गंगा का पृथ्वी पर आगमन-3

भगवान विष्णु बोले-“हे गंगे! तुम नदी-रूप में पृथ्वीलोक पर रहोगी। मेरे अंशस्वरूप समुद्र तम्हारे पति होंगे। सभी नदियों में तुम सबसे श्रेष्ठ, सौभाग्यवती और पुण्यदायी होगी। हे देवी! कलियुग के पाँच हजार वर्षों तक तुम्हें भू-लोक में रहना पड़ेगा। सभी प्राणी देवी के रूप में तुम्हारी पूजा-अर्चना और स्तुति करेंगे। जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति-वंदना करेगा, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा। गंगा शब्द का निरंतर जाप करने वाले भक्तों के पूर्वजन्मों के भी समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे और मृत्यु के बाद वे मेरे परमधाम वैकुण्ठ को प्राप्त करेंगे।”

जब भगवान विष्णु ने गंगा की सभी शंकाओं पर समाप्त कर दिया, तब वे भागीरथ से बोलीं-“राजन! भगवान विष्णु की आज्ञा और आपके कठोर तप के फलस्वरूप मैं आपके साथ पृथ्वी पर चलने को तैयार हूँ। किंतु राजन! जब मैं स्वर्ग से धरातल पर आऊँगी, तो मेरा वेग बहुत तेज़ होगा। मेरे तीव्र वेग से पृथ्वी पाताल में पहुँच जाएगी। इसलिए राजन! यदि आप अपनी मनोकामना पूर्ण करना चाहते हैं तो पहले इस समस्या का समाधान करें।”

गंगा की बात सुनकर भागीरथ ने भगवान विष्णु से इसका समाधान करने की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु शिवजी से बोले-“महादेव! भागीरथ की इस समस्या का उपाय केवल आप ही कर सकते हैं। तीव्र वेग से धरातल पर उतरती गंगा का आप अपनी विशाल जटाओं में बाँध लें। इससे गंगा का वेग कम हो जाएगा और पृथ्वी पाताल में धँसने से बच जाएगी।”

शिवजी इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। तब गंगा देवी ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और नदी के रूप में धरातल की ओर चल पड़ीं। धरातल की ओर जाते समय उनकी गति अत्यंत तेज़ हो गई। ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो प्रलयकाल आ गया हो। मेघ भीषण गर्जन करने लगे। गंगा के वेग को देखकर पृथ्वी काँप उठी।

तभी भगवान विष्णु की प्रेरणा से शिवजी गंगा के मार्ग में आ गए और वे पूर्ण वेग से शिवजी की जटाओं में समा गईं। तब भगवान शिव ने अपनी जटा की एक लट खोलकर उनकी एक जलधारा पृथ्वी की ओर छोड़ दी। गंगा बड़ी धीमी गति से धरातल पर गिरने लगीं। इस प्रकार गंगा का आवेग कम हो जाने के कारण पृथ्वी पाताल लोक में धँसने से बच गई।

गंगा के धरातल पर पहुँचते ही राजा भागीरथ उनकी स्तुति करते हुए बोले-“हे परम कल्याणी देवी गंगा! पापियों के पाप धोने वाली पुण्यमयी देवी! आपको मेरा कोटि-कोटि नमन। माते! आपकी कृपा से संतानहीन को संतान की प्राप्ति हो। बंधन में पड़े हुए व्यक्ति के सभी बंधन कट जाएँ। पापियों के पाप, पुण्यों में बदल जाएँ। ये वर दें।”

इस प्रकार स्तुति-वंदना करते हुए भागीरथ गंगा को लेकर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ उनके पूर्वज कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से जलकर भस्म हो गए थे। पवित्र गंगा का स्पर्श पाते ही वे सभी मुक्त होकर वैकुण्ठ लोक चले गए।

इस प्रकार परम पावन गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ। राजा भागीरथ के प्रयत्न से ही पुण्यमयी गंगा पृथ्वी पर आ सकी थीं, इसलिए उन्हें ‘भगीरथी’ भी कहा जाने लगा।

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन-2

यह समाचार सुनकर सगर शोक में डूब गए। तब उनके पौत्र अंशुमान ने महर्षि कपिल की स्तुति कर उनका क्रोध शांत किया। महर्षि कपिल ने प्रसन्न होकर यज्ञ अश्व लौटा दिया। महर्षि को प्रसन्न देखकर अंशुमान ने उनसे मृत सगर-पुत्रों के उद्धार के विषय में पूछा। उन्होंने कहा कि गंगा की पवित्र जलधारा ही सगर-पुत्रों का उद्धार कर सकती है।

महर्षि कपिल के परामर्श के अनुसार राजा सगर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप करने लगे। उनकी मृत्यु के बाद अंशुमान ने और इसके बाद उनके पुत्र दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। किंतु वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हुए। अंत में अंशुमान के पौत्र भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए।

भगवान के दर्शन पाकर भागीरथ श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर भागीरथ से कहा-“वत्स! तुम्हारी कठोर तपस्या से मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम्हें अभिलषित वह प्रदान करने के लिए ही मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ। तुम निःसंकोच इच्छित वर माँग लो।”

भागीरथ बोले-“भगवन! अनेक वर्षों पूर्व कपिल मुनि ने अपने शाप से मेरे पूर्वजों को भस्म कर दिया था। तभी से मेरे पूर्वज प्रेत योनि में भटक रहे हैं। कपिल मुनि ने कहा था कि यदि गंगा पृथ्वीलोक में आकर अपने पवित्र जल से उनकी शुद्धि कर दें तो प्रेत योनि से उनका उद्धार हो जाएगा और वे आपके परम पद के अधिकारी हो जाएँगे।

भगवन! गंगा माता को पृथ्वी पर लाने के लिए मेरे परदादा राजा सगर, दादा अंशुमान और पिता दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। किंतु वे इसमें सफल नहीं हुए और तपस्या करते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए। तब मैंने उनके कार्य को सम्पन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। प्रभु! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो गंगा देवी को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।”

उसकी बात सुनकर भगवान विष्णु ने देवी गंगा से कहा-“गंगे! तुम अभी नदी के रूप में पृथ्वी पर जाओ और सगर के सभी पुत्रों का उद्धार करो। तुम्हारे स्पर्श से वे सभी राजकुमार मेरे परम धाम को प्राप्त होंगे। पृथ्वी पर जो भी पापी तुम्हारे जल में स्नान करेगा, उसके सभी पापों का नाश हो जाएगा। पर्वों और विशेष पुण्य तिथियों पर तुम्हारे जल में स्नान करने वाले प्राणियों को सुख-सम्पत्ति, भोग और ऐश्वर्य के अतिरिक्त मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त होगा। सूर्य-ग्रहण के समय तुम्हारे पवित्र जल में स्नान करने वालों को पुण्य और सुखों की प्राप्ति होगी। तुम्हारे स्मरण-मात्र से ही प्राणियों के समस्त दुखों और कष्टों का अंत हो जाएगा।”

यह सुनकर गंगा हाथ जोड़कर बोलीं-“प्रभु! आपकी आज्ञा मुझे स्वीकार है। किंतु मुझे पृथ्वीलोक पर कितने वर्षों तक रहना होगा? स्नान करके पापीजन अपने पाप मुझे दे देंगे। ऐसी स्थिति में मेरे उन पापों का नाश किस प्रकार होगा? दयानिधान! आप सर्वज्ञ हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। संसार की कोई बात आप से छिपी नहीं है। इसलिए मेरी इन शंकाओं का समाधान करें?”

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन-1

राजा सगर की केशिनी व महती नामक दो सुंदर रानियां थीं। एक दिन महर्षि और्व ने उन्हें वर देते हुए कहा- “तुम्हारी एक रानी को साठ हज़ार पुत्र प्राप्त होंगे, जबिक दूसरी को मात्र एक पुत्र! किंतु वंश चलानेवाला दूसरी रानी का ही पुत्र होगा। इसलिए इन दो वरों में जिसकी जो इच्छा हो, वह वही ले ले।” तब रानी केशिनी ने एक पुत्र वाला और महती ने साठ हज़ार पुत्रों वाला वर स्वीकार कर लिया।

कुछ समय बाद केशिनी ने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम असमंजस रखा गया। दूसरी रानी महती के गर्भ से बीजों से भरी एक थैली उत्पन्न हुई। उसमें बीज के आकर के साठ हज़ार अंडे थे। सगर ने उन्हें घी से भरे हुए घड़ों में रखवा दिया और उनका पोषण करने के लिए साठ हज़ार सेविकाएं नियुक्त कर दीं। उचित समय आने पर उनमें साठ हज़ार बालक उत्पन्न हुए। वे सभी बालक अति वीर, बलशाली और पराक्रमी थे। सगर इतने पुत्रों को देखकर हर्षित हो गए।

एक बार राजा सगर के मन में अश्वमेध यज्ञ करने का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने मंत्रियों को यज्ञ की तैयारी करने का आदेश दे दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ आरम्भ हुआ। यज्ञ-अश्व को छोड़ा गया. देवराज इन्द्र ने सोचा कि अश्वमेध यज्ञ करके राजा सगर कहीं उनका राजसिंहासन न हथिया ले। अतः उन्होंने दैत्य का रूप धारण कर यज्ञ अश्व को चुरा लिया और भगवान विष्णु के अंशावतार कपिल मुनि के आश्रम में छुपा दिया। अश्व का हरण होने पर ऋषि-मुनियों ने सगर से अतिशीघ्र यज्ञ-अश्व ढूंढने के लिए कहा।

राजा सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को यज्ञ का अश्व खोजने के लिए भेजा। उन्होंने सारी पृथ्वी छान डाली, किंतु उन्हें यज्ञ का अश्व कहीं भी दिखाई नहीं दिया। तब उन्होंने अपनी बलिष्ठ भुजाओं से पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया। उनके भीषण प्रहारों से पृथ्वी सहित वहां रहने वाले नागों, दैत्यों और अन्य प्राणियों की करुण चीत्कारें गूंजने लगीं।

सगर-पुत्र भूमि खोदते हुए महर्षि कपिल के आश्रम के निकट पहुंच गए। वहां उन्हें यज्ञ का अश्व बंधा हुआ दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि यज्ञ में विघ्न डालने के लिए कपिल मुनि ने ही यज्ञ-अश्व का हरण किया, अतः उन्होंने भगवान विष्णु अंशावतार महर्षि कपिल को अपशब्द कह दिए। तब मुनि ने क्रुद्ध होकर उन्हें भस्म कर डाला।

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गंगाजल की विलक्षणता

गंगाजल की विलक्षणता पर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस के अनेकों वैज्ञानिक  कई बार रिसर्च कर चुके हैं और हैरान हैं।

इंग्लैंड के मशहूर चिकित्सक सी.ई. नेल्सन ने जब गंगा जल पर रिसर्च की तो उन्होंने कहा कि इस पानी में कीटाणु नहीं होते।

महर्षि चरक को उद्धत करते हुए उन्होंने लिखा कि गंगा जल सही मायने में पीने योग्य है।

डॉ. हैकिन्स भी ब्रिटिश सरकार की ओर से गंगाजल पर रिसर्च करने आए। उन्होंने गंगा जल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले जो मात्र 6 घंटे मे ही नष्ट हो गए जबकि साधारण पानी मे हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले जाने पर वे कई गुणा बढ गए।

रूसी वैज्ञानिकों ने हरिद्वार एवं काशी में स्नान के उपरांत 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के बाद ही उन्हें समझ आया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं।

जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर अवधेशानंद जी कहते हैं, इस धरती पर कुछ अलौकिक है जिसे साइंस आज तक नहीं समझ पाई तो वह है गंगा, क्योंकि गंगा इस लोक की नहीं है।

अवधेशानंद जी कहते हैं-

” हमने कई बार वैज्ञानिकों से वाटर कल्चर कराया और 3 बार वाटर पारलियामेंट बिठाई है। वैज्ञानिकों का मानना है जो सबसे शुद्ध से शुद्ध पानी है उसमें 14 घटक होते हैं, जबकि गंगा में 16 हैं और बाकी के 2 कौन से हैं यह विज्ञान आज तक नहीं समझ पाया।”

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Save Rivers: Do not pollute!

Holy Ganga Compassionate Purifier is now Provider of Cancer!

Srimad Bhagavatam says waters of Ganga originated from lotus feet of Sri Hari. In His incarnation as Vamana he took the gigantic form of Trivikrama and measured all the three worlds and the entire creation in two steps. At that time His left foot reached Brahmaloka. Excited to see the His holy feet, Brahma immediately offered humble worship with water from his Kamandala. This holy water, purified and sanctified by the touch of the His feet, gushed down as the sacred Ganga.

Ganga is one of the major rivers of the Indian subcontinent and is the national river, flowing east through the Gangetic Plain of northern India into Bangladesh. The 2,510 km river rises in the western Himalayas in the Uttarakhand and drains into the Sunderbans delta in the Bay of Bengal. On the banks of this river are situated many well known places of pilgrimage such as Haridwar, Prayag and Kashi. It is on the banks of this holy river that many Rishis, Munis and Tapasvis have been performing their spiritual endeavours.

The minerals present in this holy river have the capacity to dissolve human bones in three months time which no other river in the entire world has. Even today scientists have not able to understand how this river water possesses certain qualities which cannot be found in the water of any other river of the world. Even many rivers that flow from the same Himalayan belt do not have the same qualities as the Ganges. The Himalayan range is the same, the suns heat is the same that fall on the ice on the peak of the mountain which melts and flows into the waters of all the rivers, but the quality of their water differs. Hence many believe Ganges is no ordinary river.

Scientists have also agreed that there is something special about its waters. To justify this Ganga water contains enormous amounts of viruses called “BACTERIOPHAGE” which kill bacteria and algae, which cause the water pollution and thus the water is potable for a long time. The river which could absorb thousands of dead bodies over so many years without stinking has been polluted to such an extent by human and industrial waste, that it is now regarded as causing cancer.

According to United Nations Development Programe (UNDP) report there are more than 29 cities, 70 towns and thousands of villages located on the banks of the river, depositing every year more than 13 billion liters of sewage directly into the river and 260 million liters of industrial wastes are added by hundreds of factories along the riverbanks. Added to it are the 6 million tones of chemical fertilizers and more 9000 tones of chemical pesticides that pollute the river.

When human bodies are not allowed to be dumped in the river so also strict warning should have been issued to all the industries that discharge effluents into this holy river. Aquatic life in the river is also affected endangering the “Ganga Dolphins” our national aquatic animal.

Save Rivers: Do not pollute!

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन-3

यह सुनकर गंगा हाथ जोड़कर बोलीं-“प्रभु! आपकी आज्ञा मुझे स्वीकार है। किंतु मुझे पृथ्वीलोक पर कितने वर्षों तक रहना होगा? स्नान करके पापीजन अपने पाप मुझे दे देंगे। ऐसी स्थिति में मेरे उन पापों का नाश किस प्रकार होगा? दयानिधान! आप सर्वज्ञ हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता हैं। संसार की कोई बात आप से छिपी नहीं है। इसलिए मेरी इन शंकाओं का समाधान करें?”

भगवान विष्णु बोले-“हे गंगे! तुम नदीरूप में पृथ्वीलोक पर रहोगी। मेरे अंशस्वरूप समुद्र तम्हारे पति होंगे। सभी नदियों में तुम सबसे श्रेष्ठ, सौभाग्यवती और पुण्यदायी होगी। हे देवी! कलियुग के पाँच हजार वर्षों तक तुम्हें भूलोक में रहना पड़ेगा। सभी प्राणी देवी के रूप में तुम्हारी पूजाअर्चना और स्तुति करेंगे। जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुतिवंदना करेगा, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होगा। गंगा शब्द का निरंतर जाप करने वाले भक्तों के पूर्वजन्मों के भी समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे और मृत्यु के बाद वे मेरे परमधाम वैकुण्ठ को प्राप्त करेंगे।

जब भगवान विष्णु ने गंगा की सभी शंकाओं पर समाप्त कर दिया, तब वे भागीरथ से बोलीं-“राजन! भगवान विष्णु की आज्ञा और आपके कठोर तप के फलस्वरूप मैं आपके साथ पृथ्वी पर चलने को तैयार हूँ। किंतु राजन! जब मैं स्वर्ग से धरातल पर आऊँगी, तो मेरा वेग बहुत तेज़ होगा। मेरे तीव्र वेग से पृथ्वी पाताल में पहुँच जाएगी। इसलिए राजन! यदि आप अपनी मनोकामना पूर्ण करना चाहते हैं तो पहले इस समस्या का समाधान करें।

गंगा की बात सुनकर भागीरथ ने भगवान विष्णु से इसका समाधान करने की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु शिवजी से बोले-“महादेव! भागीरथ की इस समस्या का उपाय केवल आप ही कर सकते हैं। तीव्र वेग से धरातल पर उतरती गंगा का आप अपनी विशाल जटाओं में बाँध लें। इससे गंगा का वेग कम हो जाएगा और पृथ्वी पाताल में धँसने से बच जाएगी।

शिवजी इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। तब गंगा देवी ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और नदी के रूप में धरातल की ओर चल पड़ीं। धरातल की ओर जाते समय उनकी गति अत्यंत तेज़ हो गई। ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो प्रलयकाल गया हो। मेघ भीषण गर्जन करने लगे। गंगा के वेग को देखकर पृथ्वी काँप उठी।

तभी भगवान विष्णु की प्रेरणा से शिवजी गंगा के मार्ग में गए और वे पूर्ण वेग से शिवजी की जटाओं में समा गईं। तब भगवान शिव ने अपनी जटा की एक लट खोलकर उनकी एक जलधारा पृथ्वी की ओर छोड़ दी। गंगा बड़ी धीमी गति से धरातल पर गिरने लगीं। इस प्रकार गंगा का आवेग कम हो जाने के कारण पृथ्वी पाताल लोक में धँसने से बच गई।

गंगा के धरातल पर पहुँचते ही राजा भागीरथ उनकी स्तुति करते हुए बोले-“हे परम कल्याणी देवी गंगा! पापियों के पाप धोने वाली पुण्यमयी देवी! आपको मेरा कोटिकोटि नमन। माते! आपकी कृपा से संतानहीन को संतान की प्राप्ति हो। बंधन में पड़े हुए व्यक्ति के सभी बंधन कट जाएँ। पापियों के पाप, पुण्यों में बदल जाएँ। ये वर दें।

इस प्रकार स्तुतिवंदना करते हुए भागीरथ गंगा को लेकर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ उनके पूर्वज कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से जलकर भस्म हो गए थे। पवित्र गंगा का स्पर्श पाते ही वे सभी मुक्त होकर वैकुण्ठ लोक चले गए।

इस प्रकार परम पावन गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ। राजा भागीरथ के प्रयत्न से ही पुण्यमयी गंगा पृथ्वी पर सकी थीं, इसलिए उन्हेंभगीरथीभी कहा जाने लगा।

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गंगा का पृथ्वी पर आगमन-2

यह समाचार सुनकर सगर शोक में डूब गए। तब उनके पौत्र अंशुमान ने महर्षि कपिल की स्तुति कर उनका क्रोध शांत किया। महर्षि कपिल ने प्रसन्न होकर यज्ञ अश्व लौटा दिया। महर्षि को प्रसन्न देखकर अंशुमान ने उनसे मृत सगरपुत्रों के उद्धार के विषय में पूछा। उन्होंने कहा कि गंगा की पवित्र जलधारा ही सगरपुत्रों का उद्धार कर सकती है।

महर्षि कपिल के परामर्श के अनुसार राजा सगर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप करने लगे। उनकी मृत्यु के बाद अंशुमान ने और इसके बाद उनके पुत्र दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। किंतु वे गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हुए। अंत में अंशुमान के पौत्र भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए।

भगवान के दर्शन पाकर भागीरथ श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर भागीरथ से कहा-“वत्स! तुम्हारी कठोर तपस्या से मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम्हें अभिलषित वह प्रदान करने के लिए ही मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ। तुम निःसंकोच इच्छित वर माँग लो।

भागीरथ बोले-“भगवन! अनेक वर्षों पूर्व कपिल मुनि ने अपने शाप से मेरे पूर्वजों को भस्म कर दिया था। तभी से मेरे पूर्वज प्रेत योनि में भटक रहे हैं। कपिल मुनि ने कहा था कि यदि गंगा पृथ्वीलोक में आकर अपने पवित्र जल से उनकी शुद्धि कर दें तो प्रेत योनि से उनका उद्धार हो जाएगा और वे आपके परम पद के अधिकारी हो जाएँगे।

भगवन! गंगा माता को पृथ्वी पर लाने के लिए मेरे परदादा राजा सगर, दादा अंशुमान और पिता दिलीप ने अनेक वर्षों तक कठोर तपस्या की। किंतु वे इसमें सफल नहीं हुए और तपस्या करते हुए उन्होंने प्राण त्याग दिए। तब मैंने उनके कार्य को सम्पन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। प्रभु! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो गंगा देवी को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।

उसकी बात सुनकर भगवान विष्णु ने देवी गंगा से कहा-“गंगे! तुम अभी नदी के रूप में पृथ्वी पर जाओ और सगर के सभी पुत्रों का उद्धार करो। तुम्हारे स्पर्श से वे सभी राजकुमार मेरे परम धाम को प्राप्त होंगे। पृथ्वी पर जो भी पापी तुम्हारे जल में स्नान करेगा, उसके सभी पापों का नाश हो जाएगा। पर्वों और विशेष पुण्य तिथियों पर तुम्हारे जल में स्नान करने वाले प्राणियों को सुखसम्पत्ति, भोग और ऐश्वर्य के अतिरिक्त मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त होगा। सूर्यग्रहण के समय तुम्हारे पवित्र जल में स्नान करने वालों को पुण्य और सुखों की प्राप्ति होगी। तुम्हारे स्मरणमात्र से ही प्राणियों के समस्त दुखों और कष्टों का अंत हो जाएगा।

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