Yoga is that which gives you pleasure and comfort

The definition for ‘asana’ is a posture that is stable and pleasant. You should feel comfortable when doing yoga asanas. What is the definition of comfort? When you don’t feel the body. If you are sitting in some odd positions then you feel those parts of the body, painfully. Your focus is more on the discomfort there. When you do any asana, what you feel first is discomfort. But if you take your mind through it, you will find that in just a few minutes the discomfort has disappeared and you don’t feel the body. You feel an expansion or infinity in the postures.

How should a posture be done? Get into a position and let go of the effort. What happens then? Infinity abides in you. So each asana should be done keeping in mind that the goal of this is not just the correctness of the posture, but to feel an expansion within. This is the most important thing in yoga asanas. The purpose of yoga is not only to keep a good physical shape but also to experience infinity and timeless expansion within. And that starts happening to you with some practice.

The other definition for yoga is to get back from the scenery to the seer. Slowly take your attention from outside to inside. First, from the environment, bring your attention to the physical body. Then go one step further because even the body is the scenery and take your attention to the mind. Now when you witness the thoughts that are coming in the mind, even that becomes the scenery. Go deeper. So movement from the scenery to the seer, to the one who is seeing everything is another definition of yoga.

Whenever you experience joy, ecstasy, bliss and happiness in life, knowingly or unknowingly you are abiding in the nature of the seer. Otherwise, at other times, you are with different activities of the mind, you are lost in them.

The Modulations of the Mind

What are these different activities of the mind? The modulations of the mind are of five forms; some are problematic and some are not. These are:

Pramana: when the mind is engaged in wanting proof

Viparyaya: means wrong understanding

Vikalpa: means an imaginary notion, not conforming to reality

Nidra: which means sleep

Smruti: living in memory

These five vrittis or modulations of the mind drain the potential of a human being. Having control over these modulations of the mind is what yoga is all about. They are like horses. If the reins of the horses are in your hands, then you can give them direction, but if you are at the mercy of the horse then it takes you wherever it goes. So it is said, ‘Yogah chitta vritti nirodaha’ – Yoga is that which arrests the modulations of the mind.

When you practice an asana, the goal is to feel comfortable and then feel the expansion; not by wanting to feel, but by letting go; by not ‘doing’ something. So the first step in yoga is to let go, to relax and the last step in yoga is also to let go and relax.

Om Namah Shivay

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Who is a yogi and what is a yogi’s way of life?

Q: Who is a yogi and what is a yogi’s way of life?

Guruji: A yogi is a child. A yogi is becoming a baby again and again. If you look at a baby, from about 3 months to 3 years he does almost all the asanas. It can even teach you pranayama. You don’t need a yoga teacher if you observe a baby. Similarly, all animals also do some asanas.

A yogi is one who is connected with the infinity; connected with everybody. He doesn’t feel isolated with anyone, at anytime. Yogi is one who is skillful, one who is flexible. Some people have a very flexible body, but their minds are very rigid. A rigid person is not very palatable. He cannot communicate properly and is not open to new ideas.

A yogi is one who is not rigid but at the same time who is not very mushy or wishy-washy; he is very straight forward. He has strength, yet is soft. He has a childlike innocence, yet depth in wisdom. He is childlike, not childish. He has a childlike simplicity, yet is wise. A yogi is sensible and sensitive.

Often people who think they are very sensible are not very sensitive, and people who are very sensitive are not sensible at all! A yogi is a perfect combination of sensibility and sensitivity.

Yogi is one who is loving, yet very centered. Often people who fall in love lose their centeredness, and people who are very centered, they don’t seem to be radiating love. A yogi is the perfect combination of head and heart; being centered and at the same time being very loving.

You can assign all ideal characteristics to a yogi because a yogi is one who is connected to the self, connected to the universe, connected to everybody; because everybody is connected.

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Q: Is meditation a part of yoga?

Guruji: Meditation is definitely a part of yoga. Yoga has to be meditative, else it will just become an exercise, gymnastics.

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The purpose of yoga is to put a smile on our face in spite of all the stress and tensions, or situations that we are put through in our day-to-day life.

Om Namah Shivay

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क्या आप उर्जा चक्र और कुंडलिनी जागृत करने के बारे में जानते हैं ?-2

कुंडलिनी जागरण के नियम :

1.सर्वप्रथम स्वयं को शुद्ध और पवित्र करें। शुद्धता और पवित्रता आहार और व्यवहार से आती है। आहार अर्थात सात्विक और सुपाच्चय भोजन तथा उपवास और व्यवहार अर्थात अपने आचरण को शुद्ध रखते हुए सत्य बोलना और सभी से विनम्रतापूर्वक मिलना।

2.स्वयं की दिनचर्या में सुधार करते हुए जल्दी उठना और जल्दी सोना। प्रात: और संध्या को संध्यावंदन करते हुए नियमित रूप से प्राणायाम, धारणा और ध्यान का अभ्यास करना।

3.कुंडलिनी जागरण के लिए कुंडलिनी प्राणायाम, अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। अपने मन और मस्तिष्क को नियंत्रण में रखकर कुंडलिनी योग का लगातार अभ्यास किया जाए तो 6 से 12 माह में कुंडलिनी जागरण होने लगती है। लेकिन यह सब किसी योग्य गुरु के सानिध्य में ही संभव होता है।

संयम और सम्यक नियमों का पालन करते हुए लगातार ध्यान करने से धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है और जब यह जाग्रत हो जाती है तो व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता। वह दिव्य पुरुष बन जाता है।

कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है जो सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित है। जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक व्यक्ति सांसारिक विषयों की ओर भागता रहता है। परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जो घूमती हुई ऊपर उठ रही है। यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है।

हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं। कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है तो उसका उद्देश्य सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है, लेकिन यदि व्यक्ति संयम और ध्यान छोड़ देता है तो यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।

जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है। फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुकती है उसके बाद फिर ऊपर उठने लग जाती है। जिस चक्र पर जाकर वह रुकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक उर्जा को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वस्थ और स्वच्छ कर देती है।

कुंडलिनी के जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर हो जाता है और उसका रूझान आध्यात्म व रहस्य की ओर हो जाता है। कुंडलिनी जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि का अनुभव करने लगता है।

कुंडलिनी जागरण के प्रारंभिक अनुभव : जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो व्यक्ति को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं। ॐ या हूं हूं की गर्जना सुनाई देने लगती है। आंखों के सामने पहले काला, फिर पील और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है।

उसे अपना शरीर हवा के गुब्बारे की तरह हल्का लगने लगता है। वह गेंद की तरह एक ही स्थान पर अप-डाउन होने लगता है। उसके गर्दन का भाग ऊंचा उठने लगता है। उसे सिर में चोटी रखने के स्थान पर अर्थात सहस्रार चक्र पर चींटियां चलने जैसा अनुभव होता है और ऐसा लगता है कि मानो कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। रीढ़ में कंपन होने लगता है। इस तरह के प्रारंभिक अनुभव होते हैं।

Om Namah Shivay

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क्या आप उर्जा चक्र और कुंडलिनी जागृत करने के बारे में जानते हैं ?-1

क्या आप जानते हैं आधुनिक विज्ञान का मानना है कि सारे आनुवांशिक और अन्य सभी रोगों का इलाज बिना किसी दवा के इस से संभव है?

ये हिंदूइस्म का ज्ञान था जो शायद आज हम अधिकतम भूल चुके हैं फिर भी अभी हजारों नागा व अन्य संत इन क्रियाओं को कुछ हद तक जानते हैं ?

इसी के द्वारा हमारे पूर्वज बिना कुछ खाए पिए हजारों वर्ष तपस्या करते थे और जीवित रहते थे ?

आज हमें जरुरत है वेदों के रहस्यों में डूब जाने की और अपने पुरातन ज्ञान को प्राप्त करने की आधुनिक विज्ञान वहीँ से निकल रहा है पर अफ़सोस हम नहीं ढूंढ रहे

Rig Veda 6.16.13 में मंत्र आता है:

तवामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत ।
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥

कुछ लोगों को लगता है की ये जादू है पर ये हमारे शरीर की ही उर्जा है जो सभी उर्जा चक्रों पर पूर्ण नियंत्रण के बाद जागती है और हमारे पूर्वज इसे जानते थे तभी ये अधिकतर हिन्दुओं को सुना सुना लगेगा |

हमारी प्राण शक्ति के केंद्र कुंडलिनी को अंग्रेजी भाषा में ‘serpent power’ कहते हैं। पहले विज्ञान भी इसको नहीं मानता था , क्यूँ की वो खुद कर के देख नहीं सकते थे पर आज उर्जा चक्रों की उर्जा वो देख चुके हैं तो वो आगे खोज कर रहे है

कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना नाड़ी में नाभि के निचले हिस्से में सोई हुई अवस्था में रहती है।

कुंडलिनी का कार्य : इससे सभी नाड़ियों का संचालन होता है। योग में मानव शरीर के भीतर 7 चक्रों का वर्णन किया गया है। कुंडलिनी को जब ध्यान के द्वारा जागृत किया जाता है, तब यही शक्ति जागृत होकर मस्तिष्क की ओर बढ़ते हुए शरीर के सभी चक्रों को क्रियाशील करती है। योग अभ्यास से सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत कर इसे सुषम्ना में स्थित चक्रों का भेदन कराते हुए सहस्रार तक ले जाया जाता है। यह कुंडलिनी ही हमारे शरीर, भाव और विचार को प्रभावित करती है।

चक्रों के नाम : मूलत: सात चक्र होते हैं:- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार।

नाड़ी और चक्र :
नाड़ीयाँ : इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों को शुद्ध करने के लिए सभी तरह के प्राणायाम का अभ्यास करना। इनके शुद्ध होने से शरीर में स्थित 72 हजार नाड़ियाँ भी शुद्ध होने लगती हैं। कुंडलिनी जागरण में नाड़ियों का शुद्ध और पुष्ट होना आवश्यक है। स्वर विज्ञान में इसका उल्लेख मिलता है।

सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार (Basal plexus) से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं। इड़ा को गंगा, पिंगला को यमुना और सुषुम्ना को सरस्वती कहा गया है। इन तीन ना‍ड़ियों का पहला मिलन केंद्र मूलाधार कहलाता है। इसलिए मूलाधार को मुक्तत्रिवेणी और आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणीकहते हैं।

चक्र : मेरुरज्जु (spinal card) में प्राणों के प्रवाह के लिए सूक्ष्म नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहा गया है। इसमें अनेक केंद्र हैं। जिसे चक्र अथवा पदम कहा जाता है। कई ना‍ड़ियों के एक स्थान पर मिलने से इन चक्रों अथवा केंद्रों का निर्माण होता है। कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो उस में शक्ति का संचार हो उठता है, मानों कमल पुष्प प्रस्फुटित हो गया और उस चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट हो जाती हैं।

इसके लाभ : कुंडलिनी योग ऐसी योग क्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने भीतर मौजूद कुंडलिनी शक्ति को जगाकर दिव्यशक्ति को प्राप्त कर सकता है। कुंडलिनी के साथ 7 चक्रों का जागरण होने से मनुष्य को शक्ति और सिद्धि का ज्ञान होता है। वह भूत और भविष्य का जानकार बन जाता है। वह शरीर में बाहर निकल कर कहीं भी भ्रमण कर सकता है। वह अपनी सकारात्मक शक्ति के द्वारा किसी के भी दुख दर्द-दूर करने में सक्षम होता है। सिद्धियों की कोई सीमा नहीं होती।

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खुद को कठिन कर्मों से तपाना ही है तप

भगवान शिव को सदैव से ही परब्रह्म कहा गया है। उनकी व्याख्या परमतत्व के रुप में की गई है। भगवान शिव की पूजा न केवल मनुष्य मात्र ही करते है। बल्कि देव, महर्षि, ऋषि और गन्धर्व तक करते है

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हे देव, आप ही इस संसार के सृजक, पालनकर्ता एवं विलयकर्ता हैं| चारो वेद आपके ही सहिंता गाते हैं,
तीनों गुण (सतो-रजो- तमो) आपसे ही प्रकाशित हैं|आपकी ही शक्ति त्रिदेवों में निहित है| इसके बाद भी कुछ मूढ़प्राणी आप की शक्तियों पर शंशय करते हैं जो की सर्वथा अनुचित है|
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खुद को कठिन कर्मों से तपाना ही है तप
तप अर्थात् तपना, दाह, दग्ध होना। अभिष्ट सिद्धि के लिए किया जाने वाला कठोर एवं कष्टदायक आचरण ही तप है। अपने ईष्ट को मनाने के लिए उनकी कृपा प्राप्त हो, इसके लिए कठिन तप का आचरण किया जाता है। तप भगवान को पाने का मार्ग तो है ही साथ ही खुद के शरीर को साधने के लिए भी आवश्यक क्रिया है। शरीर को कठिन क्रियाओं से हम मौसम और प्रकृति के अनुकूल बनाते हैं। इसी को तपस्या कहते हैं। तप के प्रकार-भूखे रहकर – जब तक मनोकामना पूर्ण ना हो तब तक भूखे रहकर(अनशन) करके तप किया जाता है।- गर्मी में अग्नि के करीब बैठकर एवं ठंड में पानी के अंदर खड़े होकर तप किया जाता है। बरसात में बाहर रहकर तप किया जाता है।कठिन मेहनत एवं प्रयास से ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करना ही तप है।अभिष्ट सिद्धि के अलावा पापों के प्रायश्चित के लिए भी तप किया जाता है। व्रत, उपवास, भूखा रहना, मौन रहना, सत्य बोलना एक समय भोजन करना, सुबह जल्दी उठना, योग करना, व्यायाम करना, दिन में नहीं सोना, शराब, सिगरेट, जुआ-सट्टा आदि कोई नशा नहीं करना अपने धर्म के अनुसार आचरण करना। यह सब तप की श्रेणी में ही आते हैं।शिवजी से विवाह करने के लिए माता पार्वती ने एवं श्रीगंगाजी को धरती पर उतारने के लिए भागीरथजी ने कठोर तप किया था।धरती और जल छ: माह तपते हैं,तभी उन्हें बरसात की ठंडी फुहार मिलती है। श्री रामचरितमानस में उल्लेख है कि तप से ब्रह्मा, विष्णु और शंकर सृष्टि का सृजन पालन और संहार करते हैं। तप में बड़ी शक्ति होती है।वैज्ञानिक महत्व – जिस तरह सोने को तपाने से उसका मेल निकल जाता है। उसी प्रकार शरीर को तप द्वारा सुखाने से उसके अंदर स्थित मल विकार का नाश हो जाता है। उपवास, व्रत करने से पेट की आंतों को आराम मिलता है। व्यायाम आदि एवं कम आहार से चुस्ती-स्फुर्ति बनी रहती है, तथा सभी कार्य समय पर निपटते हैं। दिन में नहीं सोने से कफ जनित रोग नहीं होते हैं। व्यसन आदि नहीं होने से शरीर रुग्ण नहीं होता तथा धन लाभ होता है।

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Patanjali Yoga Sutras – 12

As you all know, there are three gunas or qualities. They are sattva, rajas and tamas. Three gunas come into our life in cycles. When sattva comes, there is alertness, knowledge, interest and joy in everything. When rajo guna comes, more desires, selfishness, restlessness and sadness arise in us. When tamo guna comes, delusion, attachment, lack of knowledge, lethargy, all this comes. These three come in life, turn by turn. But one who is centered will watch, witness and just move through that very naturally, innocently, without being averse to it.

Skill in action is yoga
When aversion comes what happens? You are promoting it. Whatever you are averse to, you stay with it and whatever you crave for, you continue to crave for it. You allow the craving to continue. Without craving or aversion, moving through the guna is pure skill and that is yoga. It is said: ‘Yogaha karmasu kaushalam’ – the skill in action is yoga. Yoga itself means skill. Yoga is the skill to live life, skill to manage your mind, skill to deal with your emotions, skill to be with people, skill to be in love and not let love turn into hatred.

Everyone loves in this world. Everything loves, but that love does not stay too long as love. It immediately becomes hatred, almost immediately. But yoga is that skill, that preservative which maintains love as love throughout.

Question from the audience: Dear Guruji, if a habit is developed of separating oneself from everything in an artificial way, you will lose spontaneity, atunement with nature and will not be fully engaged in life by giving your 100 percent. How do you walk this tightrope? How do you know if you are too far from one side and the other?

Guruji : Dispassion does not divide you. In fact, it connects you. It connects you to the present moment totally. When you are not dispassionate, you are linked to the past or future. So, you are not connected to the present. Therefore, you are more divided.

When your mind is hoping for something or when you regret the past, you are not with the moment. But when you are centered, you are in the moment. So, when you are eating, you can taste every bite. You can enjoy every bite. Every look, every sight is fresh and new. Your love is like the first love. You look at everything like it is the first time.

Om Namah Shivay

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Patanjali Yoga Sutras – 11

Often people who have dispassion keep blaming the world. They are afraid of the objects of senses and keep running away from them. They think it is a big temptation. How can something tempt you if you are not under its control? The fear of temptation is worse.

Tatparam purusharakhyaterguna vaitrushunyam

Due to the knowledge of the Self, the person is in a higher state, being indifferent to the qualities.
– Patanjali Yoga Sutra #16

Once you know the nature of your being as total bliss, total pleasure, even the fear of the gunas, fear of the world and fear of the senses vanish. It is like a diabetic patient being afraid of sweets. Even looking at the sweet frightens them. It is forbidden. One who has found sweetness in oneself, whether sweets are there or are not there in front of such a person, it does not make any difference. This is paramavairagya or the supreme type of dispassion where one is not scared or running away from the world, but being in the world, remains completely detached. Centered. Do not even say the word detached, as it has been so distorted. Say centered.

People have very funny ideas about enlightenment
Every culture, every religion has its own ideas about it. In Christian culture, a rich man cannot be enlightened. It is impossible. You have to be in poverty to be enlightened. From the Christian point of view, Rama cannot be enlightened! Even a camel can go through a needle, but not a rich man!

Many years ago, once I was travelling from Bangalore to Delhi. I met a Christian priest at the airport. He looked at me and I smiled back. He came to talk to me and said, “I feel like talking to you, my dear brother. You seem to be a nice person.” He asked me if I believed in Jesus and I said yes. He was a little stunned. He asked me the question again and I said yes again. Then he asked if I was a Hindu. And I said, “Perhaps”. He then asked if I believed in Krishna and I said yes. He then said, “But how can Krishna be God? He is a butter thief. He was married. How can somebody be married and steal butter and all and be God? He is not the one who can give salvation. You know, Jesus is the only way. I was also a Hindu before and now I have become a Christian. From the time, I have become a Christian everything is happening. Jesus is taking care of me. I tell you, you better become a Christian.”

How can Krishna be enlightened? Jains do not think that Krishna is enlightened. He created the war. Arjuna was going to go away, take sanyas and renounce the world. Krishna brainwashed him and made him fight. Krishna was responsible for this huge war. How could he be enlightened? Stealing butter, having so many wives. Impossible!

Jains do not think that an enlightened person, sadhu, should ever wear clothes. Their idea of an enlightened person is one who walks nude. One who is not nude is a little less great. Who knows what will happen? What desires would come up in him? Whether they are free from lust or not, how would you know? What is the proof? Jain sadhus are nude. They do not wear any clothes. They are considered enlightened. This is their idea of enlightenment. They simply do not consider those as enlightened who eat two square meals a day. That too one who enjoys a meal is not at all enlightened. Can a saint eat chocolate? He is not a saint then!

Buddhists have got their own idea of who is and who is not enlightened. Somebody who sings, dances, looks at the whole world, pleasing the world is not enlightened. Someone who meets their family and sits with their family is definitely not enlightened. I have seen many of these so-called sanyasis. They are so afraid that they cannot meet their families. They run away from their family and fear that attachment for the family can come up anytime.

I know of a so-called sanyasi who would not meet his mother. He would meet everybody else but not the poor old lady who is his mother! What had she done? He would not meet her. She was 70 years old and would cry and cry. So-called sanyasis, nuns, brothers, fathers behave like this because that is the idea they have. When you can love everybody, why can’t you see your family members in the same light? Many sanyasis go through this difficulty in their heads about not seeing their family. These are all just concepts about enlightenment. The main essence forgotten is dispassion or centeredness. Being centered in spite of everything is the second essential principle in yoga. This is vairagya.

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