तुम मुझे देखा करो और मैं तुम्हें देखा करूँ

हमारा मन वहीं लगता है, जहाँ हमारी अभिलाषित वस्तु होती है, जहाँ हमें अपनी रूचि के अनुकूल सुख, सौंदर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि दिखायी देते हैं | विचार करके देखने से पता लगता है कि जगत में हम जो प्रिय वस्तु, सुख, सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि देखते है, उन सभी का पूर्ण अमित अनन्त भण्डार श्रीभगवान हैं | समस्त वस्तुएँ, समस्त गुण, समस्त सुख-सौन्दर्य भगवान् के किसी एक अंश के प्रतिबिम्बमात्र हैं | उस महान अनन्त अगाध सागर के सीकर-कण की छायामात्र हैं | हमें जो वस्तु जितनी चाहिए, जब चाहिए, वही वस्तु उतनी ही और उसी समय भगवान् में मिल सकती है; क्योंकि वे सदा-सर्वदा उनसे अनन्तरूप से भरी हैं और चाहे जितनी निकाल ली जानेपर भी कभी उनकी अनन्तता में कमी नहीं आती | अतएव हमारा मन जिस किस में लगता हो, उसी को दृढ विश्वास के साथ भगवान् में देखना चाहिए | फिर हम कभी भगवान् से अलग नहीं होंगे और भगवान् हमसे अलग नहीं होंगे; क्योंकि सबकुछ भगवान् से, भगवान् में है तथा भगवत्स्वरूप ही है | भगवान् ने कहा है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे प्रणश्यति ||
(गीता ६ | ३०)
‘जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता | भाव यह कि वह मुझे देखता रहता है और मैं उसे देखता रहता हूँ |’

इसी के साथ हमें अपने को ऐसा बनाना चाहिए, जो भगवान् को अत्यन्त प्रिय हो | गीता में १२वें अध्याय के १३वें से १९वें श्लोक तक भगवान् ने अपने प्रिय भक्त के लक्षणों का वर्णन किया है | और अंत में कहा है—
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया:॥
( गीता १२ | २०)
‘परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं अर्थात् उस प्रकार का अपना जीवन बनाने में तत्पर होते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं |’

इसलिए हमें अपने में उन सब भावों की दृढ़ स्थापना करनी चाहिए, जो भगवान् को प्रिय हैं | ऐसा होनेपर जब भगवान हमसे प्रेम करने लगेंगे, उनका मन हममें लगा रहेगा—(प्रेम तो वे अब भी करते हैं | परन्तु हमें उनका अनुभव नहीं होता, उनके अनुकूल आचरण करने से अर्थात् उन सब प्रिय गुणों को जीवन में उतरने से हमें भगवान् के प्रेम का अनुभव होने लगेगा) तब हमारा मन भी उसमें लगा रहेगा | हमें तो बस, विनोदपूर्वक भगवान् से यही भाव रखना चाहिए और यही मन-ही-मन कहना चाहिए कि ‘प्रभो ! न तो मैं दूसरों को देखूंगा और न आपको देखने दूंगा |’

आवहु मेरे नयन में पलक बन्द करि लेउँ |
ना मैं देखौं और कौं ना तोहि देखन देउँ ||
नारायण जाके हृदै सुन्दर श्याम समाय |
फूल-पात-फल-डार में ता कौं वही दिखाय ||

Om Namah Shivay

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प्रेम और शरणागति

अतएव हमलोगों को संसार के सारे पदार्थों को लात मारकर प्रभु की शरण में जाना चाहिए | ऋद्धि-सिद्धि, मान-बड़ाई और प्रतिष्ठा आदि से भी वृतियां हटा लेनी चाहिए | यह अपार संसार एक अथाह सागर है | इसके पार जाने के दो ही साधन हैं—नाव से जाना अथवा तैरकर जाना | नाव प्रभु का प्रेम है और तैरना है सांख्योग यानी ज्ञान | कहने की आवश्यकता नहीं कि तैरने की अपेक्षा नाव में जाना सुगम, निश्चित और सुरक्षित है |

प्रेमरूपी नौका की प्राप्ति के लिए प्रभु की शरण जाना चाहिए | तैरने के लिए तो हिम्मत और त्याग की आवश्यकता है | तैरने में हाथ और पैर से लहरें चीरते हुए आगे बढ़ा जाता है | संसार-सागर में विषयरूपी जल को हाथ और पैर से फेंकते हुए हम तैर जा सकते हैं—उस पार जाने का लक्ष्य न भूलें और लहरों में हाथ-पैर न रुकें | तैरने के समय शरीर पर कुछ भी बोझ न होना चाहिए | इसी प्रकार विषयों की लहरों को चीरकर आगे बढ़ने के लिए हमारे भीतर तीव्र और दृढ़ वैराग्यरूपी उत्साह का होना आवश्यक है | इसके बिना तो एक हाथ भी बढ़ना असम्भव है | हाथों से लहरें चीरता जाय, पैरों से जल फेंकता जाय |

सच्चे आत्मसमर्पण में तो विषयासक्ति का त्याग अनिवार्य है ही | विषयों में प्रेम भी हो और भगवदर्पण भी हो, यह सम्भव नहीं |

काँचन-कामिनी से भी अधिक मीठी छुरी मान-बड़ाई है | इसने तो बहुत ही बड़े-बड़े साधकों फँसा दिया, रोक दिया और अंततोगत्वा डुबा दिया | इससे सदा बचे रहना चाहिए |

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि ज्ञान से तैरने की अपेक्षा प्रेममयी नित्य-नवीन नौका में जाना सुखप्रद, सहज और आनन्ददायक है |

वह विशुद्ध प्रेम प्रभु की अनन्य शरण होने से ही प्राप्त होता है, अतएव अनन्य शरण होकर जाना ही नौका से जाना है | संसार-सागर को तो हर दशा में लाँघना ही पड़ेगा | ‘उस पार’ गये बिना तो प्राणवल्लभ की झाँकी होने की नहीं | फिर क्यों न उसी की शरण में जाकर उसी के हाथ का सहारा बनकर चल चलें | भगवान् ने स्वयं प्रतिज्ञा भी की है—
ये तू सर्वाणि कर्माणि मयि संयस्य मत्पराः |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||
(गीता १२ | ६-७)
‘हे अर्जुन ! जो मेरे परायण हुए भक्तजन, सम्पूर्ण कर्मों को मेरे में अर्पण करके, मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही तैलधारा के सदृश अनन्य ध्यानयोग से निरन्तर चिंतन करते हुए भजते हैं, उन मेरे में चित्त को लगानेवाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करनेवाला होता हूँ |’ यह संसार-समुद्र बड़ा ही दुस्तर है, इससे तरने का सहज उपाय भगवान् की शरण ही है | भगवान् ने कहा है कि—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते |
(गीता ७ | १४)
‘यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं |’

अतएव हमलोगों को प्रेम और प्रेममय भगवान् की प्राप्ति के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सब प्रकार भगवान् की अनन्य शरण* होना चाहिए |
· अनन्ययोग से उपासना, अव्यभिचारिणी भक्ति एवं अनन्यशरण—यह तीनों एक ही हैं |

Om Namah Shivay

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रुद्राक्ष वृक्ष

रुद्राक्ष के वृक्ष भारत समेत विश्व के अनेक देशों में पाए जाते हैं. यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तथा मैदानी इलाकों में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. रुद्राक्ष का पेड़ किसी अन्य वृक्ष की भांति ही होता है, इसके वृक्ष 50 से लेकर 200 फीट तक पाए जाते हैं तथा इसके पत्ते आकार में लंबे होते हैं. रुद्राक्ष के फूलों का रंग सफेद होता है तथा इस पर लगने वाला फल गोल आकार का होता है जिसके अंदर से गुठली रुप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है.

रुद्राक्ष का फल खाने में अधिक स्वादिष्ट नहीं होता इसके फलों का स्वाद कुछ खटा या फिर कसैला सा होता है. इसके हरे फल पकने के पश्चात स्वयं ही गिर जाते हैं और जब उनका आवरण हटता है तो एक उसमे से अमूल्य रुद्राक्ष निकलते हैं. यह इन फलों की गुठली ही होती है. रुद्राक्ष में धारियां सी बनी होती है जो इनके मुखों का निर्धारण करती हैं. रुद्राक्ष को अनेक प्रकार की महीन सफाई प्रक्रिया द्वारा उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है जिसे उपयोग में लाकर सभी लाभ उठाते हैं.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में रुद्राक्ष |

रुद्राक्ष भारत, के हिमालय के प्रदेशों में पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त असम, मध्य प्रदेश, उतरांचल, अरूणांचल प्रदेश, बंगाल, हरिद्वार, गढ़वाल और देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में यह रुद्राक्ष पाए जाते हैं. इसके अलावा दक्षिण भारत में नीलगिरि और मैसूर में तथा कर्नाटक में भी रुद्राक्ष के वृक्ष देखे जा सकते हैं. रामेश्वरम में भी रुद्राक्ष पाया जाता है यहां का रुद्राक्ष काजु की भांति होता है. गंगोत्री और यमुनोत्री के क्षेत्र में भी रुद्राक्ष मिलते हैं.

नेपाल और इंडोनेशिया से प्राप्त रुद्राक्ष |

नेपाल, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि प्रमुख रूप से रुद्राक्ष के बहुत बड़े उत्पादक रहे हैं और भारत सबसे बडा़ ख़रीदार रहा है. नेपाल में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में काफी बडे़ होते हैं, लेकिन इंडोनेशिया और मलेशिया में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में छोटे होते हैं. भारत में रुद्राक्ष भारी मात्रा में नेपाल और इंडोनेशिया से मंगाए जाते हैं और रुद्राक्ष का कारोबार अरबों में होता है. सिक्के के आकार का रुद्राक्ष, जो ‘इलयोकैरपस जेनीट्रस’ प्रजाति का होता है, बेहद दुर्लभ होता जो नेपाल से प्राप्त होता है.

विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष |

भारत के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष की खेती की जाती है तथा इसके वृक्ष पाए जाते हैं. नेपाल, जावा, इंडोनेशिया, मलाया जैसे देशों में रुद्राक्ष उत्पन्न होता है. नेपाल ओर इंनेशिया में मिलने वाले रुद्राक्ष भारत में मिलने वाले रुद्राक्षों से अलग होते हैं. नेपाल में बहुत बडे़ आकार का रुद्राक्ष पाया जाता है तथा यहां पर मिलने वाले रुद्राक्ष की किस्में भी बहुत अच्छी मानी गई हैं. नेपाल में एक मुखी रुद्राक्ष बेहतरीन किस्म का होता है.

रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा हो दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं. भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते.

माना जाता है कि भारत में बिकने वाले 80 फीसदी रुद्राक्ष फर्जी होते हैं और उन्हें तराश कर बनाया जाता है. इसलिए रुद्राक्ष को खरीदने से पहले इसके गुणवत्ता को देखना बेहद आवश्यक है. अपने औषधीय और आध्यात्मिक गुणों के कारण रुद्राक्ष का प्रचलन बहुत है. रुद्राक्ष के गुणों के कारण ही सदियों से ऋषि-मुनि इसे धारण करते आए हैं.

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ज्योतिष विद्या

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य, प्रस्तुत है कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी।

1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है।

बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।

2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर ‘व्यावहारिक ज्ञान’ माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था ‘लाल किताब के फरमान’। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।

3. गणितीय ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।

4. नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।

5. पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।

6. हस्तरेखा ज्योतिष :- हाथों की आड़ी-तिरछी और सीधी रेखाओं के अलावा, हाथों के चक्र, द्वीप, क्रास आदि का अध्ययन कर व्यक्ति का भूत और भविष्य बताया जाता है। यह बहुत ही प्राचीन विद्या है और भारत के सभी राज्यों में प्रचलित है।

7. नक्षत्र ज्योतिष :- वैदिक काल में नक्षत्रों पर आधारित ज्योतिष विज्ञान ज्यादा प्रचलित था। जो व्यक्ति जिस नक्षत्र में जन्म लेता था उसके उस नक्षत्र अनुसार उसका भविष्य बताया जाता था। नक्षत्र 27 होते हैं।

8. अँगूठा शास्त्र :- यह विद्या भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसके अनुसार अँगूठे की छाप लेकर उस पर उभरी रेखाओं का अध्ययन कर बताया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा होगा।

9. सामुद्रिक विद्या:- यह विद्या भी भारत की सबसे प्राचीन विद्या है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के चेहरे, नाक-नक्श और माथे की रेखा सहित संपूर्ण शरीर की बनावट का अध्ययन कर व्यक्ति के चरित्र और भविष्य को बताया जाता है।

10. चीनी ज्योतिष :- चीनी ज्योतिष में बारह वर्ष को पशुओं के नाम पर नामांकित किया गया है। इसे पशु-नामांकित राशि-चक्र कहते हैं। यही उनकी बारह राशियाँ हैं, जिन्हें ‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’ के नाम से जानते हैं।

यह वर्ष निम्न हैं- चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन, सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, कुत्ता और सुअर। जो व्यक्ति जिस वर्ष में जन्मा उसकी राशि उसी वर्ष अनुसार होती है और उसके चरित्र, गुण और भाग्य का निर्णय भी उसी वर्ष की गणना अनुसार माना जाता है।

11. वैदिक ज्योतिष :- वैदिक ज्योतिष अनुसार राशि चक्र, नवग्रह, जन्म राशि के आधा‍र पर गणना की जाती है। मूलत: नक्षत्रों की गणना और गति को आधार बनाया जाता है। 

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कर्तव्य

वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते ।
ᇮ ᇮ ᇮ
कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता । छोटे-से-छोटा और बडे-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
जिससे दूसरोंका हित होता है, वही कर्तव्य होता है । जिससे किसीका भी अहित होता है, वह अकर्तव्य होता है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यको कर्तव्य-पालनमें परिश्रम या कठिनाई प्रतीत होती है ।

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मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें अपने कर्तव्यका पालन कर सकता है । कर्तव्यका यथार्थ स्वरूप है‒सेवा अर्थात् संसारसे मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको संसारके हितमें लगाना ।
ᇮ ᇮ ᇮ
अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है । इसके विपरीत अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक खिन्नता रहती है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
साधक आसक्तिरहित तभी हो सकता है, जब वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको ‘मेरी’ अथवा ‘मेरे लिये’ न मानकर, केवल संसारकी और संसारके लिये ही मानकर संसारके हितके लिये तत्परतापूर्वक कर्तव्य-कर्मका आचरण करनेमें लग जाय ।

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असली गुरु वह होता है, जो दूसरेको अपना शिष्य नहीं बनाता, प्रत्युत गुरु ही बनाता है अर्थात् तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त बना देता है, दुनियाका उद्धार करनेवाला बना देता है । ऐसा गुरु गुरुओंकी टकसाल, खान होता है ।

वास्तवमें जो महापुरुष (गुरु) होते हैं, वे शिष्य नहीं बनाते । उनके भीतर यह भाव कभी रहता ही नहीं कि कोई हमारा शिष्य बने तो हम बात बतायें । हाँ, उस महापुरुषसे जिनको ज्ञान मिला है वे उसको अपना गुरु मान लेते हैं । कोई माने, चाहे न माने, जिससे जितना ज्ञान मिला है, उस विषयमें वह गुरु हो ही गया । जिनसे हमें शिक्षा मिलती है, लाभ होता है, जीवनका सही रास्ता मिलता है, ऐसे माता-पिता, शिक्षक, आचार्य आदि भी ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत आ जाते हैं ।

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‘आशीर्वाद दीजिये’‒ऐसा न कहकर आशीर्वाद पानेका पात्र बनना चाहिये ।
ᇮ ᇮ ᇮ
वर्तमानका ही सुधार करना है । वर्तमान सुधरनेसे भूत और भविष्य दोनों सुधर जाते हैं ।
ᇮ ᇮ ᇮ
दुःखी व्यक्ति ही दूसरेको दुःख देता है । पराधीन व्यक्ति ही दूसरेको अपने अधीन करता है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
अज्ञानी तो बीते हुएको स्वप्नकी तरह मानता है, पर ज्ञानी (विवेकी) वर्तमानको स्वप्नकी तरह मानता है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
वस्तुका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत उसके सदुपयोगका महत्त्व है ।

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सत्संग

वास्तवमें अन्नादि वस्तुओंकी कमी तभी आ सकती है, जब मनुष्य काम न करें और भोगी, ऐयाश, आरामतलब हो जायँ । आवश्यकता ही आविष्कारकी जननी है । अतः जब जनसंख्या बढ़ेगी, तब उसके पालन-पोषणके साधन भी बढ़ेंगे, अन्नकी पैदावार भी बढ़ेगी, वस्तुओंका उत्पादन भी बढ़ेगा, उद्योग भी बढ़ेंगे । जहाँतक हमें ज्ञात हुआ है, पृथ्वीमें कुल सत्तर प्रतिशत खेतीकी जमीन है, जिसमें केवल दस प्रतिशत भागमें ही खेती हो रही है, जिसका कारण खेती करनेवालोंकी कमी है ! अतः जनसँख्याकी वृद्धि होनेपर अन्नकी कमीका प्रश्न ही पैदा नहीं होता । यदि भूतकालको देखें तो पता लगता है कि जनसंख्यामें जितनी वृद्धि हुई है, उससे कहीं अधिक अन्नके उत्पादनमें वृद्धि हुई है । इसलिये जे॰ डी॰ बर्नेल आदि विशेषज्ञोंका कहना है कि जनसंख्यामें वृद्धि होनेपर भी आगामी सौ वर्षोंतक अन्नकी कमीकी कोई सम्भावना मौजूद नहीं है । प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कोलिन क्लार्कने तो यहाँतक कहा है कि ‘अगर खेतीकी जमीनका ठीक-ठीक उपयोग किया जाय तो वर्तमान जनसंख्यासे दस गुनी ज्यादा जनसंख्या बढ़नेपर भी अन्नकी कोई समस्या पैदा नहीं होगी’ (पापुलेशन ग्रोथ एण्ड लिविंग स्टैण्डर्ड) ।

सन् १८८० में जर्मनीमें जीवन-निर्वाहके साधनोंकी बहुत कमी थी, पर उसके बाद चौंतीस वर्षोंके भीतर जब जर्मनीकी जनसंख्या बहुत बढ़ गयी, तब जीवन-निर्वाहके साधन और कम होनेकी अपेक्षा इतने अधिक बढ़ गये कि उसको काम करनेके लिये बाहरसे आदमी बुलाने पड़े ! इंग्लैंडकी जनसंख्यामें तीव्रगतिसे वृद्धि होनेपर भी वहाँ जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कोई कमी नहीं आयी । यह प्रत्यक्ष बात है कि संसारमें कुल जनसंख्या जितनी बढ़ी है, उससे कहीं अधिक जीवन-निर्वाहके साधन बढ़े हैं ।

परिवार-नियोजनके समर्थनमें एक बात यह भी कही जाती है कि जनसंख्या बढ़नेपर लोगोंको रहनेके लिये जगह मिलनी कठिन हो जायगी । विचार करें, यह सृष्टि करोड़ों-अरबों वषोंसे चली आ रही है, पर कभी किसीने यह नहीं देखा, पढ़ा या सुना होगा कि किसी समय जनसंख्या बढ़नेसे लोगोंको पृथ्वीपर रहनेकी जगह नहीं मिली ! जनसंख्याको नियन्त्रित रखना और उसके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध करना मनुष्यके हाथमें नहीं है, प्रत्युत सृष्टिकी रचना करनेवाले भगवान्‌के हाथमें है । भगवान् कहते हैं‒
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
(गीता १५ । १३)
‘मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ ।’
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
(गीता १५ । १७)
‘वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है ।’

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सत्संग मिल जाय तो समझना चाहिये कि हमारा उद्धार करनेकी भगवान्‌के मनमें विशेषतासे आ गयी; नहीं तो सत्संग क्यों दिया ? हम तो ऐसे ही जन्मते-मरते रहते, यह अडंगा क्यों लगाया ? यह तो कल्याण करनेके लिये लगाया है । जिसे सत्संग मिल गया तो उसे यह समझना चाहिये कि भगवान्‌ने उसे निमन्त्रण दे दिया कि आ जाओ । ठाकुरजी बुलाते हैं, अपने तो प्रेमसे सत्संग करो, भजन-स्मरण करो, जप करो । सत्संग करनेमें सब स्वतन्त्र हैं । सत्‌ परमात्मा सब जगह मौजूद है । वह परमात्मा मेरा है और मैं उसका हूँ‒ऐसा मानकर सत्संग करे तो वह निहाल हो जाय ।

सत्संग कल्पद्रुम है । सत्संग अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देता है । जहाँ सत्‌की तरफ गया कि असत्‌ नष्ट हुआ । असत्‌ तो बेचारा नष्ट ही होता है । जीवित रहता ही नहीं । इसने पकड़ लिया असत्‌को । अगर यह सत्‌की तरफ जायगा तो असत्‌ तो खत्म होगा ही । सत्संग अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर कर देता है । महान्‌ परमानन्द-पदवीको दे देता है । यह परमानन्द-पदवी दान करता है । कितनी विलक्षण बात है ! सत्संग क्या नहीं करता ? सत्संग सब कुछ करता है । ‘प्रसूते सद्‌बुद्धिम् ।’ सत्संग श्रेष्ठ बुद्धि पैदा करता है । बुद्धि शुद्ध हो जाती है । गोस्वामीजी महाराज लिखते हैं‒
मज्जन फल पखिय ततकाला ।
काक होहिं पिक बकउ मराला ॥ (मानस १/२/१)

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संसारका आश्रय लेनेसे पराधीनता और भगवान्‌का आश्रय लेनेसे स्वाधीनता प्राप्त होती है

संसारका आश्रय लेनेसे पराधीनता और भगवान्‌का आश्रय लेनेसे स्वाधीनता प्राप्त होती है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
भगवान्‌का आश्रय लिये बिना भगवान्‌को जानना असम्भव है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
एक भगवान्‌के सिवाय और किसीका आश्रय न लेना ही ‘अनन्यता’ है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
संसारका आश्रय ही भगवान्‌की शरणागतिमें बाधक है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं । भगवान् अपने हैं, इसलिये उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये निर्भय हो जाता है ।
=======================
गीता के प्रत्येक अध्याय का तात्पर्य -12-
बारहवाँ अध्याय
भक्त भगवान्‌ का अत्यन्त प्यारा होता है; क्योंकि वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्‌ के अर्पण कर देता है ।
जो परम श्रद्धापूर्वक अपने मन को भगवान्‌ में लगाते हैं, वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं । भगवान्‌ के परायण हुए जो भक्त सम्पूर्ण कर्मों को भगवान् के अर्पण करके अनन्यभाव से भगवान्‌ की उपासना करते हैं, भगवान् स्वयं उनका संसार-सागर से शीघ्र उद्धार करनेवाले बन जाते हैं । जो अपने मन-बुद्धि को भगवान्‌ में लगा देता है, वह भगवान्‌ में ही निवास करता है । जिनका प्राणिमात्र के साथ मित्रता एवं करुणा का बर्ताव है, जो अहंता-ममता से रहित हैं, जिनसे कोई भी प्राणी उद्विग्न नहीं होता तथा जो स्वयं किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होते, जो नये कर्मों के आरम्भों के त्यागी हैं, जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के आनेपर हर्षित एवं उद्विग्न नहीं होते, जो मान-अपमान आदि में सम रहते हैं, जो जिस-किसी भी परिस्थिति में निरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं, वे भक्त भगवान्‌ को प्यारे हैं । अगर मनुष्य भगवान्‌ के ही होकर रहें, भगवान्‌ में ही अपनापन रखें, तो सभी भगवान्‌ के प्यारे बन सकते हैं ।
=======================
कल्याण क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत भाव और विवेकसे होता है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
घरमें रहनेवाले सभी लोग अपनेको सेवक और दूसरोंको सेव्य समझें तो सबकी सेवा हो जायगी और सबका कल्याण हो जायगा ।
ᇮ ᇮ ᇮ
भोगोंकी प्रियता जन्म-मरण देनेवाली और भगवान्‌की प्रियता कल्याण करनेवाली है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
अपना कल्याण चाहनेवाला सच्चे हृदयसे प्रार्थना करे तो भगवान्‌के दरबारमें उसकी सुनवायी जल्दी होती है ।
ᇮ ᇮ ᇮ
किसीका भी कल्याण होता है तो उसके मूलमें किसी सन्तकी अथवा भगवान्‌की कृपा होती है ।

Om Namah Shivay

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