प्रेम और शरणागति

अतएव हमलोगों को संसार के सारे पदार्थों को लात मारकर प्रभु की शरण में जाना चाहिए | ऋद्धि-सिद्धि, मान-बड़ाई और प्रतिष्ठा आदि से भी वृतियां हटा लेनी चाहिए | यह अपार संसार एक अथाह सागर है | इसके पार जाने के दो ही साधन हैं—नाव से जाना अथवा तैरकर जाना | नाव प्रभु का प्रेम है और तैरना है सांख्योग यानी ज्ञान | कहने की आवश्यकता नहीं कि तैरने की अपेक्षा नाव में जाना सुगम, निश्चित और सुरक्षित है |

प्रेमरूपी नौका की प्राप्ति के लिए प्रभु की शरण जाना चाहिए | तैरने के लिए तो हिम्मत और त्याग की आवश्यकता है | तैरने में हाथ और पैर से लहरें चीरते हुए आगे बढ़ा जाता है | संसार-सागर में विषयरूपी जल को हाथ और पैर से फेंकते हुए हम तैर जा सकते हैं—उस पार जाने का लक्ष्य न भूलें और लहरों में हाथ-पैर न रुकें | तैरने के समय शरीर पर कुछ भी बोझ न होना चाहिए | इसी प्रकार विषयों की लहरों को चीरकर आगे बढ़ने के लिए हमारे भीतर तीव्र और दृढ़ वैराग्यरूपी उत्साह का होना आवश्यक है | इसके बिना तो एक हाथ भी बढ़ना असम्भव है | हाथों से लहरें चीरता जाय, पैरों से जल फेंकता जाय |

सच्चे आत्मसमर्पण में तो विषयासक्ति का त्याग अनिवार्य है ही | विषयों में प्रेम भी हो और भगवदर्पण भी हो, यह सम्भव नहीं |

काँचन-कामिनी से भी अधिक मीठी छुरी मान-बड़ाई है | इसने तो बहुत ही बड़े-बड़े साधकों फँसा दिया, रोक दिया और अंततोगत्वा डुबा दिया | इससे सदा बचे रहना चाहिए |

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि ज्ञान से तैरने की अपेक्षा प्रेममयी नित्य-नवीन नौका में जाना सुखप्रद, सहज और आनन्ददायक है |

वह विशुद्ध प्रेम प्रभु की अनन्य शरण होने से ही प्राप्त होता है, अतएव अनन्य शरण होकर जाना ही नौका से जाना है | संसार-सागर को तो हर दशा में लाँघना ही पड़ेगा | ‘उस पार’ गये बिना तो प्राणवल्लभ की झाँकी होने की नहीं | फिर क्यों न उसी की शरण में जाकर उसी के हाथ का सहारा बनकर चल चलें | भगवान् ने स्वयं प्रतिज्ञा भी की है—
ये तू सर्वाणि कर्माणि मयि संयस्य मत्पराः |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||
(गीता १२ | ६-७)
‘हे अर्जुन ! जो मेरे परायण हुए भक्तजन, सम्पूर्ण कर्मों को मेरे में अर्पण करके, मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही तैलधारा के सदृश अनन्य ध्यानयोग से निरन्तर चिंतन करते हुए भजते हैं, उन मेरे में चित्त को लगानेवाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करनेवाला होता हूँ |’ यह संसार-समुद्र बड़ा ही दुस्तर है, इससे तरने का सहज उपाय भगवान् की शरण ही है | भगवान् ने कहा है कि—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते |
(गीता ७ | १४)
‘यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं |’

अतएव हमलोगों को प्रेम और प्रेममय भगवान् की प्राप्ति के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सब प्रकार भगवान् की अनन्य शरण* होना चाहिए |
· अनन्ययोग से उपासना, अव्यभिचारिणी भक्ति एवं अनन्यशरण—यह तीनों एक ही हैं |

Om Namah Shivay

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रुद्राक्ष वृक्ष

रुद्राक्ष के वृक्ष भारत समेत विश्व के अनेक देशों में पाए जाते हैं. यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तथा मैदानी इलाकों में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. रुद्राक्ष का पेड़ किसी अन्य वृक्ष की भांति ही होता है, इसके वृक्ष 50 से लेकर 200 फीट तक पाए जाते हैं तथा इसके पत्ते आकार में लंबे होते हैं. रुद्राक्ष के फूलों का रंग सफेद होता है तथा इस पर लगने वाला फल गोल आकार का होता है जिसके अंदर से गुठली रुप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है.

रुद्राक्ष का फल खाने में अधिक स्वादिष्ट नहीं होता इसके फलों का स्वाद कुछ खटा या फिर कसैला सा होता है. इसके हरे फल पकने के पश्चात स्वयं ही गिर जाते हैं और जब उनका आवरण हटता है तो एक उसमे से अमूल्य रुद्राक्ष निकलते हैं. यह इन फलों की गुठली ही होती है. रुद्राक्ष में धारियां सी बनी होती है जो इनके मुखों का निर्धारण करती हैं. रुद्राक्ष को अनेक प्रकार की महीन सफाई प्रक्रिया द्वारा उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है जिसे उपयोग में लाकर सभी लाभ उठाते हैं.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में रुद्राक्ष |

रुद्राक्ष भारत, के हिमालय के प्रदेशों में पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त असम, मध्य प्रदेश, उतरांचल, अरूणांचल प्रदेश, बंगाल, हरिद्वार, गढ़वाल और देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में यह रुद्राक्ष पाए जाते हैं. इसके अलावा दक्षिण भारत में नीलगिरि और मैसूर में तथा कर्नाटक में भी रुद्राक्ष के वृक्ष देखे जा सकते हैं. रामेश्वरम में भी रुद्राक्ष पाया जाता है यहां का रुद्राक्ष काजु की भांति होता है. गंगोत्री और यमुनोत्री के क्षेत्र में भी रुद्राक्ष मिलते हैं.

नेपाल और इंडोनेशिया से प्राप्त रुद्राक्ष |

नेपाल, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि प्रमुख रूप से रुद्राक्ष के बहुत बड़े उत्पादक रहे हैं और भारत सबसे बडा़ ख़रीदार रहा है. नेपाल में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में काफी बडे़ होते हैं, लेकिन इंडोनेशिया और मलेशिया में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में छोटे होते हैं. भारत में रुद्राक्ष भारी मात्रा में नेपाल और इंडोनेशिया से मंगाए जाते हैं और रुद्राक्ष का कारोबार अरबों में होता है. सिक्के के आकार का रुद्राक्ष, जो ‘इलयोकैरपस जेनीट्रस’ प्रजाति का होता है, बेहद दुर्लभ होता जो नेपाल से प्राप्त होता है.

विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष |

भारत के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष की खेती की जाती है तथा इसके वृक्ष पाए जाते हैं. नेपाल, जावा, इंडोनेशिया, मलाया जैसे देशों में रुद्राक्ष उत्पन्न होता है. नेपाल ओर इंनेशिया में मिलने वाले रुद्राक्ष भारत में मिलने वाले रुद्राक्षों से अलग होते हैं. नेपाल में बहुत बडे़ आकार का रुद्राक्ष पाया जाता है तथा यहां पर मिलने वाले रुद्राक्ष की किस्में भी बहुत अच्छी मानी गई हैं. नेपाल में एक मुखी रुद्राक्ष बेहतरीन किस्म का होता है.

रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा हो दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं. भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते.

माना जाता है कि भारत में बिकने वाले 80 फीसदी रुद्राक्ष फर्जी होते हैं और उन्हें तराश कर बनाया जाता है. इसलिए रुद्राक्ष को खरीदने से पहले इसके गुणवत्ता को देखना बेहद आवश्यक है. अपने औषधीय और आध्यात्मिक गुणों के कारण रुद्राक्ष का प्रचलन बहुत है. रुद्राक्ष के गुणों के कारण ही सदियों से ऋषि-मुनि इसे धारण करते आए हैं.

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Shouldering The Burden Of Others

Is the misery less even if one is bound with chains made of gold?

No, bondage is bondage whether chains are made of gold or iron.The bondage of satkarma, good actions, is that of gold, and that of asatkarma, bad actions, iron. Both are to be broken off. One has to refrain from bad actions so that iron chains might not be forged; and good actions are to be effected, but offer the golden chains at the feet of Paramatma, saying: “I do not desire the fruits of my good actions, I offer them to You.“

As long as the physical body exists, some actions are bound to be performed. No one can help doing actions.Respiration is itself an action. Even if one does not desire any action and sleeps, then that sleep, too, is an action. Good, and not bad actions, must be performed, which too are to be offered to the Supreme. Now the question arises whether the reactions will be just (equal) to the actions, or less, or more. Equal and opposite reaction is the rule, but then, whether the enjoyment of the reaction of actions is purely psychic or physicopsychic is to be seen.

Where the action is purely mental, the reaction will be just equal to it. But the reaction of physico-psychic action does not affect the mind cent per cent. If the mind is not affected by physico-psychic action, nothing happens. If there be some quantity of the reaction of physico-psychic action (that affects the body), in that case, the reaction will be much more than the action performed. The mind will be affected just according to the psychic action ­ that is the case with psychic actions. Action in the pure physical sphere does not affect the mind. The pure psychic coupled with the physical of a physico-psychic reaction, add up to produce a greater reaction. So the quantity of reaction in case of a physico-psychic action becomes much greater. Hence one should be careful.

There are so many grades of spiritual practitioner. Some wish to exhaust their samskaras as soon as possible and accept whatever is due. Others say , “I am ready to bear the fruits of my own actions and bear the samskaras (reactions to past actions) of others.“

Some want to carry the burdens of others so that others might not be in trouble. The practitioner reaches a stage where complete devotion is aroused for the Supreme. Then one remains unaffected even if a cyclone of misery attacks him. The sadhaka of that stage is called `dagdhabiija’ or `burnt seed’. A dagdhabiija comes within the range of the psychic directly .

Biija means `seed’. Wherever a seed is sown, it sprouts into a plant; but where the seed is burnt, a plant is not produced. A sadhaka becomes dagdhabiija when he has no more pain or pleasure of his own. One who has surrendered in toto is dagdhabiija. All carry their own burdens, but if a dagdhabiija sadhaka so desires, he can carry the burdens of others also. And those who want to carry the burden of others do lessen the burden of Paramatma indirectly .You should remember this.

Do not remain worried about your individual problems at all. Be prepared to carry your own burden and be prepared also to carry the burdens of others. Then alone are you brave. Be dagdhabiija.

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केदारनाथ मंदिर

सच्ची श्रद्धा

नगरका नाम और ठीक समय याद नहीं है। वर्षा-ऋतु बीती जा रही थी; किंतु वर्षा नहीं हुई थी। किसानोंके खेत सूख रहे थे। चारे के अभाव में पशु मरणासन्न हो गये थे। जब कोई मानव-प्रयास सफल नहीं होता, तब मनुष्य उस त्रिभुवन के स्वामीकी ओर देखता है। गाँवके सब लोग गिरजाघरमें एकत्र हुए वर्षाके लिये प्रार्थना करने। एक छोटा बालक भी आया था; किंतु वह आया था अपने साथ छोटा सा छाता लेकर। किसी ने उससे पूछा-‘तुझे क्या इतनी धूप लगती है कि छाता लाया है?’

बालक बोला-‘वर्षा होगी तो घर भीगते जाना पड़ेगा, इससे मैं छाता लाया हूँ कि भीगना न पड़े।’

प्रार्थना की जायगी और वर्षा नहीं होगी, यह संदेह उस शुद्धचित बालक के मन में नहीं उठा। जहाँ इतना सरल विश्वास है, वहाँ प्रार्थना के पूर्ण होनेमें संदेह कहाँ। प्रार्थना पूर्ण होते-होते तो आकाश बादलों से ढ़क चुका था और झड़ी प्रारम्भ हो गयी थी। बालक अपना छाता लगाये आराम से घर गया। यह वर्षा इतनी भीड़ के प्रार्थना करनेसे होती या नहीं, कौन कह सकता है; किंतु वह हुई, क्योंकि प्रार्थना करनेवालोंमें वह सच्चा श्रद्धालु बालक भी था।

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करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक केदारनाथ मंदिर के कुछ महत्वपूर्ण राज पहली बार उजागर हुए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को मंदिर के 11-12वीं सदी में निर्मित होने प्रमाण मिले हैं।

केदारनाथ मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए अक्षरों (पुरालेखों) के अध्ययन के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा। मंदिर की दीवारों पर प्रारंभिक नागरी व नागरी में लिखे अक्षर मिले, जो 11-12वीं सदी में ही लिखे जाते थे।

गौरतलब है कि पिछले साल जून में आई प्राकृतिक आपदा के बाद केदारनाथ मंदिर के भीतर जमकर मलबा भर गया था। एएसआई को मलबे की सफाई के दौरान मंदिर की दीवारों पर जगह-जगह अक्षर (पुरालेख) गुदे हुए मिले, जिनके अध्ययन के लिए मैसूर से विभाग की इफिग्राफी ब्रांच के विशेषज्ञ बुलाए गए थे।

इफिग्राफी ब्रांच के निदेशक डॉ. रविशंकर की ओर से अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर विभाग के महानिदेशक व क्षेत्रीय कार्यालय, देहरादून को भेजी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरालेख प्रारंभिक नागरी व नागरी में दर्ज हैं, जिससे माना जा सकता है कि मंदिर 11-12वीं सदी में अस्तित्व में आया।

विशेषज्ञों ने चिंता भी जाहिर की कि पुरालेखों में किसी तारीख का उल्लेख नहीं मिला। न ही किसी राजवंश का नाम दीवारों में दर्ज पाया गया।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी पता चला कि यह पुरालेख मंदिर में आने श्रद्धालुओं या आमजन का है। इनकी लिखावट आड़ी-तिरछी पाई गई, क्योंकि किसी राजा या खास पुरालेख में बनावट आदि का विशेष ख्याल रखा जाता था। पुरालेखों में दान देने, भगवान को नमन करने व मंदिर तक सकुशल पहुंचने आदि का जिक्र मिला है।

अब तक मंदिर निर्माण की मान्यताएं

एक मान्यता के अनुसार केदारनाथ मंदिर को आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था, जबकि राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित अभिलेखों में मंदिर को 12-13वीं शताब्दी का बताया गया।

वहीं, ग्वालियर में मिली एक राज भोज स्तुति में मंदिर को 1076-99 काल का माना गया। पांडव या उनके वंशज जनमेजय के समय भी मंदिर निर्माण की बात सामने आती है।

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Are You Disconnected From Your Power Source?

When we play a game, we often become so engrossed in it that we forget everything else. Similarly, we become so engrossed in our daily lives that we forget who we really are. That forgetfulness cuts us off from our true power.
In a parable, the vine provides nutrients and life to a branch without which the branch can’t produce fruit.

A branch without its vine is merely a dead twig. We, too, must connect to a flow of energy from a power greater than our own.

For those of us connected to a spiritual path, the guru is the vine, the source of the power that sustains us.

When we cut ourselves off from the source that sustains us, we are left with only the power of ego. The ego has its realm, mainly in a small area of human activity involving will power, intellect, choice and the ability to function in society. But if we consider the many basic bodily processes that aren’t under our conscious control, such as breathing, circulation, digestion, and the beating of the heart, we see that there is a deeper power sustaining us. God does nearly everything, leaving only the tiniest part to us.

It reminds me of my granddaughter when she was three years old. We’d assemble all the pieces of a jigsaw puzzle except the last one. She would then turn that final piece many different ways and eventually , with a sense of great accomplishment, put it in place and say, “I’ve done the puzzle!“ We’re like that. God does 999 pieces of the puzzle, and when we put the last piece in place we say , “I did it all myself.“

Our egos are like little jets of flame on a gas burner: each one has the appearance of individuality; each is, in fact, but a spurt of the unifying gas underneath. As our consciousness expands, we become more and more aware of our connection to the Divine Source. Real spiritual growth begins when we recognise that true source.

To open ourselves more fully to that source, we need to realise first that we have much more inner strength when we realise ­ that the energy , intelligence and will we’re using come from an infinite ocean. Our will power is like a faucet. As we open up the valve, more and more water flows through.

Second, we have to connect to the deeper, more expansive parts of ourselves. This we can do by overcoming the delusion that we alone are the doer. God is the Doer through us. Third, we need to attune our consciousness to the guru who could help us realise our divinity . By attuning to his consciousness, we draw his grace.

Fourth, we need devotion. It is through the love of our hearts that we open a channel to that sustaining power. Grace then comes in, like sunlight through a window, and changes our consciousness.

Finally , we need to meditate deeply .In meditation we can experience God’s energy as the sound of Aum or as light. We expand not only by contacting that power, but also by offering ourselves into it. It’s like the branch and its leaves offering energy back to the vine that sustains it.

As we deepen our connection with the Divine, finally , we learn that there is no “I and Thou“. There is only the one Source. Then, with a flood of love, we re-establish our union with God and find our true power.

Om Namah Shivay

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Swadharma

Q: Guruji, what is Swadharma, and how do I know what is my Swadharma?

Guruji: Swadharma is that action which is in accordance with your nature. It is acting in accordance with your skills and talents, your own nature (svabhava), and that which you are responsible for (karma) . Any action that does not make you feel afraid or restless is Swadharma. That action which you feel compelled to do, without which you feel restless is swadharma. Now do not misunderstand this and say, ‘I feel restless if I do not drink alcohol’. No! Not at all. Every time you feel restless, it not always because of Swadharma. But at the same time not following your swadharma always makes you feel restless.

That is why it is said in the Bhagavad Gita, ‘Swadharme nidhanam shreyah paradharmo bhayaavahah’ (3.35). When we do something without authenticity, just to show off to another person, that is when we feel fear because such action is not genuine, it does not come from the heart. But when we do something that is authentic and from the heart, then there is no fear. When someone speaks lies, they definitely feel scared somewhere inside. But someone who speaks the truth does not feel scared at all. In fact speaking the truth and abiding by it brings so much strength to you, isn’t it? This is what Swadharma is.

When we follow that which comes naturally to us in our life, then it brings abundance and prosperity to us. When we flow in accordance with our nature, we grow from within. Any action that uplifts us is our Swadharma. Dharma is that which holds the mind, intellect, memory and our inner soul together in harmony. Growth comes when we follow our swadharma

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Don’t be too hard on yourself and don’t question your devotion. I would say we should never doubt our devotion. Take it for granted that you are devoted.

No child ever asks the mother, ‘do you love me?’ The mother never asks the child, ‘do you love me?’

The baby has no choice but to love the mother and neither the mother has any choice but to love the baby. Similarly devotion is inbuilt in every one of us.

Sometimes it is covered with ignorance, hesitation, doubts and insecurity. One’s own insecurity covers one’s devotion. It is only a matter of time for that strip of ignorance and ego to give way and then the inner devotee will shine up.

Om Namah Shivay

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All About Love, Aesthetics and Ecstasy

What is love? It is the expressed form of devotion. When does this expressed form occur?

When there is seed, only then it will sprout; that seed is devotion. So, only that one can make oneself great, who one can take the correct ideation of Parama Purusha, who has the seed of devotion within … How can you surrender without bhakti, devotion? Therefore, from ancient times aesthetic science existed and there was devotion. While one remains in aesthetic science, one does not get entry into supra-aesthetic science. One feels, “I am serving Parama Purusha, I like Him, because I get pleasure in serving Him, by taking His ideation I get joy .“ If you ask artists or architects why they do what they do ­ why do they create works of art ­ they will say, “We get pleasure from it.“ This is aesthetic science. A poet composes a poem, because he gets pleasure.

Parents love their child very much.Do they love for the sake of their child?

No! They love their child because they get pleasure for themselves. If their child turns into a vagabond, or becomes cruel, and he does not even utter the parents’ names, then parents do not get pleasure.

After that what happens? By taking the ideation of Parama Purusha, when the quantity of pleasure increases, a person loses the self first. He feels “I take the ideation of Parama Purusha not for my sake. I love Parama Purusha so that, because of my love, He gets pleasure. I may or may not get it.“ When this stage is attained, it is called Ragatmika Bhakti, when one feels, “I love Parama Purusha, I do not care whether He loves me or not.“ When this Ragatmika Bhakti is attained, in that stage one is also called Gopa as described in scriptures.

Gopa here does not mean the cowherd. Gopayate means to give pleasure ­ “Gopayate yah sah gopah.“

One whose nature is to give pleasure to Parama Purusha or Paramatma is Gopa. When one is established in Ragatmika Bhakti, from Raganuga one enters the arena of Mohana ijnana when one is fascinated and charmed, and in that state, art, architecture, all come to an end; one’s verbosity stops, one becomes mute. This is Ragatmika Bhakti.

So long as human beings are in the sphere of Raganuga Bhakti they are in domestic life; they create arts, architecture, literature and painting, and get pleasure in them. They are within the scope of aesthetic science ­ Nandana Vijnana.

And what happens when they are established in supra-aesthetic science ­ Ati Nandana Vijnana? All their worldly music is finished. All the Ragas and Raginis and the art of dancing, whatever they be, they come to an end.In that condition, there remains only an ecstatic state, Bhavibhora. The music of that state is called kirtana.

If you want to be established in Dharma Sadhana, then in any case do not forget the importance and greatness of kirtana, and also the greatness of devotion. Always remember that the devotion begins with aesthetic science and its ultimate domain ends where supra-aesthetic science ­ Mohana Vijnana ­ begins.

Om Namah Shivay

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