मालिक

प्रश्न‒अगर कोई साधु-संन्यासी बनकर रुपये इकट्ठा करता है और माता-पिता, स्त्री-पुत्रोंको रुपये भेजता है, उनका पालन-पोषण करता है तो क्या उसको दोष लगेगा ?

उत्तर‒जो साधु-संन्यासी बनकर माँ-बाप आदिको रुपये भेजते हैं, वे तो पापके भागी हैं ही, पर जो उनके दिये हुए रुपयोंसे अपना निर्वाह करते हैं, वे भी पापके भागी हैं; क्योंकि वे दोनों ही शास्त्र-आज्ञाके विरुद्ध काम करते हैं । माता-पिताकी सेवा तो गृहस्थाश्रममें ही रहकर करते, पर वे अवैध काम करके संन्यास-आश्रमको दूषित करते हैं तो उनको पाप लगेगा ही । वे पापसे बच नहीं सकते !

प्रश्न‒अगर घरमें माँका पालन करनेवाला, सँभालनेवाला कोई न रहा हो तो उस अवस्थामें साधु-संन्यासी बना हुआ लड़का माँका पालन कर सकता है या नहीं ?

उत्तर‒माँका कोई आधार न रहे तो साधु बननेपर भी वह माँका पालन कर सकता है और पालन करना ही चाहिये । असमर्थ अवस्थामें तो दूसरे प्राणियोंकी भी सेवा करनी चाहिये, फिर माँ तो शरीरकी जननी है ! वह अगर असमर्थ अवस्थामें है तो उसकी सेवा करनेमें कोई दोष नहीं है ।

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पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं; परन्तु बिना मालिकके पैसा देगा कौन ? यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे ? नहीं मिल सकते । उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही ।

अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता, चतुरता और उत्साहसे करता है पर केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है । ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं । अगर कोई मनुष्य भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार, उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है, उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं; परन्तु जो भगवान्‌के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है, उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं !* संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक नहीं बनाता; परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं । ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है । ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत‒उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं, उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है । वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं ।

Om Namah Shivay

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राग-द्वेषका त्याग-3

अच्छा और बुरा लगता है, ठीक और बेठीक लगता है‒यह राग-द्वेष है । इसके वशमें न होना क्या है ? इसको तमाशेकी तरह देखे कि क्या अच्छा है और क्या मन्दा है ! न सुख रहनेवाला है, न दुःख रहनेवाला है । न बीमारी रहनेवाली है, न स्वस्थता रहनेवाली है । कुछ भी रहनेवाला नहीं है । इन सबका वियोग होने वाला है । बहुत दिनों तक संयोग रहने पर भी एक दिन वियोग जरूर होगा‒‘अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषयाः ।’ अतः सज्जनो ! इस बातको पहलेसे ही समझ लो कि एक दिन इन सबका वियोग होगा । लड़का जन्मे, तभी यह समझ लेना चाहिये कि यह मरेगा जरूर ! यह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा, इसका विवाह होगा कि नहीं होगा, इसके लड़का-लड़की होंगे कि नहीं‒इसमें सन्देह है; परन्तु यह मरेगा कि नहीं मरेगा‒इसमें कोई सन्देह है क्या ? जन्म हुआ है तो खास काम मरना ही है, और कोई खास काम नहीं है । अब इसमें राजी और नाराज क्या हों । अपने तो मौजसे भगवान्की तरफ चलते रहें । जो वैराग्यवान् होते हैं, विवेकी होते हैं, भगवान्के प्रेमी भक्त होते हैं, वे इन आने-जानेवाले पदार्थोंकी तरफ दृष्टि रखते ही नहीं । वे करने में सावधान और होने में सदा प्रसन्न रहते हैं ।

रज्जब रोवे कौन को, हँसे सो कौन विचार ।
गये सो आवन के नहीं रहे सो जावनहार ॥

सब जानेवाला है, मरनेवाला है तो क्या हँसें ! जो मर चुके, उनको कितना ही रोयें, वे आनेके हैं नहीं तो क्या रोयें ! यह विचार स्थायी कर लो । फिर राग-द्वेष मिट जायँगे ।

राग-द्वेषको सह लो अर्थात् प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षित न हों और अप्रियकी प्राप्ति होनेपर उद्विग्न न हों । फिर आप जन्म-मरणसे रहित हो जाओगे । सन्तोंने कहा है‒‘अब हम अमर भये न मरेंगे ।’ अब क्यों मरेंगे ? मरनेवाले तो ये राग-द्वेष ही हैं । इन दोनोंको नाशवान् और पतन करनेवाले समझो । चाहे तो ऐसा समझकर इनसे अलग हो जाओ, नहीं तो भगवान्को पुकारो कि ‘हे नाथ ! हे नाथ !! रक्षा करो !’जैसे, मोटर खराब हो जाय तो खुद ठीक कर लो । खुद ठीक न कर सको तो कारखाने में भेज दो ! ऐसे ही राग-द्वेषसे अलग न हो सको तो भगवान्की शरणमें चले जाओ । भगवान्ने गीताके अन्तमें कहा कि ‘तू मेरी शरणमें आ जा’‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८ । ६६) ।

एक ब्राह्मण देवताकी कन्या बड़ी हो गयी । उसने एक धर्मात्मा सेठके पास जाकर कहा‒‘सेठजी ! कन्या बड़ी हो गयी, क्या करूँ ?’ सेठने कहा‒‘आप वर ढूँढ़ो, तैयारी करो, चिन्ता क्यों करते हो ?’ इसका अर्थ यह नहीं है कि सेठ ही आकर वर ढूँढ़ेंगे, विवाह करायेंगे, प्रत्युत इसका अर्थ है कि चिन्ता मत करो; धन हम दे देंगे, काम तुम करो । इसी तरह भगवान् कहते हैं कि ‘तुम अपना काम करो, चिन्ता मत करो । तुम्हें जो अभाव होगा, उसे मैं पूरा करूँगा ।’

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ZERO IS HERO

You can’t imagine the world of computers without the binary system, all because some ‘wild’ Indian sages conceptualised the universe and their gods in terms of zero and infinity.

If you travel to the north Indian state of Uttar Pradesh, and visit a place called Deogarh, which literally means citadel of the gods, you will find the ruins of a Hindu temple, one of the oldest, at least 1,500 years old, built by the kings of the Gupta dynasty. On its walls, there is the image of a man reclining on the coils of a serpent with many hoods, surrounded by his wife and many warriors and sages. It’s inspired by a scene from the royal court, but it is clearly a celestial scene, visualisation of the moment when the world was created.

For Hindus, the world is created when Narayana awakens. Narayana is the god reclining on the serpent with multiple hoods. When he is in dreamless slumber, the world does not exist. When he wakes up, the world comes into being. Narayana is thus a visual representation of human consciousness, the awakening of which heralds the creation of our world. What is interesting is the serpent on whose coils, Narayana reclines. Its name is: Adi-Ananta-Sesha, which literally means primal-limitless-residue, which is numerically visualised as one-infinity-zero. For, with consciousness, we become aware of the first moment of beginnings, of limitless possibilities, and of nothingness that existed before the first moment.

The Hindu worldview has always been obsessed with infinity or everything-ness; zero or nothingness, and with the number one or the beginning. More than Hindu, it is the Indic worldview, the substratum of thought, which gave rise to three major ideas: Hinduism, Buddhism and Jainism, all of which speak of rebirth, cyclical time, and a world sans boundaries. Buddhism came up with ideas such as nirvana or oblivion and shunya, which literally means zero. Jainism spoke of a world of endless possibilities, an-ekanta-vada.

This is in stark contrast to the Greek worldview where the world begins as chaos until the gods create order. And with order comes definitions, boundaries, certainty, and predictability. It is also different from the Abrahamic worldview where God creates the world out of nothingness, and the world he creates in seven days has a definite expiry date: the Apocalypse. The Greek and Abrahamic worldviews form what we call the western worldview today that is obsessed with organisation, and is terrified of disorder, and unpredictability, something Indians are used to, and rather comfortable with, even thriving in it.

The story goes that when Alexander the Great, after having conquered Persia, visited India, he met a sage on the banks of the river Indus, who he referred to as a gymno-sophist or naked wise man. This sage sat on a rock and spent all day staring at the sky. Alexander asked him what he was doing and the sage said, “Experiencing nothingness.” The sage asked Alexander what was he doing. Alexander said, “I am conquering the world.” Both laughed. Each one thought the other was a fool. For Alexander, the sage was wasting his life doing nothing. For the sage, Alexander was wasting his time trying to conquer a world that has no limits.

Belief in one life, which is the hallmark of Greek worldview, and later Abrahamic, has led to us valuing achievements. But belief in rebirth, hence infinite lives, which is the hallmark of Indic worldview, makes achievements meaningless, and puts the focus on wisdom and understanding.

India’ s philosophical obsession with infinity and zero led to mathematicians not just conceptualising the idea of zero, but also giving it a form, a dot, and finally using it in a decimal system. This happened around the same time that the Gupta kings built the temple in Deogarh. The mathematician Brahmagupta, 638 CE, is associated with giving form to the number zero, and formulating the first rules with its usage. The rise of the decimal system enabled the writing of vast numbers, of huge value, a practice that has been traced to even vedic texts written around 1000 BCE, values that are not seen in any other parts of the world.

The Arab sea-merchants who frequented the coasts of India, and who dominated the rich spice and textile trade then — before the European sea-farers took over in the 16th century — saw value in this system and took it with them to Arabia. The Arab mathematician Khowarizimi suggested use of a little circle for zero. This circle was called sifr, which means ‘empty’, which eventually became ‘zero’. Zero travelled from Arabia through Persia and Mesopotamia to Europe during the Crusades. In Spain, Fibonacci found it useful to do equations without using the abacus. Italian government was suspicious of this Arabic numbering system and so outlawed it. But the merchants used it secretly, which is why sifr became cipher, meaning ‘code’.

It comes as a shock to many people that the modern use of the number zero is less than thousand years old, and that it became popular less than 500 years ago. Had it not been for the arrival of zero, neither would the Cartesian coordinate system nor calculus have developed in the 16th century. Zero enabled people to conceptualise large numbers and helped in book-keeping and accounting. In the 20th century, came the binary system, which forms the foundation of modern computing. All because some ‘wild’ Indian sages conceptualised the universe and their gods in terms of zero and infinity.

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किस देवता का वाहन कौन है और क्यों?-2

हनुमानजी का आसन पिशाच
हनुमानजी प्रेत या पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं। इसी को वह अपने वाहन के रूप में भी प्रयोग करते हैं। पिशाच या प्रेत बुराई तथा दूसरों का भय एवं कष्ट देने वाले होते हैं। इसका अर्थ है कि हमें कभी भी बुराई को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

सूर्य का वाहन रथ
भगवान सूर्य का वाहन रथ है। इस रथ में सात घोड़ें होते हैं। जो सातों वारों का प्रतीक हैं। रथ का एक पहिया एक वर्ष का प्रतीक है जिसमें बाहर आरे होते हैं तथा छ: ऋतु रूपी छ: नेमीयां होती हैं। भगवान सूर्य का वाहन रथ इस बात का प्रतीक होता है कि हमें सदैव क्रियाशील रहना चाहिए तभी जीवन में प्रकाश आता है।

यमराज का वाहन भैंसा
यमराज भैंसे को अपने वाहन के रूप में प्रयोग करते हैं। भैसा भी सामाजिक प्राणी होता हैं। वह सब मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। एकता द्वारा अपनी एवं अपने परिवार के रक्षक होत हैं। उनका रूप भयानक होता हैं। अत: यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।

भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर
भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय देवताओं के सेनापति कहे जाते हैं। इनका वाहन मोर है। धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिकेय ने असुरों से युद्ध कर देवताओं को विजय दिलाई थी। अर्थात इनका युद्ध कौशल सबसे श्रेष्ठ हैं। अब यदि इनके वाहन मोर को देखें तो पता चलता है कि इसका मुख्य भोजन सांप है। सांप भी बहुत खतरनाक प्राणी है इसलिए इसका शिकार करने के लिए बहुत ही स्फूर्ति और चतुराई की आवश्यकता होती है। इसी गुण के कारण मोर सेनापति कार्तिकेय का वाहन है।

लक्ष्मी का वाहन हाथी एवं उल्लू
माता लक्ष्मी का वाहन सफेद रंग का हाथी होता है। हाथी भी एक परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने वाला सामाजिक एवं बुद्धिमान प्राणी होता हैं। उनके परिवार में मादाओं को प्राथमिकता दी जाती हैं तथा उनका सम्मान किया जाता हैं। हाथी हिंसक प्राणी नही होता। उसी तरह अपने परिवार वालों को एकता के साथ रखने वाला तथा अपने घर की स्त्रियों को आदर एवं सम्मान देने वालों के साथ लक्ष्मी का निवास होता है।

लक्ष्मी का वाहन उल्लू भी होता हैं। ऊल्लू सदा क्रियाशील होता हैं। वह अपना पेट भरने के लिए लगातार कर्मशील होता है। अपने कार्य को पूरी तन्मयता के साथ पूरा करता हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति रात-दिन मेहनत करता है, लक्ष्मी सदा उस पर प्रसन्न होती है तथा स्थाई रूप से उसके घर में निवास करती है।

सरस्वती का वाहन हंस
मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस का एक गुण होता है कि उसके सामने दूध एवं पानी मिलाकर रख दें तो वह केवल दूध पी लेता हैं तथा पानी को छोड़ देता है। यानी वह सिर्फ गुण ग्रहण करता है व अवगुण छोड़ देता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। गुण व अवगुण को पहचानना तभी संभव है जब आपमें ज्ञान हो। इसलिए माता सरस्वती का वाहन हंस है।

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The Kamakhya Devi temple

The Kamakhya Devi temple is one of the most important temples in India. It is at the top level of Shakti (Devanagari: शक्ति) power sites that emanate the energy, the concept, the power, the force, empowerment (for better words) of the universal energy, divine feminine embodiment, that is creative. Alone it is the Divine Power. Today we see Shakti mainly as Devi, the goddess, the Divine Mother.The formal religious practice of Shaki is through the cult Shaktism (Sanskrit: शाक्तं), that holds this Divine feminine power, as without equal, alone, Brahman (ब्रह्मन्), that universal supreme, the “it” that supports the actual contents of the “universe”, all, everything.

In the traditions of Shaivism (Shiva) and Vaishnavism (Vishnu), Devi becomes a “part” of, the feminine counterpart, of the male/female principle, Prakriti (प्रकृति) / Purusha (पुरुष). In our times, one of the popular forms of Shakti is portrayed as Dākshāyani (Devanagari: दाक्षायणी) or Satī (सती), the goddess who was the first wife of Shiva, and later reincarnated as Parvati. In previous times Shakti pre-dated Parvati and Sati, and was an entity alone. Shakti is arguably the first concept of a “Divine”. The story of Sati is well known. It is a Divine Play (in the Western tradition we might say Mystery play, or allegorical drama), illustrative, mystical, dramatic, that combines and binds Shaktism and Shaivism to one another. One of the main features of the Sati story/drama, is the creation of the concept of the 51 Shakti Peethas, the important temple centers of Shakti worship which are located in Bangladesh, India, Nepal, Pakistan, Sri Lanka, and Tibet. According to accounts top among these are the four Adi Shakti Peeth, of which the Kamakhya Temple in Assam is one. It says that it is here that the yoni, genitals, vagina, or womb of Sati fell. As such the Kamakhya Shakti temple is a revered center of Shaktism, and worship of Devi across all traditions.

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101 काम की बातें : 2

34 :- जल्द मिलने वाली चीजें ज्यादा दिन तक नहीं चलती और जो चीजें ज्यादा दिन तक चलती है वो जल्दी नहीं मिलती है.
35 :- इंसान तब समझदार नहीं होता जब वो बड़ी बड़ी बातें करने लगे, बल्कि समझदार तब होता है जब वो छोटी छोटी बातें समझने लगे…
36 :- सेवा सभी की करना मगर आशा किसी से भी ना रखना क्योंकि सेवा का वास्तविक मूल्य भगवान ही दे सकते है, इंसान नहीं.
37 :- मुश्किल वक्त का सबसे बड़ा सहारा है “उम्मीद” !! जो एक प्यारी सी मुस्कान दे कर कानों में धीरे से कहती है “सब अच्छा होगा” !!
38 :- दुनिया में कोई काम असंभव नहीं, बस हौसला और मेहनत की जरुरत है !!!
39 :- वक्त आपका है चाहे तो सोना बना लो और चाहे तो सोने में गुजार दो, दुनिया आपके उदाहरण से बदलेगी आपकी राय से नहीं…
40 :- बदलाव लाने के लिए स्वयं को बदले…
41 :- सफल व्यक्ति लोगों को सफल होते देखना चाहते है, जबकि असफल व्यक्ति लोगों को असफल होते देखना चाहते है…
42 :- घड़ी सुधारने वाले मिल जाते है लेकिन समय खुद सुधारना पड़ता है !!!
43 :- दुनिया में सब चीज मिल जाती है केवल अपनी ग़लती नहीं मिलती…
44 :- क्रोध और आंधी दोनों बराबर… शांत होने के बाद ही पता चलता है की कितना नुकसान हुवा…
45 :- चाँद पे निशान लगाओ, अगर आप चुके तो सितारों पे तो जररू लगेगा !!!
46 :- गरीबी और समृद्धि दोनों विचार का परिणाम है…
47 :- पसंदीदा कार्य हमेशा सफलता, शांति और आनंद ही देता है…
48 :- जब हौसला बना ही लिया ऊँची उड़ान का तो कद नापना बेकार है आसमान का…
49 :- अपनी कल्पना को जीवन का मार्गदर्शक बनाए अपने अतीत को नहीं…
50 :- समय न लागओ तय करने में आपको क्या करना है, वरना समय तय कर लेगा की आपका क्या करना है.
51 :- अगर तुम उस वक्त मुस्कुरा सकते हो जब तुम पूरी तरह टूट चुके हो तो यकीन कर लो कि दुनिया में तुम्हें कभी कोई तोड़ नहीं सकता !!!
52 :- कल्पना के बाद उस पर अमल ज़रुर करना चाहिए। सीढ़ियों को देखते रहना ही पर्याप्त नहीं है, उन पर चढ़ना भी ज़रुरी है।
53 :- हमें जीवन में भले ही हार का सामना करना पड़ जाये पर जीवन से कभी नहीं हारना चाहिए…
54 :- सीढ़ियां उन्हें मुबारक हो जिन्हें छत तक जाना है, मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता मुझे खुद बनाना है !!!
55 :- हजारों मील के सफ़र की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है…
56 :- मनुष्य वही श्रेष्ठ माना जाएगा जो कठिनाई में अपनी राह निकालता है ।
57 :- पुरुषार्थ से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है…
58 :- प्रतिबद्ध मन को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, पर अंत में उसे अपने परिश्रम का फल मिलेगा ।
59 :- असंभव समझे जाने वाला कार्य संभव करके दिखाये, उसे ही प्रतिभा कहते हैं ।
60 :- आने वाले कल को सुधारने के लिए बीते हुए कल से शिक्षा लीजिए…
61 :- जो हमेशा कहे मेरे पास समय नहीं है, असल में वह व्यस्त नहीं बल्कि अस्त-व्यस्त है ।
62 :- कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने आती हैं…
63 :- क्रोध वह हवा है जो बुद्धि के दीप को बुझा देती है ।
64 :- आपका भविष्य उससे बनता है जो आप आज करते हैं, उससे नहीं जो आप कल करेंगे…
65 :- बन सहारा बे सहारों के लिए बन किनारा बे किनारों के लिए, जो जिये अपने लिए तो क्या जिये जी सको तो जियो हजारों के लिए ।
66 :- चाहे हजार बार नाकामयाबी हो, कड़ी मेहनत और सकारात्मक सोच के साथ लगे रहोगे तो अवश्य सफलता तुम्हारी है…

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Akshya Tritiya

Q: Tell us about ‘Akshya Tritiya’. I was wondering if this day happens every year?

Guruji: Today is celebrated as a very auspicious day in India. It’s called Akshaya Tritiya. It is related with many stories. One of the stories is that, on this day the Ganges (a holy river in India) came to Earth to purify mankind.
It is every year. Akshaya Tritiya is the third day after the new moon. Fifth day after the new moon is when Adi Shankaracharya was born.  The main knowledge of Adi Shankara is only one thing, everything is perishable. Thoughts come and go, feelings come and go. One day everything disappears. But you are the light that stays forever. It is also associated with two instances of Lord Krishna.
What happened is, once the five Pandavas, (the five brothers from the Mahabharata epic) and their wife were in exile. At that time a saint called and said, ‘I am going to have food with you.’ When the message came, they had no food. They had already eaten and had kept their pots away. The lady, Draupadi (the wife of the 5 Pandavas) prayed to Lord Krishna. At the same time, Krishna came to their house and said, ‘Oh I am very hungry.’ When he came in, he saw that there was only one grain of rice stuck to the pot. He picked that one grain of rice and ate it, and turned the pot into an Akshaya Patra. Akshaya Patra means that which never finishes.
When the saint came with 400 people, Draupadi could feed all of them  from the same pot. The more she took from the pot, the more would come from it. It would never go down. So it is a common expression in India to say, ‘This is an akshaya patra’, which means it always keeps giving.
The other story is, Krishna had a friend who was very poor. His name was Sudhama. Sudhama means a good place, or a very benevolent place. So, one day his wife said, ‘We are living in such poverty and Krishna is so rich. Why don’t you go and get something from him. He is such a close friend.’ Sudhama said, ‘Okay, I’ll go, but I can’t go to a friend empty handed. I have to take something’. So his wife packed three handful of puffed rice in a scarf and gave it to him. It is like rice crispies.
When Sudhama goes to Krishna and Krishna welcomes him, and washes his feet. The story goes that they were such good friends and in the friendship there was so much love that Sudhama forgets to give the rice to Krishna and also forgets to ask him for anything. He came to ask him for a favor but he could not ask him anything because he was so overwhelmed with love. They were so close that he forgot to ask. He could not ask. He could not even speak.
When he was about to leave, Krishna asked, ‘Hey, you have brought me something? Give it to me. I know your wife has sent something. Why are you not giving it to me. Come on, give it.’
Krishna took the rice and he ate one handful, then he ate the second handful, by that time his wife Rukmini came and said, ‘I want to take the third one’. While all this was happening, Sudhama left without asking him for anything. When he reached home, he found his house flooded with riches and gold. That’s the story.
So, people today buy gold and they gift each other. Today if you get anything, it will always grow. You gift, or you buy, it all grows. That is the belief. Like that there are some more stories also. But right now this is good enough.

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