कर्तव्य

वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते ।
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कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता । छोटे-से-छोटा और बडे-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है ।
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जिससे दूसरोंका हित होता है, वही कर्तव्य होता है । जिससे किसीका भी अहित होता है, वह अकर्तव्य होता है ।
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राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यको कर्तव्य-पालनमें परिश्रम या कठिनाई प्रतीत होती है ।

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मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें अपने कर्तव्यका पालन कर सकता है । कर्तव्यका यथार्थ स्वरूप है‒सेवा अर्थात् संसारसे मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको संसारके हितमें लगाना ।
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अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है । इसके विपरीत अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक खिन्नता रहती है ।
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साधक आसक्तिरहित तभी हो सकता है, जब वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको ‘मेरी’ अथवा ‘मेरे लिये’ न मानकर, केवल संसारकी और संसारके लिये ही मानकर संसारके हितके लिये तत्परतापूर्वक कर्तव्य-कर्मका आचरण करनेमें लग जाय ।

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असली गुरु वह होता है, जो दूसरेको अपना शिष्य नहीं बनाता, प्रत्युत गुरु ही बनाता है अर्थात् तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त बना देता है, दुनियाका उद्धार करनेवाला बना देता है । ऐसा गुरु गुरुओंकी टकसाल, खान होता है ।

वास्तवमें जो महापुरुष (गुरु) होते हैं, वे शिष्य नहीं बनाते । उनके भीतर यह भाव कभी रहता ही नहीं कि कोई हमारा शिष्य बने तो हम बात बतायें । हाँ, उस महापुरुषसे जिनको ज्ञान मिला है वे उसको अपना गुरु मान लेते हैं । कोई माने, चाहे न माने, जिससे जितना ज्ञान मिला है, उस विषयमें वह गुरु हो ही गया । जिनसे हमें शिक्षा मिलती है, लाभ होता है, जीवनका सही रास्ता मिलता है, ऐसे माता-पिता, शिक्षक, आचार्य आदि भी ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत आ जाते हैं ।

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‘आशीर्वाद दीजिये’‒ऐसा न कहकर आशीर्वाद पानेका पात्र बनना चाहिये ।
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वर्तमानका ही सुधार करना है । वर्तमान सुधरनेसे भूत और भविष्य दोनों सुधर जाते हैं ।
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दुःखी व्यक्ति ही दूसरेको दुःख देता है । पराधीन व्यक्ति ही दूसरेको अपने अधीन करता है ।
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अज्ञानी तो बीते हुएको स्वप्नकी तरह मानता है, पर ज्ञानी (विवेकी) वर्तमानको स्वप्नकी तरह मानता है ।
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वस्तुका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत उसके सदुपयोगका महत्त्व है ।

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सत्संग

वास्तवमें अन्नादि वस्तुओंकी कमी तभी आ सकती है, जब मनुष्य काम न करें और भोगी, ऐयाश, आरामतलब हो जायँ । आवश्यकता ही आविष्कारकी जननी है । अतः जब जनसंख्या बढ़ेगी, तब उसके पालन-पोषणके साधन भी बढ़ेंगे, अन्नकी पैदावार भी बढ़ेगी, वस्तुओंका उत्पादन भी बढ़ेगा, उद्योग भी बढ़ेंगे । जहाँतक हमें ज्ञात हुआ है, पृथ्वीमें कुल सत्तर प्रतिशत खेतीकी जमीन है, जिसमें केवल दस प्रतिशत भागमें ही खेती हो रही है, जिसका कारण खेती करनेवालोंकी कमी है ! अतः जनसँख्याकी वृद्धि होनेपर अन्नकी कमीका प्रश्न ही पैदा नहीं होता । यदि भूतकालको देखें तो पता लगता है कि जनसंख्यामें जितनी वृद्धि हुई है, उससे कहीं अधिक अन्नके उत्पादनमें वृद्धि हुई है । इसलिये जे॰ डी॰ बर्नेल आदि विशेषज्ञोंका कहना है कि जनसंख्यामें वृद्धि होनेपर भी आगामी सौ वर्षोंतक अन्नकी कमीकी कोई सम्भावना मौजूद नहीं है । प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कोलिन क्लार्कने तो यहाँतक कहा है कि ‘अगर खेतीकी जमीनका ठीक-ठीक उपयोग किया जाय तो वर्तमान जनसंख्यासे दस गुनी ज्यादा जनसंख्या बढ़नेपर भी अन्नकी कोई समस्या पैदा नहीं होगी’ (पापुलेशन ग्रोथ एण्ड लिविंग स्टैण्डर्ड) ।

सन् १८८० में जर्मनीमें जीवन-निर्वाहके साधनोंकी बहुत कमी थी, पर उसके बाद चौंतीस वर्षोंके भीतर जब जर्मनीकी जनसंख्या बहुत बढ़ गयी, तब जीवन-निर्वाहके साधन और कम होनेकी अपेक्षा इतने अधिक बढ़ गये कि उसको काम करनेके लिये बाहरसे आदमी बुलाने पड़े ! इंग्लैंडकी जनसंख्यामें तीव्रगतिसे वृद्धि होनेपर भी वहाँ जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कोई कमी नहीं आयी । यह प्रत्यक्ष बात है कि संसारमें कुल जनसंख्या जितनी बढ़ी है, उससे कहीं अधिक जीवन-निर्वाहके साधन बढ़े हैं ।

परिवार-नियोजनके समर्थनमें एक बात यह भी कही जाती है कि जनसंख्या बढ़नेपर लोगोंको रहनेके लिये जगह मिलनी कठिन हो जायगी । विचार करें, यह सृष्टि करोड़ों-अरबों वषोंसे चली आ रही है, पर कभी किसीने यह नहीं देखा, पढ़ा या सुना होगा कि किसी समय जनसंख्या बढ़नेसे लोगोंको पृथ्वीपर रहनेकी जगह नहीं मिली ! जनसंख्याको नियन्त्रित रखना और उसके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध करना मनुष्यके हाथमें नहीं है, प्रत्युत सृष्टिकी रचना करनेवाले भगवान्‌के हाथमें है । भगवान् कहते हैं‒
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
(गीता १५ । १३)
‘मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ ।’
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
(गीता १५ । १७)
‘वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है ।’

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सत्संग मिल जाय तो समझना चाहिये कि हमारा उद्धार करनेकी भगवान्‌के मनमें विशेषतासे आ गयी; नहीं तो सत्संग क्यों दिया ? हम तो ऐसे ही जन्मते-मरते रहते, यह अडंगा क्यों लगाया ? यह तो कल्याण करनेके लिये लगाया है । जिसे सत्संग मिल गया तो उसे यह समझना चाहिये कि भगवान्‌ने उसे निमन्त्रण दे दिया कि आ जाओ । ठाकुरजी बुलाते हैं, अपने तो प्रेमसे सत्संग करो, भजन-स्मरण करो, जप करो । सत्संग करनेमें सब स्वतन्त्र हैं । सत्‌ परमात्मा सब जगह मौजूद है । वह परमात्मा मेरा है और मैं उसका हूँ‒ऐसा मानकर सत्संग करे तो वह निहाल हो जाय ।

सत्संग कल्पद्रुम है । सत्संग अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देता है । जहाँ सत्‌की तरफ गया कि असत्‌ नष्ट हुआ । असत्‌ तो बेचारा नष्ट ही होता है । जीवित रहता ही नहीं । इसने पकड़ लिया असत्‌को । अगर यह सत्‌की तरफ जायगा तो असत्‌ तो खत्म होगा ही । सत्संग अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर कर देता है । महान्‌ परमानन्द-पदवीको दे देता है । यह परमानन्द-पदवी दान करता है । कितनी विलक्षण बात है ! सत्संग क्या नहीं करता ? सत्संग सब कुछ करता है । ‘प्रसूते सद्‌बुद्धिम् ।’ सत्संग श्रेष्ठ बुद्धि पैदा करता है । बुद्धि शुद्ध हो जाती है । गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं‒
मज्जन फल पखिय ततकाला ।
काक होहिं पिक बकउ मराला ॥ (मानस १/२/१)

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संसारका आश्रय लेनेसे पराधीनता और भगवान्‌का आश्रय लेनेसे स्वाधीनता प्राप्त होती है

संसारका आश्रय लेनेसे पराधीनता और भगवान्‌का आश्रय लेनेसे स्वाधीनता प्राप्त होती है ।
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भगवान्‌का आश्रय लिये बिना भगवान्‌को जानना असम्भव है ।
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एक भगवान्‌के सिवाय और किसीका आश्रय न लेना ही ‘अनन्यता’ है ।
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संसारका आश्रय ही भगवान्‌की शरणागतिमें बाधक है ।
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भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं । भगवान् अपने हैं, इसलिये उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये निर्भय हो जाता है ।
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गीता के प्रत्येक अध्याय का तात्पर्य -12-
बारहवाँ अध्याय
भक्त भगवान्‌ का अत्यन्त प्यारा होता है; क्योंकि वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्‌ के अर्पण कर देता है ।
जो परम श्रद्धापूर्वक अपने मन को भगवान्‌ में लगाते हैं, वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं । भगवान्‌ के परायण हुए जो भक्त सम्पूर्ण कर्मों को भगवान् के अर्पण करके अनन्यभाव से भगवान्‌ की उपासना करते हैं, भगवान् स्वयं उनका संसार-सागर से शीघ्र उद्धार करनेवाले बन जाते हैं । जो अपने मन-बुद्धि को भगवान्‌ में लगा देता है, वह भगवान्‌ में ही निवास करता है । जिनका प्राणिमात्र के साथ मित्रता एवं करुणा का बर्ताव है, जो अहंता-ममता से रहित हैं, जिनसे कोई भी प्राणी उद्विग्न नहीं होता तथा जो स्वयं किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होते, जो नये कर्मों के आरम्भों के त्यागी हैं, जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के आनेपर हर्षित एवं उद्विग्न नहीं होते, जो मान-अपमान आदि में सम रहते हैं, जो जिस-किसी भी परिस्थिति में निरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं, वे भक्त भगवान्‌ को प्यारे हैं । अगर मनुष्य भगवान्‌ के ही होकर रहें, भगवान्‌ में ही अपनापन रखें, तो सभी भगवान्‌ के प्यारे बन सकते हैं ।
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कल्याण क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत भाव और विवेकसे होता है ।
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घरमें रहनेवाले सभी लोग अपनेको सेवक और दूसरोंको सेव्य समझें तो सबकी सेवा हो जायगी और सबका कल्याण हो जायगा ।
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भोगोंकी प्रियता जन्म-मरण देनेवाली और भगवान्‌की प्रियता कल्याण करनेवाली है ।
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अपना कल्याण चाहनेवाला सच्चे हृदयसे प्रार्थना करे तो भगवान्‌के दरबारमें उसकी सुनवायी जल्दी होती है ।
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किसीका भी कल्याण होता है तो उसके मूलमें किसी सन्तकी अथवा भगवान्‌की कृपा होती है ।

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भगवान् सबके हैं और सबमें हैं

भगवान् सबके हैं और सबमें हैं, पर मनुष्य उनसे विमुख हो गया है । संसार रात-दिन नष्ट होता जा रहा है, फिर भी वह उसको अपना मानता है और समझता है कि मेरे को संसार मिल गया । भगवान् कभी बिछुड़ते हैं ही नहीं, पर उनके लिये कहता है कि वे हैं ही नहीं, मिलते हैं ही नहीं ; भगवान्से मिलना तो बहुत कठिन है, पर भगवान् तो सदा मिले हुए ही रहते हैं । भाई ! आप अपनी दृष्टि उधर डालते ही नहीं, उधर देखते ही नहीं । जहाँ-जहाँ आप देखते हो , वहाँ-वहाँ भगवान् मौजूद हैं । अगर यह बात स्वीकार कर लो, मान लो कि सब देश में, सब काल में, सब वस्तुओं में, सम्पूर्ण घटनाओं में, सम्पूर्ण परिस्थितियों में, सम्पूर्ण क्रियाओं में भगवान् हैं, तो भगवान् दीखने लग जायेंगे ।दृढ़तासे मानोगे तो दीखेंगे, संदेह होगा तो नहीं दीखेंगे । जितना मानोगे, उतना लाभ जरूर होगा । दृढ़ता से मान लो तो छिप ही नहीं सकते भगवान् ! क्योंकि‒

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
(गीता ६ । ३०)

‘जो सब में मेरे को देखता है और सब को मेरे अन्तर्गत देखता है, मैं उसके लिये अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ।’

जहाँ देखें, जब देखें, जिस देश में देखें, वहीं भगवान् हैं । परन्तु जहाँ राग-द्वेष होंगे, वहाँ भगवान् नहीं दीखेंगे ।भगवान् के दीखने में राग-द्वेष ही बाधक हैं । जहाँ अनुकूलता मान लेंगे, वहाँ राग हो जायगा और जहाँ प्रतिकूलता मान लेंगे, वहाँ द्वेष हो जायगा । एक आदमी की दो बेटियों थीं । दोनों बेटियाँ पास-पास गाँव में ब्याही गयी थीं । एक बेटी वालों का खेती का काम था और एक का कुम्हार का काम था । वह आदमी उस बेटी के यहाँ गया, जो खेतीका काम करती थी और उससे पूछा कि क्या ढंग है बेटी ? उसने कहा ‒ पिताजी ! अगर पाँच-सात दिनों में वर्षा नहीं हुई तो खेती सूख जायगी, कुछ नहीं होगा । अब वह दूसरी बेटीके यहाँ गया और उससे पूछा कि क्या ढंग है ? तो वह बोली ‒ पिताजी ! अगर पाँच-सात दिनों में वर्षा आ गयी तो कुछ नहीं होगा; क्यों कि मिट्टीके घड़े धूप में रखे हैं और कच्चे घड़ों पर यदि वर्षा हो जायगी तो सब मिट्टी हो जायगी ! अब आप लोग बतायें कि भगवान् वर्षा करें या न करें ! दोनों एक आदमी की बेटियों हैं । माता-पिता सदा बेटी का भला चाहते हैं । अब करें क्या ? एक ने वर्षा होना अनुकूल मान लिया और एक ने वर्षा होना प्रतिकूल मान लिया । एक ने वर्षा न होना अनुकूल मान लिया और एक ने वर्षा न होना प्रतिकूल मान लिया । उन्होंने वर्षा होने को ठीक – बेठीक मान लिया । परन्तु वर्षा न ठीक है न बेठीक है । वर्षा होने वाली होगी तो होगी ही । अगर कोई वर्षा होने को ठीक मानता है तो उसका वर्षा में ‘राग’ हो गया और वर्षा होने को ठीक नहीं मानता तो उसका वर्षा में ‘द्वेष’ हो गया । ऐसे ही यह संसार तो एक – सा है, पर इस में ठीक और बेठीक‒ये दो मान्यताएँ कर लीं तो फँस गये !

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राग-द्वेषका त्याग-2

जैसे दूसरे शरीरों की बेपरवाह करते हो, ऐसे ही इस शरीर की भी बेपरवाह करो अथवा जैसे इस शरीर की परवाह करते हो, ऐसे ही जो सामने आये, उसकी भी परवाह करो । जैसे इस शरीर की पीड़ा नहीं सही जाती, ऐसे ही दूसरे शरीरों की पीड़ा भी न सही जाय तो काम ठीक बैठ जायगा ।

यह बात अच्छी है और यह बुरी है‒यह राग और द्वेष है । जहाँ मन खिंचता है, वहाँ राग है और जहाँ मन फेंकता है,वहाँ द्वेष है । ये राग-द्वेष ही पारमार्थिक मार्ग में लुटेरे हैं‒ ‘तौ ह्यस्य परिपन्धिनौ’ (गीता ३ । ३४) । ये आपकी साधन-सम्पत्ति लूट लेंगे, आपको आगे नहीं बढ़ने देंगे । अतः क्या अच्छा और क्या मन्दा ? क्या सुख और क्या दुःख ? मनस्वी पुरुष सुख-दुःखको नहीं देखते‒‘मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्’ (नीतिशतक ८२) । वे तो उसको देखते हैं, जो सुख-दुःखसे अतीत है, जहाँ आनन्द-ही-आनन्द है, मौज-ही-मौज है, मस्ती-ही-मस्ती है ! जिसके समान कोई आनन्द हुआ नहीं, हो सकता नहीं, सम्भव ही नहीं, वह आनन्द मनुष्य के सामने है । देवता, पशु, पक्षी, वृक्ष, राक्षस, असुर, भूत-प्रेत, पिशाच एवं नरक के जीवों के सामने वह आनन्द नहीं है । मनुष्य ही उस आनन्द का अधिकारी है । मनुष्य उस आनन्द को प्राप्त कर सकता है । परन्तु राग- द्वेष करोगे तो वह आनन्द मिलेगा नहीं । अतः आप राग- द्वेषके वशीभूत न हों‒

नहीं किसीसे दोस्ती, नहीं किसीसे वैर ।
नहीं किसी के सिरधणी, नहीं किसीकी बैर ॥

भाइयो ! बहनो ! आप थोड़ा ध्यान दें । सुख में भी आप वही रहते हैं और दुःखमें भी आप वही रहते हैं । यदि आप वही नहीं रहते तो सुख और दुःख ‒ इन दोनोंको अलग-अलग कौन जानता ? बहुत सीधी बात है । हमने भी पहले पढ़ा-सुना, साधारण दृष्टिसे देखा तो सुख-दुःखमें समान रहने में कठिनता मालूम दी । परन्तु विचारसे देखा कि सुख-दुःख तो आने-जाने वाले हैं‒‘आगमापायिनः’ (गीता २ । १४) और आप हो रहने वाले । हम यहाँ दरवाजे पर खड़े हो जायँ और इधर से मोटरें धनाधन आयें तो हम नाचने लगें कि मौज हो गयी, आज तो बहुत मोटरें आयीं ! दूसरे दिन एक भी मोटर नहीं आयी तो लगे रोने । रोते क्यों हो ? कि आज एक भी मोटर नहीं आयी ! तो धूल कम उड़ी, हर्ज क्या हुआ ? मोटर आये या न आये, तुम्हें इससे क्या मतलब ? ऐसे ही आपके सामने कई अनुकूलताएँ-प्रतिकूलताएँ आयीं, आपका आदर-निरादर हुआ, निन्दा-प्रशंसा हुई, वाह-वाह हुई, पर आप वही रहे कि नहीं ? सुख आया तो आप वही रहे, दुःख आया तो आप वही रहे । अतः आप एक ही हो‒‘समदुःखसुखः स्वस्थः’(गीता १४ । २४) । आप अपनेमें ही रहो, सुख-दुःखसे मिलो मत, फिर मौज-ही-मौज है ! ‘सदा दिवाली सन्तकी आठों पहर आनन्द ।’

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प्रकृति और पुरुष‒ये दो हैं

सत्संगका प्रसाद |

प्रकृति और पुरुष‒ये दो हैं । इन दोनोंके अंशसे बना हुआ यह जीवात्मा है । अब इसका मुख जब तक प्रकृति की तरफ रहेगा, तब तक इसको शान्ति नहीं मिल सकती; और यह परमात्मा के सम्मुख हो जायगा तो अशान्ति टिकेगी नहीं‒यह पक्की बात है ।

संयोग-वियोग प्रकृति की चीज है । हमें जो कुछ मिला है, वह सब प्रकृति का है, उत्पन्न होकर होने वाला है । परन्तु परमात्मा आने-जाने वाले, मिलने-बिछुड़ने वाले नहीं हैं । परमात्मा सदा मिले हुए रहते हैं; किन्तु प्रकृति कभी मिली हुई नहीं रहती । आपको यह बात अलौकिक लगेगी कि संसार आज तक किसी को भी नहीं मिला है और परमात्मा कभी भी वियुक्त नहीं हुए हैं । संसार मेरे साथ है, शरीर मेरे साथ है, इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि मेरे साथ हैं और परमात्मा न जाने कहाँ हैं, पता नहीं‒यह विस्मृति है, मूर्खता है ।

जो कभी हों और कभी न हों, कहीं हों और कहीं न हों,किसी के हों और किसी के न हों, वे परमात्मा हो ही नहीं सकते । सर्व समर्थ परमात्मा में यह सामर्थ्य नहीं है कि वे किसी समय में हों और किसी समय में न हों, किसी देश में हों और किसी देश में न हों, किसी वेश में हों और किसी वेश में न हों, किसी सम्प्रदाय के हों और किसी सम्प्रदाय के न हों, किसी व्यक्ति के हों और किसी व्यक्ति के न हों, किसी वर्ण-आश्रम के हों और किसी वर्ण-आश्रमके न हों । भगवान् तो प्राणिमात्रमें समान रहते हैं‒

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
(गीता ९ । ४)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
(गीता ९ । २९)

आपके देखने-सुनने में जितना जगत् आता है, उस सबमें वे परमात्मा परिपूर्ण हैं‒

भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा ।

यह देह है पोला घड़ा बनता बिगड़ता है सदा ॥

परमात्मा व्यापक हैं, अचल हैं, ठोस हैं सर्वत्र ठसाठस भरे हुए हैं; परन्तु यह शरीर बिलकुल पोला है, इसमें कोरी पोल-ही-पोल है ! वहम होता है कि इतना मान मिल गया, इतना आदर मिल गया, इतना भोग मिल गया, इतना सुख मिल गया ! वास्तवमें मिला कुछ नहीं है । केवल वहम है, धोखा-है-धोखा ! कुछ नहीं रहेगा । क्या यह शरीर रहनेवाला है ? अनुकूलता रहनेवाली है ? सुख रहनेवाला है ? मान रहने वाला है ? बड़ाई रहने वाली है ? इनमें कोई रहने वाली चीज है क्या ? संसार नाम ही बहने वाले का है । जो निरन्तर बहता रहे, उसका नाम ‘संसार’ है । यह हरदम बदलता ही रहता है‒ ‘गच्छतीति जगत् ।’ कभी एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता । परन्तु परमात्मा एक क्षण भी कहीं जाते नहीं; जायें कहाँ ? कोई खाली जगह हो तो जायें ! जहाँ जायँ, वहाँ पहले से ही परमात्मा भरे हुए हैं ।

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राग-द्वेषका त्याग-1

यह ठीक हुआ, यह बेठीक हुआ । नफा हुआ, नुकसान हुआ । राजी हुए, नाराज हुए । यह वैरी है, यह मित्र है । इसने मान कर दिया, इसने अपमान कर दिया । इसने निन्दा कर दी, इसने प्रशंसा कर दी । इसने आराम, सुख दिया, इसने दुःख दिया । अब इनको देखते रहोगे तो भगवान् नहीं मिलेंगे । अतः राग-द्वेष के वशीभूत न हों, राजी-नाराज न हों‒‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ (गीता ३ । ३४) । राजी-नाराज न होने वाले को भगवान् ने त्यागी बताया है‒‘ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति ।’ (गीता ५ । ३) जो राग-द्वेष नहीं करता, उसको भगवान्ने अपना प्यारा भक्त बताया है (गीता १२ । १७) । संसारमें अच्छा और मन्दा तो होता ही रहता है । अतः साधक के लिये इसमें क्या ठीक और क्या बेठीक ‘किं भद्रं किमभद्र वा’ ( श्रीमद्धा ११ । २८ । ४) ।

यह संसार तो एक तमाशा है, खेल है । सिनेमाके परदेपर कभी लड़ाई दीख जाती है, कभी शान्ति दीख जाती है । कभी दीखता है कि आग लग गयी, हाहाकार मच गया, गाँव-के-गाँव जल गये, पर परदे को देखो तो वह गरम ही नहीं हुआ ! कभी दीखता है कि वर्षा आ गयी, नदी में जोर से बाढ़ आ गयी, बड़े-बड़े पत्थर बह गये, पशु-पक्षी बह गये, पर परदे को देखो तो वह गीला ही नहीं हुआ ! परन्तु दर्शक की दृष्टि तमाशे की तरफ ही रहती है, परदे की तरफ नहीं । इसी तरह यह संसार भी मायाका एक परदा है । जैसे सिनेमा अँधेरेमें ही दीखता है, ऐसे ही माया अज्ञानरूपी अँधेरे में ही दीखती है । यदि पूरे सिनेमा हाल में बत्तियाँ जला दी जायें तो तमाशा दीखना बन्द हो जायगा । इसी तरह ‘वासुदेवः सर्वम्’(गीता ७ । १९) ‘सब कुछ वासुदेव ही है’‒ऐसा प्रकाश हो जाय तो यह तमाशा रहेगा ही नहीं । मशीन तो भगवान् हैं और उसमें मायारूपी फिल्म लगी है । परदेकी जगह यह संसार है । प्रकाश परमात्माका है । अब इस मायाको सच्चा समझकर राजी-नाराज हो गये तो फँस गये ! अतः सन्तोंने कहा है‒‘देखो निरपख होय तमाशा ।’

ठहरनेवाला कोई नहीं है । न अच्छा ठहरनेवाला है, न बुरा ठहरनेवाला है । अपनी उसमें कोई वस्तु टिकी है क्या ?अवस्था टिकी है क्या ? घटना टिकी है क्या ? कोई चीज स्थायी रही है क्या ? पर आप तो वे-के-वे ही हैं । आपके सामने कितना परिवर्तन हुआ ! हमारे देखते-देखते भी कितना परिवर्तन हो गया ! इस शहर के मकान, सड़क, रिवाज आदि सब बदल गये । परन्तु संसार में परमात्मा और शरीर में आत्मा‒ये दोनों नहीं बदले । शरीर संसार का साथी है और आत्मा परमात्मा का साथी है । इसमें कोई कहे कि शरीर मेरा है, तो फँस गया ! जब शरीर संसार का साथी है तो फिर आप एक शरीर को ही अपना क्यों मानते हो ? मानो तो सब शरीरोंको अपना मानो, नहीं तो इस शरीरको भी अपना मत मानो ।

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