किस देवी-देवता की कितनी बार करें परिक्रमा, ताकि मिले मनोवांछित फल-2

कार्तिकेय तथा गणेश की परीक्षा

मां पार्वती की बात सुनकर कार्तिकेय तो झट से अपने मोर पर सवार होकर निकल गए ब्रह्मांड की परिक्रमा करने, लेकिन गणेश जी वहीं खड़े थे। वे आगे बढ़े, अपने दोनों हाथ जोड़े और अपने माता-पिता की परिक्रमा करने लगे। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं।

गणेश जी ने समझाया

बाद में प्रभु गणेश से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। यह कथा हमें परिक्रमा करने का महत्व समझाती है, लेकिन महत्व के साथ किस देवी-देवता की कितनी बार परिक्रमा की जाए यह भी जानना अति आवश्यक है।

परिक्रमा के नियम

जिस प्रकार से हिन्दू धर्म में हर धार्मिक कार्य एक सम्पूर्ण विधि-विधान से युक्त होता है, ठीक इसी प्रकार से परिक्रमा करने के लिए भी नियम बनाए गए हैं। परिक्रमा किस तरह से की जानी चाहिए, कितनी बार की जाए यह सब जानना जरूरी है। तभी आपके द्वारा की गई परिक्रमा फलित सिद्ध होगी।

किसकी कितनी बार की जानी चाहिए परिक्रमा

यहां हम आपको केवल देवी-देवता की परिक्रमा कितनी बार की जानी चाहिए, इसकी जानकारी देंगे। यदि आप श्रीकृष्ण की मूर्ति की परिक्रमा कर रहे हैं तो इसे तीन बार करें। तभी फल की प्राप्ति होती है।

शक्ति का रूप

आदि शक्ति के किसी भी स्वरूप की, मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, मां पार्वती, इत्यादि किसी भी रूप की परिक्रमा केवल एक ही बार की जानी चाहिए।

भगवान विष्णु

इसी तरह से भगवान विष्णु एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए। श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है। शिवजी की आधी परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि शिवजी के अभिषेक की धारा को लांघना अशुभ माना जाता है। शायद यह बात आप पहले से जानते ना हों, इसलिए भविष्य में ध्यान रखिएगा।

ये गलतियां ना करें

परिक्रमा कितनी बार करें यह तो आपने जान लिया, लेकिन परिक्रमा करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान भी रखें। क्योंकि इस दौरान की गई गलतियां आपकी परिक्रमा को बेकार कर सकती हैं। परिक्रमा करने के आपके उद्देश्य को निष्फल कर सकती हैं।

मंत्रों का जप कर सकते हैं

आप जिस भी देवी-देवता की परिक्रमा कर रहे हों, उनके मंत्रों का जप करना चाहिए। इससे आपको अधिक लाभ मिलेगा। भगवान की परिक्रमा करते समय मन में बुराई, क्रोध, तनाव जैसे भाव नहीं होना चाहिए। परिक्रमा स्वयं आपका मन शांत जरूर करती है, लेकिन उससे पहले भी आपको खुद को शांत करना होगा।

जान लें नियम

एक बात का विशेष ध्यान रखें, परिक्रमा हमेशा नंगे पैर ही करें। परिक्रमा शास्त्रों के अनुसार एक पवित्र कार्य है, इसलिए पैरों में चप्पल पहनकर उसे अशुद्ध नहीं किया जाना चाहिए।

शांत मन से परिक्रमा करें

एक और बात… परिक्रमा करते समय बातें नहीं करना चाहिए। शांत मन से परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला पहनेंगे तो बहुत शुभ रहता है।

गीले वस्त्रों के साथ परिक्रमा

शायद आपने कभी गौर किया हो कि परिक्रमा करने से पहले लोग स्नान करते हैं, वस्त्रों को पहने हुए ही जल में डुबकी लगाते हैं और गीले वस्त्रों से ही परिक्रमा करते हैं। दरअसल शरीर को गीला करके परिक्रमा करना शुभ माना गया है, और एक बार बदन गीला करने से जल्द ही सूख जाता है। इसलिए वस्त्र ही गीले कर लिए जाते हैं।

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किस देवी-देवता की कितनी बार करें परिक्रमा, ताकि मिले मनोवांछित फल-1

भगवान की भक्ति

किसी से यदि पूछें कि वे भगवान को किस प्रकार से याद करते हैं, तो भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्तर प्राप्त होते हैं। कोई कहता है कि प्रभु के नाम का जप करने से उन्हें याद किया जाता है तो कोई कहता है कि रागमयी अंदाज़ से भजन के माध्यम से उन्हें याद किया जाता है। यह भजन हमें ईश्वर से जोड़ते हैं, ऐसा मानते हैं लोग। लेकिन वहीं कुछ लोगों ने प्रभु की आराधना करने के विभिन्न तरीकों में कुछ छोटे-छोटे तरीके भी जोड़ दिए हैं, जिनका अपना ही एक खास अर्थ एवं महत्व है।

परिक्रमा है एक माध्यम

उदाहरण के लिए धार्मिक स्थलों पर भक्तों द्वारा की जा रही परिक्रमा की ही बात कर लीजिए। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या किसी भी अन्य धार्मिक स्थल पर आपने लोगों को उस पवित्र स्थल की, वहं मौजूद भगवान की मूरत की या फिर किसी भी ऐसी चीज़ के आसपास चक्कर लगाते हुए देखा होगा जिसकी जनमानस में काफी मान्यता है।

क्या है मान्यता

लोग कहते हैं कि परिक्रमा करनी जरूरी है, लेकिन क्या कभी आपने जाना है क्यों? परिक्रमा, जिसे संस्कृत में प्रदक्षिणा कहा जाता है, इसे प्रभु की उपासना करने का माध्यम माना गया है। सनातन धर्म के महत्वपूर्ण वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद से हमें प्रदक्षिणा के बारे में जानकारी मिलती है।

ऋग्वेद में क्या लिखा है?

ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों (प्रा + दक्षिणा) में विभाजित किया गया है। इस शब्द में मौजूद प्रा से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा। यानी कि ऋग्वेद के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। इस परिक्रमा के दौरान प्रभु हमारे दाईं ओर गर्भ गृह में विराजमान होते हैं। लेकिन यहां महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि प्रदक्षिणा को दक्षिण दिशा में ही करने का नियम क्यों बनाया गया है?

दक्षिण दिशा में हो परिक्रमा

मान्यता है कि परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है तभी हम दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़ते हैं। यहां पर घड़ी की सूई की दिशा में परिक्रमा करने का भी महत्व मौजूद है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के आधार पर ईश्वर हमेशा मध्य में उपस्थित होते हैं। यह स्थान प्रभु के केंद्रित रहने का अनुभव प्रदान करता है।

मध्य में भगवान

यह बीच का स्थान हमेशा एक ही रहता है और यदि हम इसी स्थान से गोलाकार दिशा में चलें तो हमारा और भगवान के बीच का अंतर एक ही रहता है। यह फ़ासला ना बढ़ता है और ना ही घटता है। इससे मनुष्य को ईश्वर से दूर होने का भी आभास नहीं होता और उसमें यह भावना बनी रहती है कि प्रभु उसके आसपास ही हैं।

परिक्रमा करने का लाभ

यदि आप परिक्रमा करने के लाभ जानेंगे तो वाकई खुश हो जाएंगे। क्योंकि परिक्रमा तो भले ही आप करते होंगे, लेकिन शायद ही इससे मिलने वाले आध्यात्मिक एवं शारीरिक फायदों को जानते होंगे। जी हां… परिक्रमा करने से हमारी सेहत को भी लाभ मिलता है।

ऊर्जा मिलती है

यूं तो हम मानते ही हैं कि प्रत्येक धार्मिक स्थल का वातावरण काफी सुखद होता है, लेकिन इसे हम मात्र श्रद्धा का नाम देते हैं। किंतु वैज्ञानिकों ने इस बात को काफी विस्तार से समझा एवं समझाया भी है। उनके अनुसार एक धार्मिक स्थल अपने भीतर कुछ ऊर्जा से लैस होता है, यह ऊर्जा मंत्रों एवं धार्मिक उपदेशों के उच्चारण से पैदा होती है। यही कारण है कि किसी भी धार्मिक स्थल पर जाकर मानसिक शांति मिलती है।

सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति

परिक्रमा से मिलने वाला फायदा भी इसी तथ्य से जुड़ा है। जो भी व्यक्ति किसी धार्मिक स्थान की परिक्रमा करता है, उसे वहां मौजूद सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह ऊर्जा हमें जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। इस तरह ना केवल आध्यात्मिक वरन् मनुष्य के शरीर को भी वैज्ञानिक रूप से लाभ देती है परिक्रमा।

परिक्रमा का इतिहास

यदि परिक्रमा का इतिहास जाना जाए तो सबसे पहली परिक्रमा शायद गणेश जी द्वारा अपने माता-पिता, माता पार्वती एवं भगवान शिव की गयी थी। पुराणों में उल्लिखित इस कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश की परीक्षा लेने का सोचा। उनसे कहा कि जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर सबसे पहले कैलाश पर्वत वापस लौटेगा, वही उनकी नजर में सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा।

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तप के चमत्कार का प्रतीक है बद्रीनाथ धाम-2

बद्रीनाथ क्षेत्र को अनादि क्षेत्र कहा जाता है । पौराणिक कथा है कि भगवान विष्णु का निवास क्षीर सागर में माना जाता है । जहां वह शेष शैय्या पर लेटे रहते हैं । जहां देवी लक्ष्मी उनके पैर दबाती हैं । एक बार इस पर ऋषि नारद के टिप्पणी करने पर भगवान विष्णु का मन आहत हुआ । इसके बाद भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी को नाग कन्या के यहां भेज दिया और स्वयं हिमालय पर तपस्या करने के लिए चले गए । हिमालय में भगवान विष्णु बैर अर्थात् बदरी को खाते रहे, और तपस्या करते रहे । इधर नागकन्याओं के यहां से देवी लक्ष्मी लौटी और क्षीर सागर में भगवान विष्णु को न पाकर वह हिमालय में आई । वहां देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बैर या बद्री के जंगलों में तपस्या करते देखा । तब उन्होंने भगवान को बद्रीनाथ अर्थात् बैरों के वन के बीच तपस्या में लीन स्वामी, नाम से पुकारा । तब से ही इस क्षेत्र का नाम बद्रीनाथ हुआ। 

पहुंच के संसाधन : बद्रीनाथ जाने का मुख्य मार्ग ऋषिकेश से है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी २९५ किमी है। ऋषिकेश के आस-पास बस सेवा व हवाई सेवाएं उपलब्ध हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा डेढ़ दिन की है। किंतु पहले केदारनाथ यात्रा पर जाने वाले तीर्थ यात्री रुद्रप्रयाग वापस लौटें और फिर बद्रीनाथ जाएं।

यात्रा का समय : मंदिर के कपाट नवंबर के दूसरे या तीसरे सप्ताह में बंद होते हैं । मान्यता है कि इस अवधि में भगवान योग ध्यान मुद्रा में रहते हैं और उनकी पूजा देवता करते हैं। बर्फ गिरने के कारण भी बद्रीनाथ धाम सर्दी में छह महीने बंद रहता है। नवंबर से मई माह के बीच भी यहां बेहद सर्दी होती है। मंदिर के पट अप्रैल के अंतिम या मई के प्रथम सप्ताह में खुलते हैं। मंदिर खुलने के दिन अखंड ज्योति के दर्शन का बहुत महत्व है ।

सलाह – यह पहाड़ी यात्रा है । ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा के रास्ते में खान-पान, ठहरने का समुचित प्रबंध है । लेकिन पानी उबालकर पीना चाहिए। बद्रीनाथ मार्ग में आस-पास बर्फ चट्टानें खिसकना आम बात है। इसलिए प्राकृतिक संकट के प्रति सावधान रहना आवश्यक है । कार या अन्य निजी वाहन से जाते समय पहाड़ी क्षेत्र में वाहन की गति धीमी रखें।

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तप के चमत्कार का प्रतीक है बद्रीनाथ धाम-1

बद्रीनाथ धाम हिमालय पर्वत की श्रेणी पर नर और नारायण पर्वतों के बीच अलकनंदा नदी के दक्षिण किनारे पर स्थित है। शास्त्रों में इसे विशालपुरी भी कहा गया । यह वैष्णव धाम है। अर्थात् यहां भगवान विष्णु की पूजा होती है । भारत की उत्तर दिशा में हिमालय पर स्थित हिंदुओं के सबसे प्राचीन तीर्थों में एक है। बद्रीनाथ का मंदिर समुद्र तट से लगभग ३५८३ मीटर की ऊंचाई पर है। पौराणिक मान्यताओं में बद्रीनाथ की स्थापना सतयुग में मानी जाती है । वेदों में भी बद्रीकाश्रम का वर्णन आया है । मंदिर में वर्तमान में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति को आठवीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने नारदकुंड से निकालकर तप्तकुंड के पास गरुड़ गुफा में बद्रीविशाल के रूप में प्रतिष्ठित किया था। इसके बाद मंदिर का प्रशासन टेहरी गढ़वाल के महाराजा के पास आया । उनके द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया । मंदिर के मुख्य द्वार पर सुंदर चित्रकारी है । इसे सिंहद्वार कहते हैं । मंदिर के गुम्बज पर होल्कर रानी अहिल्याबाई द्वारा भेंट किया गया सोने का कलश आज भी स्थित है । बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं की काले पाषाण की बहुत छोटी मूर्ति है। भगवान पद्मासन की स्थिति में हैं । उनके मस्तक पर हीरा लगा है। मुकुट स्वर्ण मंडित है। इस मूर्ति के आस-पास नर-नारायण, उद्धवजी, कुबेर और नारदजी की मूर्ति है। मंदिर के समीप अलकनंदा के तट पर तप्त कुंड है, जिसका जल बहुत गरम होता है ।

महत्व :- बद्रीनाथ में भगवान विष्णु का तीर्थ होने से इसका महत्व वैकुंठ की तरह माना जाता है। यहां वेदों का संपादन करने वाले वेदव्यास मुनि का आश्रम था । यहां से कुछ दूर स्थित माना गांव में गणेश गुफा एवं व्यास गुफा है । ऐसी मान्यता है कि यहीं सरस्वती नदी के तट पर वेद व्यास ने महाभारत एवं श्रीमद्भागवत की रचना की । यह केशव प्रयाग के नाम से जाना जाता है । नारद मुनि ने भी यहां तपस्या की थी, जिससे यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है । भगवान कृष्ण के मित्र उद्धव भी यहां तपस्या के लिए आए। बद्रीनाथ के पास ही अन्य धार्मिक एवं दर्शनीय स्थान है- जिनमें नारद कुंड, पंच शिला, वसुधारा, ब्रह्मकपाल, सोमतीर्थ, माता मूर्ति, शेष नेत्र, चरण पादुका, अलकापुरी, पंचतीर्थ व गंगा संगम आदि प्रमुख हैं। बद्रीनाथ तीर्थ के लगभग ५ किमी आगे भारत का अंतिम गांव माना या मणिभद्रपुर स्थित है । इसके बाद तिब्बत-चीन की सीमा है। अत: इस तीर्थ का सामरिक महत्व भी है। 

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नंदिकेश्वर तीर्थ की कथा

शिव पुराण – –
अध्याय 14- नंदिकेश्वर तीर्थ की कथा
तीर्थस्थान एक पवित्र पूजनीय स्थान होता है। नंदिकेश्वर तीर्थ में एक सुप्रसिद्ध शिवलिंग है। करणकी नामक स्थान पर एक ब्राह्मण रहता था। वह अपने दोनों पुत्रों को अपनी पत्नी के पास छोड़कर वाराणसी घूमने गया। फिर ज्ञात हुआ कि वाराणसी में ही ब्राह्मण का देहांत हो गया। उसकी विधवा पत्नी ने अकेले ही बच्चों का पालन-पोषण किया और अंत में उनका विवाह कर दिया। तब तक वह भी वृद्ध हो चुकी थी, और उसका अंत समय निकट आ गया था।

किन्तु उसे मृत्यु आ ही नहीं रही थी। उसके पुत्रों को प्रतीत हुआ कि संभवतः उनकी माँ किसी चीज़ के लिये अत्यधिक लालायित थी, और जब तक उसकी इच्छा पूरी नहीं होती, वह देह त्याग नहीं कर पायेगी।
उन्होंने पूछा, “माँ, आपकी क्या अभिलाषा है?”
माँ बोली, “मैं सदैव वाराणसी तीर्थ की यात्रा करना चाहती थी। लेकिन अब मैं बिना वह दर्शन किये जा रही हूँ। मुझे वचन दो कि मेरी मृत्यु के बाद मेरी अस्थियां वाराणसी में लेजाकर वहाँ गंगा में प्रवाहित करोगे।”
पुत्र बोले, “हम ऐसा ही करेंगे। आप शांति से देह त्यागें।”
माँ ने देह त्याग दिया और पुत्रों ने उनका अंतिम संस्कार किया। फिर, बड़े पुत्र, सुवादी माँ की अस्थियां लेकर वाराणसी के लिये निकल पड़ा। रास्ता लंबा था। एक स्थान पर वह रात्रि बिताने के लिये एक ब्राह्मण के घर में ठहरा।
घर के बाहर एक गाय बंधी थी और दूध दुहने का समय हो गया था। सुवादी ने देखा कि जब ब्राहमण ने दूध दुहने का प्रयास किया तो उसका बछड़ा उसे दूध दुहने ही नहीं दे रहा था। तब, ब्राहमण ने उसे एक छड़ी से मारा। ब्राहमण तो दूध दुहकर चला गया। लेकिन सुवादी वहीं था और उसने गाय को कहते हुए सुना कि, “मुझे दुःख है कि ब्राह्मण ने तुम्हें मारा। कल मैं ब्राहमण के पुत्र को अपनी सींग से मार डालूंगी।”
अगले दिन, ब्राह्मण का पुत्र दूध दुहने आया। गाय ने उसे अपनी सींग से मार डाला। किन्तु इसके साथ ही गाय ने ब्राह्मण की हत्या का पाप भी कर दिया। उसके इस पाप के कारण, वह श्वेत गाय तुरंत ही पूरी तरह से काली पड़ गयी।
गाय ने वह घर छोड़ दिया। इस आश्चर्यजनक दृश्य से हतप्रभ, सुवादी भी उसके पीछे-पीछे चला। गाय नर्मदा नदी के तट पर स्थित, नंदिकेश्वर नामक स्थान पर गयी। उसने नदी में स्नान किया, और उसे पुनः अपना श्वेत रंग प्राप्त हो गया। इसका अर्थ था कि उसका ब्राह्मण की हत्या का पाप पूरी तरह से धुल गया था। सुवादी यह देखकर अचंभित था, कि नंदिकेश्वर कितना शक्तिशाली तीर्थ-स्थल है!
नदी में स्नान करके वह वाराणसी के ल्लिये प्रस्थान करने ही वाला था, कि एक सुन्दर महिला उसके सामने आकर बोली, “कहाँ जा रहे हो, सुवादी? अपनी माँ की अस्थियाँ इसी नदी में प्रवाहित कर दो। यह वाराणसी से भी बड़ा तीर्थ-स्थान है।
सुवादी ने पूछा, “आप कौन हैं?”
उत्तर मिला, “मैं गंगा हूँ।”
महिला अदृश्य हो गयी, और सुवादी ने वैसा ही किया। जैसे ही उसने ऐसा किया, आकाश में उसकी माँ प्रकट हुईं, और बोलीं, कि वह पूर्णतः संतुष्ट हैं। अब वह सीधे स्वर्ग में जायेंगी। नंदिकेश्वर बहुत ही पुन्य-प्रदान करने वाला तीर्थ है, क्योंकि प्राचीन काल में ऋषिका नामक एक ब्राहमण कन्या ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिये यहाँ कठोर तप किया था।”

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Story of Nandikeshwara Teertha

Shiv Puraan –
Chapter 14- Story of Nandikeshwara Teertha

A tirtha is a place of pilgrimage. At a tirtha named Nandikeshvara, there is a famous Shiva linga. In a city named Karnaki there used to live a brahmana. He left his two sons with his wife and went to visit the city of Varanasi. It was then learnt that the brahmana had died in Varanasi. His widow brought up her sons and eventually married them off. She became old and it was time for her to die.

But death would not come. It seemed to the sons that their mother was hankering after something and would not die until her wish had been satisfied.

Mother, they asked, What is it that you want?

I have always wanted to visit the tirtha of Varanasi, the mother replied. But now I am going to die without ever visitng the place. Promise me that when I am dead, you will take my ashes to Varanasi and throw them into the river Ganga there.

We will, said the sons. You can die in peace.

The mother died and the sons performed her funeral ceremony. Then the eldest son, Suvadi, set out for Varanasi with his mother’s ashes. The way was long and he stopped to rest and spend the night in a brahmana’s house.

A cow was tied in front of the house and it was time for milking. Suvati saw that when the brahmana tried to milk the cow, the calf would not permit the milking and kicked the brahmana. The brahmana then hit the calf with a stick. The brahmana went away after the milking. But Suvadi was still there and and he heard the cow tell her calf, I am distressed that the brahmana struck you. Tomorow I am going to gore the brahmana’s son to death.

Next day, the brahmana’s son came to do the milking. The cow gored him with horns so that he died. But this meant that the cow had committed the sin of killing a brahmana. Immediately, because of the sin, the white cow turned completely black.

The cow left the house. Suvadi followed, amazed at this strange sight. The cow went to the banks of the river Narmada, to the place named Nandikeshvara. She bathed in the river and became white once again. This meant that the sin of killing a brahmana had been completely washed away. Suvadi marvelled at this and realized what a powerful tirtha Nandikeshvara was.

He was about to leave for Varansi after bathing in the river himself, when he was accosted by a beautiful woman.

Where are you going, Suvadi? asked the woman. Throw your mother’s ashes in the river here. This is a far greater tirtha than Varanasi.

Who are you? asked Survadi.

I am the river Gangaa, came the reply.

The woman vanished and Suvadi did as he had been bidden. As soon as he had done this, his dead mother appeared in the sky and told him that she was immensely gratified. She would now go straight to heaven.

Nandikeshvara is a wonderful tirtha because a brahmana woman named Rishika had earlier performed very difficult tapasya there to please Shiva.

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51 शक्तिपीठों के बारे में जानें

पुराणों में 51 शक्तिपीठो का वर्णन है। आइए जानते हैं देश-विदेश में स्थित इन शक्तिपीठों के बारे में| 51 शक्तिपीठों के सन्दर्भ में जो कथा है वह यह है कि सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था। परन्तु सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए लेकिन सती जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई, वहां शिव की निन्दा सुनकर वह यज्ञकुण्ड में कूद गईं तब भगवान शिव ने सती के वियोग में सती का शव अपने सिर पर धारण कर लिया और सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहा महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। इस पर विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड करने का विचार किया। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। इस प्रकार जहां जहां सती के अंग के टुकड़े, वस्त्र या आभूषण गिरे, वहीं शक्तिपीठ का उदय हुआ।

हालांकि देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में जरूर 51 शक्तिपीठों की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं और पूजा-अर्चना द्वारा प्रतिष्ठित हैं।

ज्ञातव्य है की इन 51 शक्तिपीठों में भारत-विभाजन के बाद 5 और भी कम हो गए और आज के भारत में 42 शक्ति पीठ रह गए है। पाकिस्तान में और बांग्लादेश में, श्रीलंका में, तिब्बत में तथा नेपाल में है।

1. किरीट कात्यायनी
पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है किरीट शक्तिपीठ, जहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।

2 कात्यायनी कात्यायनी
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं।

3 करवीर शक्तिपीठ
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

4 श्री पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

5 विशालाक्षी शक्तिपीठ
उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

6 गोदावरी तट शक्तिपीठ
आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

7 शुचीन्द्रम शक्तिपीठ
तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

8 पंच सागर शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

11. अट्टहास शक्तिपीठ
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष

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