Are You Dependent or Independent?

Life is such; you should not feel that I am dependent, and I want to be independent. See, no baby has been independent. As a baby, parents took care of you, and in your old age, your children or someone else will take care of you. So, life in the beginning, and in the end, is dependency. In between, we think we are independent but there also we are dependent on many things.

If your attention is on divinity, then you will not feel the burden of dependency, or the frustration to have independence, both will disappear.

People who feel that they want to have independence, they are also frustrated. This is because wanting independence is a frustration. Come on, wake up. When you were a baby, were you not dependent? No baby thinks ‘I want to go back from where I came because I am dependent on my parents’, no! Whether in the form of parents, or as children, or as friends, the help you get from anywhere is coming from only one source, i.e., the divinity. It is only the divine who took care of you as your parents, and it is only the divine who will take care of you as your nurse, or neighbour, or friends, or anybody else. Someone will always come and take care of you, you don’t have to worry at all.

This whole sense of insecurity that we build in us should simply be thrown out and burned down. Don’t think your children will take care of you. Maybe during your last breath, your servant or neighbor may come and help you, who knows? Whoever is helping you, it is not that individual that is helping you, it is God helping you in that form. Leave it to the divine energy to help you when you are in need, in whatever form. So you don’t need to feel obliged or burdened by anybody’s help. 

This is a big problem. We feel burdened by somebody’s help. You don’t need to feel burdened by it; that is ignorance. It is only the divine who is helping you through other people. If you have this understanding, the Advaita knowledge, then nothing can restrict your blossoming.

Om Namah Shivay

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प्रेम और शरणागति

यह हमारा शरीर ही क्षेत्र है | इस खेत में कर्मरूप जैसा बीज बोया जायगा वैसा ही फल उपजेगा | बीज तो परमात्मा का प्रेमपूर्वक ध्यानसहित जप है | परन्तु जल के बिना यह बीज उग नहीं सकता वह जल है हरि-कथा और हरि-कृपा | खेत में गेहूँ बोने से और आम बोने से आम उपजता है | इसी प्रकार हृदयरूप खेत में राम ही उपजेगा | हम प्रेमपूर्वक भगवान् के ध्यान और जपका बीज बोयेंगे तो फलरूप हमें प्रेममय भगवान् ही मिलेंगे | प्रेममय भगवान् का साक्षात्कार ही इस बीज का फल है | साधारण बीज तो धूलि में पड़कर नष्ट भी हो जाता है; परन्तु निष्काम रामनाम का वह अमर बीज कभी नष्ट नहीं होता | जल है हरि-कथा और हरिकृपा, जो संतों के संग ही प्राप्ति होती है | उस हरिकथा और हरि-कृपा से ही हरि में विशुद्ध प्रेम होता है, अतएव प्रेम की प्राप्ति का उपाय सत्संग ही है |

प्रभु में हमारा प्रेम कैसा हो ? श्रीराम का उदाहरण लीजिये | भगवान् श्रीराम लता-पत्ता से पूछते हैं—‘तुमने मेरी सीताजी को देखा है ? गोपियों को देखिये, वे वन-वन ‘कृष्ण-कृष्ण’ पुकार-पुकारकर अपने हृदय धन को खोज रहीं हैं | जितनी ही अधिक तीव्र उत्कंठा प्रेम में होती है उतना ही शीघ्र प्रेममय ईश्वर मिलते हैं |

भगवान् जल्दी-से-जल्दी कैसे मिलें—यह भाव जाग्रत रहनेपर ही भगवान् मिलते हैं | यह लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती चले | ऐसी उत्कट इच्छा ही प्रेममय के मिलने का कारण है और प्रेम से ही प्रभु मिलते हैं | प्रभु का रहस्य और प्रभाव जाननेपर हम उसके बिना एक क्षण भर भी नहीं रह सकते |

पपीहा मेघ को देखकर आतुर होकर विव्हल हो उठता है | ठीक उसी प्रकार हमें प्रभु के लिए पागल हो जाना चाहिए |

मछली का जलमें, पपीहे का मेघमें, चकोरका चन्द्रमा में जैसा प्रेम है वैसा ही हमारा प्रेम प्रभु में हो | एक पल भी उसके बिना चैन न मिले, शान्ति न मिले | ऐसा प्रेम प्रेममय सन्तों की कृपा से ही प्राप्त होता है | चन्दन के वृक्ष की गन्ध को लेकर वायु समस्त वृक्षों को चन्दनमय बना देता है | बनानेवाली तो गन्ध ही है परन्तु वायु के बिना उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती | इसी प्रकार संतलोग आनंदमय के आनन्द की वर्षा कर विश्व को आनन्दमय कर देते हैं, प्रेम और आनन्द के समुद्र को उम्दा देते हैं | गौरांग महाप्रभु जिस पथ से निकलते थे, प्रेम का प्रवाह बहा देते थे | गोस्वामीजी की लेखनी में कितना अमृत भरा पड़ा है | पर ऐसे प्रेमी संतों के दर्शन भी प्रभु की पूर्ण कृपा से होते हैं | प्रभु की कृपा तो सबपर पूर्ण है ही, किन्तु पात्र बिना वह कृपा फलवती नहीं होती | शरणागत भक्त ही प्रभु की ऐसी कृपा के पात्र हैं, अतएव हमें सर्वतोभाव से भगवान् के शरण होना चाहिए | सर्वथा उसका आश्रित बनकर रहना चाहिए | सब प्रकार से उसके चरणों में अपने को सौंप देना चाहिए | भगवान् ने कहा भी है—
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
(गीता १८ | ६२ )
‘हे भारत ! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को हो | उसकी कृपा से ही परम शांति को और सनातन परम धाम को प्राप्त होगा |’

मनसे, वाणी से और कर्म से शरण होना चाहिए | तभी सम्पूर्ण समर्पण होता है यानी उस परमेश्वर को मन से पकड़ना चाहिए, वाणी से भी पकड़ना चाहिए और कर्म से भी पकड़ना चाहिए |

उनके किये हुए विधानों में प्रसन्न रहना, उनके नाम, रूप, गुण और लीलाओं का चिंतन करना मनसे पकड़ना है | नामोच्चारण करना, गुणगान करना वाणीसे पकड़ना है और उनके आज्ञानुसार चलना कर्म से यानी क्रियाओं से पकड़ना है |

Om Namah Shivay

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Holi – Bright Colours

Q: Please tell us about “Holi”.

Guruji: The ‘Holi’ festival is a very fun-filled and popular occasion in India. People play holi with Chandan and colored water. This festival is celebrated around early March each year. People believe that the bright colors represent energy, life and joy. Huge bonfires are also burnt in the evening and people worship the fire.

There is a famous story associated with the festival:
An asura king, Hiranyakashyap, wanted everyone to worship him. But his son Prahalad was a devotee of Lord Narayana, the king’s sworn enemy. Angry, the king wanted Holika, his sister to get rid of Prahalad. Empowered to withstand fire;
Holika sat on a burning pyre holding Prahalad on her lap. But it was Holika who was burnt, Prahalad came out unharmed. Hiranyakashyap symbolizes one who is gross. Prahalad embodies innocence, faith and bliss/joy. The spirit cannot be confined to love material only. Hiranyakashyap wanted all the joy to come from the material world. It did not happen that way. The individual jivatma cannot be bound to the material forever. It’s natural to eventually move towards Narayana, one’s higher self. Holika stands for the past burdens that try to burn Prahalad’s innocence. But Prahlad, so deeply rooted in Narayana Bhakthi could burn all past impressions (sanskaras) and joy springs up with new colors. Life becomes a celebration. Burning the past, you gear up for a new beginning. Your emotions, like fire, burn you. But when there is a fountain of colors, they add charm to your life. In ignorance, emotions are a bother; in knowledge, the same emotions add colors.
Each emotion is associated with a color – Anger with red, jealousy with green, vibrancy and happiness with yellow, love with pink, vastness with blue, peace with white, sacrifice with saffron and knowledge with violet.
Lift Your Spirit with Joy of Color. Knowing the essence of the festival, enjoy the day with Wisdom.

Om Namah Shivay

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आइये जानते हैं तुलसी के फायदे

1. तुलसी रस से बुखार उतर जाता है। इसे पानी में मिलाकर हर दो-तीन घंटे में पीने से बुखार कम हो जाता है।

2. कई आयुर्वेदिक कफ सिरप में तुलसी का इस्तेमाल अनिवार्य है।यह टी.बी,ब्रोंकाइटिस और दमा जैसे रोंगो के लिए भी फायदेमंद है।

3. जुकाम में इसके सादे पत्ते खाने से भी फायदा होता है।

4. सांप या बिच्छु के काटने पर इसकी पत्तियों का रस,फूल और जडे विष नाशक का काम करती हैं।

5. तुलसी के तेल में विटामिन सी,कै5रोटीन,कैल्शियम और फोस्फोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं।

6. साथ ही इसमें एंटीबैक्टेरियल,एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण भी होते हैं।

7. यह मधुमेह के रोगियों के लिए भी फायदेमंद है।साथ ही यह पाचन क्रिया को भी मज़बूत करती हैं।

8. तुलसी का तेल एंटी मलेरियल दवाई के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। एंटीबॉडी होने की वजह से यह हमारी इम्यूनिटी भी बढा देती है।

9. तुलसी के प्रयोग से हम स्वास्थय और सुंदरता दोनों को ही ठीक रख सकते हैं।

सावधानी :

फायदे जानने के बाद तुलसी के सेवन में अति कर देना नुकसानदायक साबित होगा। क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है इसलिए दिन भर में 10-12 पत्तों का ही सेवन करना चाहिए। खासतौर पर महिलाओं के लिए भले ही तुलसी एक वरदान की तरह है लेकिन फिर भी एक दिन में पांच तुलसी के पत्ते पर्याप्त हैं। हां, इसका सेवन छाछ या दही के साथ करने से इसका प्रभाव संतुलित हो जाता है। हालांकि यह आर्थराइटिस, एलर्जी, मैलिग्नोमा, मधुमेह, वायरल आदि रोगों में फायदा पहुंचाती है। लेकिन गर्भावस्था के दौरान इसके सेवन का ध्यान रखना जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान अगर दर्द ज्यादा होता है तब तुलसी के काढे से फायदा पहुंच सकता है। इसमे तुलसी के पत्तो को रात भर पानी मे भिगो दें और सुबह उसे क्रश करके चीनी के साथ खाएं ब्रेस्ट- फीडिंग के दौरान भी तुलसी का काढा फायदेमंद होता है। इसके लिए बीस ग्राम तुलसी का रस और मकई के पत्तों रस मिलाएं, इसमें दस ग्राम अश्वगंधा रस और दस ग्राम शहद मिला कर खाएं। तुलसी बच्चेदानी को स्वास्थ रखने के लिए भी सहायक है। हां, एक बात ध्यान रहे कि आपके स्वास्थ पर तुलसी के अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड सकते हैं इसलिए महिलाओं के लिए हो या बच्चों के लिए, बिना आयुर्वेदाचार्य से परामर्श लिए इसका इस्तेमाल न करे।

ध्यान रहे तुलसी पूजनीय हें , इसका अपमान / अनादर न करें !

Om Namah Shivay

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यहां स्थित हैं दुर्योधन और कर्ण के मंदिर, की जाती है उनकी पूजा-2

लेकिन यह मंदिर क्यों बने इसके पीछे भी एक कहानी है। दरअसल सारनौल और सौर गांव की यह भूमि भुब्रूवाहन नाम के एक महान योद्धा की धरती है।

भुब्रूवाहन को अमूमन लोग नहीं जानते, क्योंकि महाभारत का विशेष पात्र बनने से स्वयं श्रीकृष्ण ने ही उसे रोका था। एक कथा के अनुसार कहते हैं कि पाताल लोक का राजा भुब्रूवाहन द्वापरयुग में कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध का हिस्सा बनना चाहता था। मन में यही चाहत लिए वह धरती पर आया, लेकिन भगवान कृष्ण ने बड़ी ही चालाकी से उसे युद्ध से दूर कर दिया, पर क्यों!

क्योंकि श्रीकृष्ण पाताललोक के इस राजा की क्षमता को जान चुके थे। दरअसल भुब्रूवाहन कौरवों की तरफ से युद्ध में शामिल होना चाहता था और श्रीकृष्ण यह जान चुके थे कि यदि भुब्रूवाहन कौरवों की ओर युद्ध में आया तो बड़ी आसानी से अर्जुन को चुनौती दे सकता है, अंतत: उन्होंने भुब्रूवाहन को एक ऐसी चुनौती दी जिसे वह पूरा नहीं कर सका।

इस चुनौती के मुताबिक श्रीकृष्ण ने भुब्रूवाहन से कहा कि वह एक ही तीर से सामने दिखाई दे रहे पेड़ के सभी पत्तों को छेद दे, यदि वह ऐसा करने में सफल हुआ तो वे उसे युद्ध का हिस्सा बनने देंगे। लेकिन इस बीच श्रीकृष्ण ने एक पत्ता तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया।

भुब्रूवाहन का तीर पेड़ पर मौजूद सभी पत्तों को छेदने के बाद श्रीकृष्ण के पैर की तरफ बढ़ रहा था, तभी उन्होंने अपना पैर हटा लिया। कृष्ण किसी भी तरह भुब्रूवाहन को युद्ध से दूर रखना चाहते थे और उन्होंने उसे निष्पक्ष रहने को कहा।

निष्पक्ष रहने का अर्थ युद्ध से दूर रहना था और महाभारत के युद्ध से दूर रहना किसी भी योद्धा को मंजूर नहीं होता, इसलिए कृष्ण ने भुब्रूवाहन से पार पाने का रास्ता निकाल लिया। उन्होंने किसी तरह भुब्रूवाहन का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।

हालांकि कृष्ण ने युद्ध शुरू होने से पहले ही भुब्रूवाहन का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन उसने युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की और भगवान कृष्ण ने उसकी इच्छा पूरी की। श्रीकृष्ण ने भुब्रूवाहन के सिर को एक पेड़ पर टांग दिया और उसने यहीं से महाभारत का पूरा युद्ध देखा।

स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कहानी के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान जब-जब कौरवों की रणनीति विफल होती, जब-जब उन्हें हार का मुंह देखना पड़ता, तब भुब्रूवाहन जोर-जोर से चिल्ल कर उनसे रणनीति बदलने के लिए कहता था। कहते हैं कि वो कौरवों की हार देखकर रोता था और आज भी रो ही रहा है।

दोनों गांव के समीप एक नदी है और ऐसा माना जाता है कि यह नदी भुब्रूवाहन के आंसुओं के कारण ही बनी थी। इसे तमस या टोंस नदी के नाम से जाना जाता है। इसी मान्यता के कारण इस नदी का पानी कोई नहीं पीता।

उत्तरकाशी के लोकगीतों में दुर्योधन के साथ ही भब्रूवाहन और कर्ण की प्रशंसा की जाती है। उन्हें देवताओं के समान पूजा जाता है।

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यहां स्थित हैं दुर्योधन और कर्ण के मंदिर, की जाती है उनकी पूजा-1

महाभारत के विभिन्न पात्रों के साथ भिन्न-भिन्न कहानियां जुड़ी हैं। उनका महाभारत काल में क्या महत्व था, उनकी छवि कैसी थी यह सब हमें महाभारत की कहानियां पढ़ने पर मालूम होता है। जिसने भी महाभारत की गाथा को ध्यानपूर्वक ना सही तो कम से कम सरसरी तौर पर पढ़ रखा है तो वह महाभारत के पात्रों के बारे में कुछ ना कुछ तो बता ही सकता है।

उदाहरण के लिए यदि प्रश्न किया जाए कि महाभारत का सबसे अधिक समझदार पात्र कौन था तो हर कोई युधिष्ठिर का नाम लेता है। महाभारत का कुशल धनुर्धर कौन था, तो जवाब आता है राजकुमार अर्जुन। परंतु यदि पूछा जाए कि इस काल का सबसे निंदित पात्र कौन था, तो उत्तर में हमें कौरवों के राजकुमार दुर्योधन का नाम मिलता है।

इसी तरह से यदि महाभारत की गाथा में किसी ऐसे पात्र के बारे में पूछा जाए जो हर परिस्थिति में परिपूर्ण था, कुशल था, समझदार था और हर वस्तु पाने की क्षमता रखता था, लेकिन किस्मत ने उसका साथ ना दिया, तो बताएं यह कौन था? यह था माता कुंती का विवाह से पूर्व जन्मा युवा पुत्र कर्ण, जिसे उन्होंने बदनामी से बचने के लिए नदी में बहा दिया था लेकिन अंतत: वह एक सूत परिवार को मिला जिन्होंने उसका लालन-पोषण किया।

महाभारत की गाथा में कर्ण की कहानी काफी मार्मिक थी। जन्म के समय ही जिस पुत्र को उसकी माता ने दरकिनार कर दिया, बाद में एक अच्छा धनुर्धर होने के बावजूद भी गुरु द्रोण ने उसे विद्या देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह एक सूत-पुत्र था। अंतत: भगवान परशुराम से धनुष विद्या लेने पर भी उसे सही जगह इस्तेमाल ना कर सकना, और ईर्ष्या की चपेट में आ जाने के कारण पाण्डवों की जगह कौरवों का साथ देना ही कर्ण की किस्मत में लिखा था।

विशेष शोधकर्ताओं ने यह कहा है कि कर्ण महाभारत का निंदित पात्र नहीं था, वरन् बना दिया गया था। यदि कर्ण सही संगति में होता तो शायद उसका चरित्र महाभारत में कुछ और ही होता। यदि उसे उसकी माता अपना लेती तो वह मामूली इंसान ना होकर पाण्डवों का ज्येष्ठ भाई कहलाता।

दूसरी ओर महाभारत के सबसे अधिक निंदित पात्र कहलाए जाने वाले दुर्योधन को भी शायद परिस्थितियों ने ही सबके विरुद्ध कर दिया था। बचपन से ही अपने मामा द्वारा सत्ता का लालच दिया जाना और बड़े होते-होते पाण्डवों के प्रति ईर्ष्या की भावना रखने से ही धीरे-धीरे दुर्योधन एक निंदित पात्र बन गया।

शायद दुर्योधन और कर्ण की इन्हीं अनजानी अच्छाइयों की वजह से आज उनकी पूजा की जाती है। जी हां…. आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी लेकिन यह सत्य है कि महाभारत के निंदित पात्र कहे जाने वाले दुर्योधन और कर्ण की पूजा की जाती है। उनके नाम से मंदिर की स्थापना भी की गई है जहां उन दोनों की विधि पूर्वक प्रार्थना की जाती है।

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि भी कहा जाता है यहां महाभारत के खलनायक दुर्योधन और दानवीर कर्ण को भी पूजा जाता है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में दुर्योधन और कर्ण के मंदिर स्थित हैं। दुर्योधन का मंदिर यहां के नेतवार नामक जगह से करीब 12 किमी दूर ‘हर की दून’ रोड पर स्थिनत सौर गांव में है। देहरादून से करीब 95 किमी दूर चकराता और चकराता से करीब 69 किमी दूर नेतवार गांव है।

इसके अलावा महाभारत के दूसरे पात्र कर्ण का मंदिर नेतवार से करीब डेढ़ मील दूर सारनौल गांव में है।

Om Namah Shivay

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अमरता की चाह में बना था विष्णु का ये प्राचीन मंदिर

विश्व में अलग-अलग धर्मों और संप्रदायों को मानने वाले लोग रहते हैं। सर्वोच्च सत्ता भले ही एक है लेकिन अलग-अलग मान्यताएं होने की वजह से सभी का पूजा करने का तरीका और स्थान भी अलग-अलग हैं। मसलन चर्च में जाकर ईसाइयों को अपने ईश्वर नजर आते हैं, वही ईश्वर हिन्दू मंदिर में भी मिलते हैं। मुसलमान मस्जिद जाकर अपने अल्लाह से मिलकर आता है तो सिख गुरुद्वारों की सीढ़ियों को स्वर्ग समझता है। जितने अलग लोग उतनी ही अलग उनकी आस्था।

इन्द्र का मंदिर
खैर, जहां बात आस्था की होती है वहां किसी भी प्रकार का तर्क-वितर्क मायने नहीं रखता। इसलिए आज हम आपको एक ऐसे मंदिर की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि स्वयं देवराज इन्द्र ने महल के तौर पर अपने बेटे के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

अंगकोर वाट
कंबोडिया स्थित अंगकोर वाट के विषय में 13वीं शताब्दी में एक चीनी यात्री का कहना था कि इस मंदिर का निर्माण महज एक ही रात में किसी अलौकिक सत्ता के हाथ से हुआ था। यह सब तो इस महल रूपी मंदिर से जुड़ी लोक कहानियां हैं, असल में इस मंदिर का इतिहास बौद्ध और हिन्दू दोनों ही धर्मों से बहुत निकटता से जुड़ा है।

कंबोडिया
अंगकोर वाट नामक विशाल मंदिर का संबंध पौराणिक समय के कंबोदेश और आज के कंबोडिया से है। यह मंदिर मौलिक रूप से हिन्दू धर्म से जुड़ा पवित्र स्थल है, जिसे बाद में बौद्ध रूप दे दिया गया।

हिन्दू और बौद्ध
इतिहास पर नजर डाली जाए तो करीब 27 शासकों ने कंबोदेश पर राज किया, जिनमें से कुछ शासक हिन्दू और कुछ बौद्ध थे। शायद यही वजह है कि कंबोडिया में हिन्दू और बौद्ध दोनों से ही जुड़ी मूर्तियां मिलती हैं।

बौद्ध अनुयायी
कंबोडिया में बौद्ध अनुयायियों की संख्या अत्याधिक है इसलिए जगह-जगह भगवान बुद्ध की प्रतिमा मिल जाती है। लेकिन अंगकोर वाट के अलावा शायद ही वहां कोई ऐसा स्थान हो जहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की मूर्तियां एक साथ हों।

विष्णु का मंदिर
इस मंदिर की सबसे बड़ी खास बात यह भी है कि यह विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर भी है। इसकी दीवारें रामायण और महाभारत जैसे विस्तृत और पवित्र धर्मग्रंथों से जुड़ी कहानियां कहती हैं।

विश्व धरोहर
विश्व धरोहर के रूप से पहचाने जाने वाले इस मंदिर को 12 शताब्दी में खमेर वंश से जुड़े सूर्यवर्मन द्वितीय नामक हिन्दू शासक ने बनवाया था। लेकिन चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते यहां बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों का शासन स्थापित हो गया और मंदिर को बौद्ध रूप दे दिया गया।

आलीशान मंदिर
बौद्ध रूप ग्रहण करने के काफी सालों बाद तक इस मंदिर की पहचान लगभग खोई रही लेकिन फिर एक फ्रांसीसी पुरात्वविद की नजर इस पर पड़ी और उसने फिर से एक बार दुनिया के सामने इस बेशकीमती और आलीशान मंदिर को प्रस्तुत किया। बहुत से लोग इस मंदिर को दुनिया के सात अजूबों में से एक करार देते हैं।

भारत से जुड़ाव
भारत के राजनैतिक और धार्मिक अवधारणा के आधार पर ही अंगकोर नगरी का निर्माण हुआ था। इसके अलावा अंगकोर मंदिर के निर्माण के पीछे इसे बनवाने वाले राजा का एक खास मकसद भी जुड़ा हुआ था।

अमरता का लालच
दरअसल राजा सूर्यवर्मन हिन्दू देवी-देवताओं से नजदीकी बढ़ाकर अमर बनना चाहता था। इसलिए उसने अपने लिए एक विशिष्ट पूजा स्थल बनवाया जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों की ही पूजा होती थी। आज यही मंदिर अंगकोर वाट के नाम से जाना जाता है।

अंगकोर की राजधानी
लगभग 6 शताब्दियों तक अंगकोर राजधानी के रूप में पहचानी जाती रही। इसी दौरान अंगकोर वाट की संरचना और बनावट को कई प्रकार के परिवर्तनों से भी गुजरना पड़ा। मूलत: यह मंदिर शिव को समर्पित था, उसके बाद यहां भगवान विष्णु की पूजा होने लगी।

आक्रमण
लेकिन जब बौद्ध धर्मावलंबियों ने इस स्थान पर अपना आधिपत्य कायम किया तब से लेकर अब तक यहां बौद्ध धर्म की महायान शाखा के देवता अवलोकितेश्वर की पूजा होती है।

संयमित धर्म
13वीं शताब्दी के आखिर तक आते-आते अंगकोर वाट की संरचना को संवारने का काम भी शिथिल पड़ता गया। और साथ ही थेरवाद बौद्ध धर्म के प्रभाव के अंतर्गत एक संयमित धर्म का उदय होने लगा।

खमेर साम्राज्य पर आक्रमण
इसी दौरान अंगकोर और खमेर साम्राज्य पर आक्रमण बढ़ने लगे। 16वीं शताब्दी के आगमन से पहले ही अंगकोर का सुनहरा अध्याय लगभग समाप्त हो गया और अन्य भी बहुत से प्राचीन मंदिर खंडहर में तब्दील हो गए।

मंदिर की देखभाल
15वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी ईसवी तक थेरवाद के बौद्ध साधुओं ने अंगकोर वाट मंदिर की देखभाल की, जिसके परिणामस्वरूप कई आक्रमण होने के बावजूद इस मंदिर को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा।

एएसआई
बाद की सदियों में अंगकोर वाट गुमनामी के अंधेरे में लगभग खो सा गया था। 19वीं शताब्दी के मध्य में एक फ्रांसीसी अंवेषक और प्रकृति विज्ञानी हेनरी महोत ने अंगकोर की गुमशुदा नगरी को फिर से ढूंढ़ निकाला। वर्ष 1986 से लेकर वर्ष 1993 तक भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस मंदिर के संरक्षण का जिम्मा संभाला था।

पवित्र तीर्थ स्थल
आज के समय में अंगकोर वाट दक्षिण एशिया के प्रख्यात और अत्याधिक प्रसिद्ध धार्मिक स्थानों में से एक है।

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