वकाल में परमात्मा का यथार्थ रूप न जानने के कारण भक्त अपनी समझ के अनुसार अपने उपास्यदेव का जो स्वरुप कल्पित करता है, वास्तव में उपास्यदेव का स्वरुप उससे अत्यन्त विलक्षण है; तथापि उसकी अपनी बुद्धि, भावना तथा रूचि के अनुसार की हुई सच्ची और श्रद्धायुक्त उपासना को परमात्मा सर्वथा सर्वांश में स्वीकार करते हैं | क्योंकि ईश्वर-प्राप्ति के पूर्व ईश्वर का यथार्थ स्वरुप किसी के भी चिंतन में नहीं आ सकता | अतएव ईश्वर के किसी भी नाम-रूप की निष्कामभाव से उपासना करनेवाला पुरुष शीघ्र ही उस नित्य विज्ञानानंदघन परमात्मा को प्राप्त हो जाता है |
…..जब एक नित्य विज्ञानानंदघन ब्रह्म ही हैं, तथा वास्तव में उनसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं है, तब किसी एक नाम-रूपसे द्वेष या उसकी निंदा, तिरस्कार और उपेक्षा करना उस परब्रह्म से ही वैसा करना है |

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ये हैं भगवान शिव के श्रेष्ठ अवतार, एक घटना से बने ये इतने शक्तिशाली

शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव ने अनेक अवतार लिए हैं। अपने विभिन्न अवतारों में भगवान शिव ने दुष्टों का संहार कर धर्म की रक्षा की है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की सहायता करने और दुष्टों का नाश करने के लिए ही भगवान शिव ने हनुमान के रूप में अवतार लिया था। हनुमानजी भगवान शिव के सबसे श्रेष्ठ अवतार माने जाते हैं। 
इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। यूं तो हनुमानजी बचपन से ही बहुत बलवान थे लेकिन एक बार उनके जीवन में ऐसी घटना घटी जिसके कारण वह परम शक्तिशाली हो गए। ये घटना कुछ यूं हुई कि बचपन में हनुमानजी सूर्य को फल समझकर खाने दौड़े। यह देखकर देवराज इंद्र घबरा गए और उन्होंने वज्र से उन पर प्रहार कर दिया। क्रोधित होकर पवनदेव ने वायु का प्रवाह रोक दिया। इसके बाद ब्रह्माजी ने आकर हनुमान को चैतन्य किया और सभी देवताओं ने वरदान देकर उन्हें परम शक्तिशाली बना दिया। आज हम आपको भगवान भगवान शिव के अवतार श्रीहनुमान के जन्म तथा उनके जीवन की कुछ रोचक घटनाओं के बारे में बता रहे हैं।
– शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए। 
 
– वाल्मीकि रामायण के अनुसार बाल्यकाल में जब हनुमान सूर्यदेव को फल समझकर खाने को दौड़े तो घबराकर देवराज इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र का वार किया। वज्र के प्रहार से हनुमान निश्तेज हो गए। यह देखकर वायुदेव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने समस्त संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया। संसार में हाहाकार मच गया। तब परमपिता ब्रह्मा ने हनुमान को स्पर्श कर पुन: चैतन्य किया। उस समय सभी देवताओं ने हनुमानजी को वरदान दिए। इन वरदानों से ही हनुमानजी परम शक्तिशाली बन गए।
– भगवान सूर्य ने हनुमानजी को अपने तेज का सौवां भाग देते हुए कहा कि जब इसमें शास्त्र अध्ययन करने की शक्ति आ जाएगी, तब मैं ही इसे शास्त्रों का ज्ञान दूंगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा और शास्त्रज्ञान में इसकी समानता करने वाला कोई नहीं होगा।
– धर्मराज यम ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा। कुबेर ने वरदान दिया कि इस बालक को युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा तथा मेरी गदा संग्राम में भी इसका वध न कर सकेगी।
– भगवान शंकर ने यह वरदान दिया कि यह मेरे और मेरे शस्त्रों द्वारा भी अवध्य रहेगा। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे बनाए हुए जितने भी शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य रहेगा और चिंरजीवी होगा।
– देवराज इंद्र ने हनुमानजी को यह वरदान दिया कि यह बालक आज से मेरे वज्र द्वारा भी अवध्य रहेगा।
– जलदेवता वरुण ने यह वरदान दिया कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी।
– परमपिता ब्रह्मा ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह बालक दीर्घायु, महात्मा और सभी प्रकार के ब्रह्दण्डों से अवध्य होगा। युद्ध में कोई भी इसे जीत नहीं पाएगा। यह इच्छा अनुसार रूप धारण कर सकेगा, जहां चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छा के अनुसार तीव्र या मंद हो जाएगी।
– हनुमान सब विद्याओं का अध्ययन कर सुग्रीव के मंत्री बन गए। हनुमान ने ही पत्नी की खोज में भटकते भगवान श्रीराम व सुग्रीव की मित्रता कराई। हनुमान सीता की खोज में समुद्र को पार कर लंका गए और वहां उन्होंने अद्भुत पराक्रम दिखाए। हनुमान ने राम-रावण युद्ध में भी अपना पराक्रम दिखाया और संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए। अहिरावण को मारकर लक्ष्मण व राम को बंधन से मुक्त कराया। इस प्रकार हनुमान अवतार लेकर भगवान शिव ने अपने परम भक्त श्रीराम की सहायता की। 
– वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब हनुमानजी लंका में माता सीता की खोज करते-करते रावण के महल में गए, तो वहां रावण की पत्न मंदोदरी को देखकर उन्हें माता सीता समझ बैठे और बहुत प्रसन्न हुए लेकिन बहुत सोच-विचार करने के बाद हनुमानजी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रावण के महल में इस प्रकार आभूषणों से सुसज्जित यह स्त्री माता सीता नहीं हो सकती।
– लंका में बहुत ढुंढने के बाद भी जब माता सीता का पता नहीं चला तो हनुमानजी उन्हें मृत समझ बैठे, लेकिन फिर उन्हें भगवान श्रीराम का स्मरण हुआ और उन्होंने पुन: पूरी शक्ति से सीताजी की खोज प्रारंभ की और अशोक वाटिका में सीताजी को खोज निकाला।
– जब हनुमानजी ने अशोक वाटिका उजाड़ी। तब उन्होंने कई राक्षसों का वध भी किया। उनमें जम्बुमाली मंत्री के सात पुत्र, रावण के पांच सेनापति व रावण का पुत्र अक्षयकुमार भी शामिल था।

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Goddess Sita

Goddess Sita represents all that is great and noble in womanhood. Mata Sita is also known as Janaki as she was the adopted daughter of King Janaka of Mithila. Hence this day is also known as Janaki Navami. According to Hindu mythology, when King Janaka was ploughing the land to conduct a Yajna he found a baby girl in the Golden casket. The Golden casket was found inside the field while ploughing the land. A ploughed land is called Sita hence King Janaka named the baby girl as Sita.

Sita Jayanti or the descent of Goddess Sita occurred in the bright half of the Hindu month of Vaishak on Naumi. Sita’s descent on earth was as a result of divine decree. Goddess Sita is Shakti Mata, one and the same with Durga, Lakshmi and Saraswati. The fact that she has her genesis in the Cosmos or Godhead was borne out by her many divine actions, one of which is her effortlessly shifting of the Shiva Dhanush (Shiva’s bow).

Goddess Sita is acclaimed as the ‘Mother of the Universe’ and is referred to as BHUVANESHWARI, the manifestation of divine power. No woman has so influenced the lives of millions of women all over the world from age to age as Mata Sita of the Ramayan.

The pens of no poet have managed to sketch a character as noble and as admirable as the pens of Valmikki and Tulsidas. Individually, they described the first lady of Hinduism as possessed of all virtue, all dignity, all courage, all love and beauty. Mother Sita came on earth many, many centuries ago but the sweet fragrance of her chaste and noble life still gives comfort and consolation to those who are beset by the trials and tests of the world. Salutations to the great Goddess Sita

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