Moving In Sync With The Cosmic Flow

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Moving In Sync With The Cosmic Flow

To count beads or practise ritualistic worship without directing one’s mind towards the Supreme is of no use. To pretend to be virtuous outside while harbouring sinful thoughts within is absolutely meaningless. The beginning, the middle and end of dharma sadhana is to rush towards the Supreme, to channelise all positive and negative propensities of mind towards the Entity. Spiritual aspirants will not destroy material desires but will utilise them for their benefit. When utilised as aids for spiritual progress they will do no further harm.

So-called jnanis or intellectuals may fight the propensity of krodha, anger, but seekers will utilise it to fight staticity. They will shatter the meanness and pettiness of the mind through psychic strength and fearsome temper. So-called jnanis claim that the propensity of lobha, greed, is harmful, but aspirants disagree ­ they nurture greed to attain the Supreme. Jnanis abhor mada or pride but seekers say that the only object of pride in their lives is Parama Purusha. Jnanis detest the propensity of moha, blind attachment, but aspirants say, “I am already in love with the Supreme. I have a blind attachment for attaining the Ultimate. The propensity of jealousy is very bad, but a spiritual aspirant will never take it as harmful. In this way spiritual aspirants keep their vision fixed on Brahmn.

Those who fail to focus their entire existence upon the Supreme, those who do not flow towards the macrocosmic nucleus of the cosmic cycle, realise one day that everything in their lives has become futile. On seeing the ostentatious practices of religion the popular ideas of a Sufi saint are likely to arise in the mind of a spiritual aspirant: “I listen to the voice of the muezzin from the minaret in darkness. I say you are all fools ­ where is your God? He is neither here, nor there.” When the cosmic flow is inspired by the cosmic nucleus it vibrates in its entirety, thereby vibrating all the receptive minds in the universe. These emanated vibrations take different forms to provide momentum to human beings in different ways.

This force of inspiration keeps all receptive minds connected to Purushottama, the Supreme Source of all emanations, and motivates them to rush towards Him.

When the macrocosmic stance dances in its individual macrocosmic flow, the microcosms dance in pararasa, individual flow.

In the past the svarasa, divine flow, of Brahmn, the Supreme Consciousness, was expressed through Chaitanya Mahaprabhu, causing people to madly run after him, dancing, crying, singing and laughing in ecstatic joy.Brahmn’s svarasa was also expressed in the flute melody of Krishna, which resonated with such divine sweetness that people ran towards it, madly forgetting their family , culture, prestige, lineage, and so on.

The gopis of Vrindavan also danced, sang and burst into laughter to the strains of the flute. In Ananda Marga this divine flow of Brahmn is embedded in different lessons of spiritual meditation.Those who practise this meditation ­ whether in the present or the future, whether within time or beyond time ­ will certainly cry, sing and dance with exquisite spiritual joy, and advance steadily towards the blissful macrocosmic stance.

Advancing thus, establishing oneself in yama and niyama, cardinal moral principles, and becoming a true sadvipra or spiritual revolutionary, one will attain oneness with the Supreme Entity. The highest fulfilment in life lies in movement in the cosmic flow. The path along which this movement takes place is called the path of bliss, Ananda Marga.

Om Namah Shivay

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तुम मुझे देखा करो और मैं तुम्हें देखा करूँ

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हमारा मन वहीं लगता है, जहाँ हमारी अभिलाषित वस्तु होती है, जहाँ हमें अपनी रूचि के अनुकूल सुख, सौंदर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि दिखायी देते हैं | विचार करके देखने से पता लगता है कि जगत में हम जो प्रिय वस्तु, सुख, सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि देखते है, उन सभी का पूर्ण अमित अनन्त भण्डार श्रीभगवान हैं | समस्त वस्तुएँ, समस्त गुण, समस्त सुख-सौन्दर्य भगवान् के किसी एक अंश के प्रतिबिम्बमात्र हैं | उस महान अनन्त अगाध सागर के सीकर-कण की छायामात्र हैं | हमें जो वस्तु जितनी चाहिए, जब चाहिए, वही वस्तु उतनी ही और उसी समय भगवान् में मिल सकती है; क्योंकि वे सदा-सर्वदा उनसे अनन्तरूप से भरी हैं और चाहे जितनी निकाल ली जानेपर भी कभी उनकी अनन्तता में कमी नहीं आती | अतएव हमारा मन जिस किस में लगता हो, उसी को दृढ विश्वास के साथ भगवान् में देखना चाहिए | फिर हम कभी भगवान् से अलग नहीं होंगे और भगवान् हमसे अलग नहीं होंगे; क्योंकि सबकुछ भगवान् से, भगवान् में है तथा भगवत्स्वरूप ही है | भगवान् ने कहा है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे प्रणश्यति ||
(गीता ६ | ३०)
‘जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता | भाव यह कि वह मुझे देखता रहता है और मैं उसे देखता रहता हूँ |’

इसी के साथ हमें अपने को ऐसा बनाना चाहिए, जो भगवान् को अत्यन्त प्रिय हो | गीता में १२वें अध्याय के १३वें से १९वें श्लोक तक भगवान् ने अपने प्रिय भक्त के लक्षणों का वर्णन किया है | और अंत में कहा है—
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया:॥
( गीता १२ | २०)
‘परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं अर्थात् उस प्रकार का अपना जीवन बनाने में तत्पर होते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं |’

इसलिए हमें अपने में उन सब भावों की दृढ़ स्थापना करनी चाहिए, जो भगवान् को प्रिय हैं | ऐसा होनेपर जब भगवान हमसे प्रेम करने लगेंगे, उनका मन हममें लगा रहेगा—(प्रेम तो वे अब भी करते हैं | परन्तु हमें उनका अनुभव नहीं होता, उनके अनुकूल आचरण करने से अर्थात् उन सब प्रिय गुणों को जीवन में उतरने से हमें भगवान् के प्रेम का अनुभव होने लगेगा) तब हमारा मन भी उसमें लगा रहेगा | हमें तो बस, विनोदपूर्वक भगवान् से यही भाव रखना चाहिए और यही मन-ही-मन कहना चाहिए कि ‘प्रभो ! न तो मैं दूसरों को देखूंगा और न आपको देखने दूंगा |’

आवहु मेरे नयन में पलक बन्द करि लेउँ |
ना मैं देखौं और कौं ना तोहि देखन देउँ ||
नारायण जाके हृदै सुन्दर श्याम समाय |
फूल-पात-फल-डार में ता कौं वही दिखाय ||

Om Namah Shivay

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प्रेम और शरणागति

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अतएव हमलोगों को संसार के सारे पदार्थों को लात मारकर प्रभु की शरण में जाना चाहिए | ऋद्धि-सिद्धि, मान-बड़ाई और प्रतिष्ठा आदि से भी वृतियां हटा लेनी चाहिए | यह अपार संसार एक अथाह सागर है | इसके पार जाने के दो ही साधन हैं—नाव से जाना अथवा तैरकर जाना | नाव प्रभु का प्रेम है और तैरना है सांख्योग यानी ज्ञान | कहने की आवश्यकता नहीं कि तैरने की अपेक्षा नाव में जाना सुगम, निश्चित और सुरक्षित है |

प्रेमरूपी नौका की प्राप्ति के लिए प्रभु की शरण जाना चाहिए | तैरने के लिए तो हिम्मत और त्याग की आवश्यकता है | तैरने में हाथ और पैर से लहरें चीरते हुए आगे बढ़ा जाता है | संसार-सागर में विषयरूपी जल को हाथ और पैर से फेंकते हुए हम तैर जा सकते हैं—उस पार जाने का लक्ष्य न भूलें और लहरों में हाथ-पैर न रुकें | तैरने के समय शरीर पर कुछ भी बोझ न होना चाहिए | इसी प्रकार विषयों की लहरों को चीरकर आगे बढ़ने के लिए हमारे भीतर तीव्र और दृढ़ वैराग्यरूपी उत्साह का होना आवश्यक है | इसके बिना तो एक हाथ भी बढ़ना असम्भव है | हाथों से लहरें चीरता जाय, पैरों से जल फेंकता जाय |

सच्चे आत्मसमर्पण में तो विषयासक्ति का त्याग अनिवार्य है ही | विषयों में प्रेम भी हो और भगवदर्पण भी हो, यह सम्भव नहीं |

काँचन-कामिनी से भी अधिक मीठी छुरी मान-बड़ाई है | इसने तो बहुत ही बड़े-बड़े साधकों फँसा दिया, रोक दिया और अंततोगत्वा डुबा दिया | इससे सदा बचे रहना चाहिए |

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि ज्ञान से तैरने की अपेक्षा प्रेममयी नित्य-नवीन नौका में जाना सुखप्रद, सहज और आनन्ददायक है |

वह विशुद्ध प्रेम प्रभु की अनन्य शरण होने से ही प्राप्त होता है, अतएव अनन्य शरण होकर जाना ही नौका से जाना है | संसार-सागर को तो हर दशा में लाँघना ही पड़ेगा | ‘उस पार’ गये बिना तो प्राणवल्लभ की झाँकी होने की नहीं | फिर क्यों न उसी की शरण में जाकर उसी के हाथ का सहारा बनकर चल चलें | भगवान् ने स्वयं प्रतिज्ञा भी की है—
ये तू सर्वाणि कर्माणि मयि संयस्य मत्पराः |
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||
(गीता १२ | ६-७)
‘हे अर्जुन ! जो मेरे परायण हुए भक्तजन, सम्पूर्ण कर्मों को मेरे में अर्पण करके, मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही तैलधारा के सदृश अनन्य ध्यानयोग से निरन्तर चिंतन करते हुए भजते हैं, उन मेरे में चित्त को लगानेवाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्र से उद्धार करनेवाला होता हूँ |’ यह संसार-समुद्र बड़ा ही दुस्तर है, इससे तरने का सहज उपाय भगवान् की शरण ही है | भगवान् ने कहा है कि—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते |
(गीता ७ | १४)
‘यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं |’

अतएव हमलोगों को प्रेम और प्रेममय भगवान् की प्राप्ति के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सब प्रकार भगवान् की अनन्य शरण* होना चाहिए |
· अनन्ययोग से उपासना, अव्यभिचारिणी भक्ति एवं अनन्यशरण—यह तीनों एक ही हैं |

Om Namah Shivay

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रुद्राक्ष वृक्ष

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रुद्राक्ष के वृक्ष भारत समेत विश्व के अनेक देशों में पाए जाते हैं. यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तथा मैदानी इलाकों में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. रुद्राक्ष का पेड़ किसी अन्य वृक्ष की भांति ही होता है, इसके वृक्ष 50 से लेकर 200 फीट तक पाए जाते हैं तथा इसके पत्ते आकार में लंबे होते हैं. रुद्राक्ष के फूलों का रंग सफेद होता है तथा इस पर लगने वाला फल गोल आकार का होता है जिसके अंदर से गुठली रुप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है.

रुद्राक्ष का फल खाने में अधिक स्वादिष्ट नहीं होता इसके फलों का स्वाद कुछ खटा या फिर कसैला सा होता है. इसके हरे फल पकने के पश्चात स्वयं ही गिर जाते हैं और जब उनका आवरण हटता है तो एक उसमे से अमूल्य रुद्राक्ष निकलते हैं. यह इन फलों की गुठली ही होती है. रुद्राक्ष में धारियां सी बनी होती है जो इनके मुखों का निर्धारण करती हैं. रुद्राक्ष को अनेक प्रकार की महीन सफाई प्रक्रिया द्वारा उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है जिसे उपयोग में लाकर सभी लाभ उठाते हैं.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में रुद्राक्ष |

रुद्राक्ष भारत, के हिमालय के प्रदेशों में पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त असम, मध्य प्रदेश, उतरांचल, अरूणांचल प्रदेश, बंगाल, हरिद्वार, गढ़वाल और देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में यह रुद्राक्ष पाए जाते हैं. इसके अलावा दक्षिण भारत में नीलगिरि और मैसूर में तथा कर्नाटक में भी रुद्राक्ष के वृक्ष देखे जा सकते हैं. रामेश्वरम में भी रुद्राक्ष पाया जाता है यहां का रुद्राक्ष काजु की भांति होता है. गंगोत्री और यमुनोत्री के क्षेत्र में भी रुद्राक्ष मिलते हैं.

नेपाल और इंडोनेशिया से प्राप्त रुद्राक्ष |

नेपाल, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि प्रमुख रूप से रुद्राक्ष के बहुत बड़े उत्पादक रहे हैं और भारत सबसे बडा़ ख़रीदार रहा है. नेपाल में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में काफी बडे़ होते हैं, लेकिन इंडोनेशिया और मलेशिया में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में छोटे होते हैं. भारत में रुद्राक्ष भारी मात्रा में नेपाल और इंडोनेशिया से मंगाए जाते हैं और रुद्राक्ष का कारोबार अरबों में होता है. सिक्के के आकार का रुद्राक्ष, जो ‘इलयोकैरपस जेनीट्रस’ प्रजाति का होता है, बेहद दुर्लभ होता जो नेपाल से प्राप्त होता है.

विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष |

भारत के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष की खेती की जाती है तथा इसके वृक्ष पाए जाते हैं. नेपाल, जावा, इंडोनेशिया, मलाया जैसे देशों में रुद्राक्ष उत्पन्न होता है. नेपाल ओर इंनेशिया में मिलने वाले रुद्राक्ष भारत में मिलने वाले रुद्राक्षों से अलग होते हैं. नेपाल में बहुत बडे़ आकार का रुद्राक्ष पाया जाता है तथा यहां पर मिलने वाले रुद्राक्ष की किस्में भी बहुत अच्छी मानी गई हैं. नेपाल में एक मुखी रुद्राक्ष बेहतरीन किस्म का होता है.

रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा हो दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं. भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते.

माना जाता है कि भारत में बिकने वाले 80 फीसदी रुद्राक्ष फर्जी होते हैं और उन्हें तराश कर बनाया जाता है. इसलिए रुद्राक्ष को खरीदने से पहले इसके गुणवत्ता को देखना बेहद आवश्यक है. अपने औषधीय और आध्यात्मिक गुणों के कारण रुद्राक्ष का प्रचलन बहुत है. रुद्राक्ष के गुणों के कारण ही सदियों से ऋषि-मुनि इसे धारण करते आए हैं.

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Shouldering The Burden Of Others

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Is the misery less even if one is bound with chains made of gold?

No, bondage is bondage whether chains are made of gold or iron.The bondage of satkarma, good actions, is that of gold, and that of asatkarma, bad actions, iron. Both are to be broken off. One has to refrain from bad actions so that iron chains might not be forged; and good actions are to be effected, but offer the golden chains at the feet of Paramatma, saying: “I do not desire the fruits of my good actions, I offer them to You.“

As long as the physical body exists, some actions are bound to be performed. No one can help doing actions.Respiration is itself an action. Even if one does not desire any action and sleeps, then that sleep, too, is an action. Good, and not bad actions, must be performed, which too are to be offered to the Supreme. Now the question arises whether the reactions will be just (equal) to the actions, or less, or more. Equal and opposite reaction is the rule, but then, whether the enjoyment of the reaction of actions is purely psychic or physicopsychic is to be seen.

Where the action is purely mental, the reaction will be just equal to it. But the reaction of physico-psychic action does not affect the mind cent per cent. If the mind is not affected by physico-psychic action, nothing happens. If there be some quantity of the reaction of physico-psychic action (that affects the body), in that case, the reaction will be much more than the action performed. The mind will be affected just according to the psychic action ­ that is the case with psychic actions. Action in the pure physical sphere does not affect the mind. The pure psychic coupled with the physical of a physico-psychic reaction, add up to produce a greater reaction. So the quantity of reaction in case of a physico-psychic action becomes much greater. Hence one should be careful.

There are so many grades of spiritual practitioner. Some wish to exhaust their samskaras as soon as possible and accept whatever is due. Others say , “I am ready to bear the fruits of my own actions and bear the samskaras (reactions to past actions) of others.“

Some want to carry the burdens of others so that others might not be in trouble. The practitioner reaches a stage where complete devotion is aroused for the Supreme. Then one remains unaffected even if a cyclone of misery attacks him. The sadhaka of that stage is called `dagdhabiija’ or `burnt seed’. A dagdhabiija comes within the range of the psychic directly .

Biija means `seed’. Wherever a seed is sown, it sprouts into a plant; but where the seed is burnt, a plant is not produced. A sadhaka becomes dagdhabiija when he has no more pain or pleasure of his own. One who has surrendered in toto is dagdhabiija. All carry their own burdens, but if a dagdhabiija sadhaka so desires, he can carry the burdens of others also. And those who want to carry the burden of others do lessen the burden of Paramatma indirectly .You should remember this.

Do not remain worried about your individual problems at all. Be prepared to carry your own burden and be prepared also to carry the burdens of others. Then alone are you brave. Be dagdhabiija.

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केदारनाथ मंदिर

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सच्ची श्रद्धा

नगरका नाम और ठीक समय याद नहीं है। वर्षा-ऋतु बीती जा रही थी; किंतु वर्षा नहीं हुई थी। किसानोंके खेत सूख रहे थे। चारे के अभाव में पशु मरणासन्न हो गये थे। जब कोई मानव-प्रयास सफल नहीं होता, तब मनुष्य उस त्रिभुवन के स्वामीकी ओर देखता है। गाँवके सब लोग गिरजाघरमें एकत्र हुए वर्षाके लिये प्रार्थना करने। एक छोटा बालक भी आया था; किंतु वह आया था अपने साथ छोटा सा छाता लेकर। किसी ने उससे पूछा-‘तुझे क्या इतनी धूप लगती है कि छाता लाया है?’

बालक बोला-‘वर्षा होगी तो घर भीगते जाना पड़ेगा, इससे मैं छाता लाया हूँ कि भीगना न पड़े।’

प्रार्थना की जायगी और वर्षा नहीं होगी, यह संदेह उस शुद्धचित बालक के मन में नहीं उठा। जहाँ इतना सरल विश्वास है, वहाँ प्रार्थना के पूर्ण होनेमें संदेह कहाँ। प्रार्थना पूर्ण होते-होते तो आकाश बादलों से ढ़क चुका था और झड़ी प्रारम्भ हो गयी थी। बालक अपना छाता लगाये आराम से घर गया। यह वर्षा इतनी भीड़ के प्रार्थना करनेसे होती या नहीं, कौन कह सकता है; किंतु वह हुई, क्योंकि प्रार्थना करनेवालोंमें वह सच्चा श्रद्धालु बालक भी था।

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करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक केदारनाथ मंदिर के कुछ महत्वपूर्ण राज पहली बार उजागर हुए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को मंदिर के 11-12वीं सदी में निर्मित होने प्रमाण मिले हैं।

केदारनाथ मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए अक्षरों (पुरालेखों) के अध्ययन के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा। मंदिर की दीवारों पर प्रारंभिक नागरी व नागरी में लिखे अक्षर मिले, जो 11-12वीं सदी में ही लिखे जाते थे।

गौरतलब है कि पिछले साल जून में आई प्राकृतिक आपदा के बाद केदारनाथ मंदिर के भीतर जमकर मलबा भर गया था। एएसआई को मलबे की सफाई के दौरान मंदिर की दीवारों पर जगह-जगह अक्षर (पुरालेख) गुदे हुए मिले, जिनके अध्ययन के लिए मैसूर से विभाग की इफिग्राफी ब्रांच के विशेषज्ञ बुलाए गए थे।

इफिग्राफी ब्रांच के निदेशक डॉ. रविशंकर की ओर से अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर विभाग के महानिदेशक व क्षेत्रीय कार्यालय, देहरादून को भेजी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरालेख प्रारंभिक नागरी व नागरी में दर्ज हैं, जिससे माना जा सकता है कि मंदिर 11-12वीं सदी में अस्तित्व में आया।

विशेषज्ञों ने चिंता भी जाहिर की कि पुरालेखों में किसी तारीख का उल्लेख नहीं मिला। न ही किसी राजवंश का नाम दीवारों में दर्ज पाया गया।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी पता चला कि यह पुरालेख मंदिर में आने श्रद्धालुओं या आमजन का है। इनकी लिखावट आड़ी-तिरछी पाई गई, क्योंकि किसी राजा या खास पुरालेख में बनावट आदि का विशेष ख्याल रखा जाता था। पुरालेखों में दान देने, भगवान को नमन करने व मंदिर तक सकुशल पहुंचने आदि का जिक्र मिला है।

अब तक मंदिर निर्माण की मान्यताएं

एक मान्यता के अनुसार केदारनाथ मंदिर को आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था, जबकि राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित अभिलेखों में मंदिर को 12-13वीं शताब्दी का बताया गया।

वहीं, ग्वालियर में मिली एक राज भोज स्तुति में मंदिर को 1076-99 काल का माना गया। पांडव या उनके वंशज जनमेजय के समय भी मंदिर निर्माण की बात सामने आती है।

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Inscrutable Shiva And Shaiva Siddhanta 

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As the curtain is pulled back to reveal the inner sanctum, one is drawn into the world of Nirakara Shiva, beyond even the physical symbolism of a Linga, where the vast expanse of the sky above and the ether zone are mirrored in the `Akasha Linga’ of Chidambaram. Shiva takes his devotees into an interiorised world of consciousness, mapping out the Akasha or sky-ether of the mind, beyond the noumenal world of names and forms.

But is it as abstract as it seems, I wonder, for the Thillai (mangrove) forest ground of the Chidambaram temple is witness to the ananda tandava dance of Shiva, in one of his most beautiful forms as Nataraja, the fountainhead of the creative impulse. Traditional lore views Chidambaram as the site of the original Cosmic Linga, an ellipsoid around which the rest of the universe rotates. This dance of creative bliss is said to have been performed by Shiva for the two sages, Vyghrapada and Patanjali, who had asked for the boon to witness the dance.

Which one is the more seminal attribute of Shiva, I wonder ­ is it the ascetic yogic aspect of Shiva characterised by dispassionate withdrawal and penance, or is it the creatively pulsating energy of Shiva, which calls for an active engagement with the world, in the realisation that the outer embodied universe reflects the disembodied One, that the materiality is also actually spiritual only? As I move into the main dance hall of the Chidambaram complex, I marvel at the persona of Shiva, where different attributes complement each other, not contradict. His all-encompassing compassion and love for devas and asuras alike, without discriminating between the two, reveals a Being in love with creation, not a destroyer. Perhaps what he seeks to destroy is the negativity and the baser elements of our nature.

John Marshall saw a Proto-Shiva in the famous Pashupati seal of Mohenjodaro where four wild animals ­ tiger, buffalo, elephant and rhinoceros ­ surround the yogi-God sitting in the meditation pose, the three faces representing Time in its past, present and future dimensions.

The Mahakal, Controller of Time, the Rudra, God of wild beasts and Yogeswara, the Supreme Yogi aspects of Shiva appear to coalesce in this Indus seal. Other traditions like the Tevaram hymns and the Tirumurai compendium of songs in Tamil eulogise the Ashutosh svarupa of Shiva the God who melts at the call of a sincere prayer.

The Tirumurai tradition maps out the philosophy of Shaiva Siddhanta , with its formulation of three eternal entities of God, soul and bondage ­ Pati, pasu and pasam. The Shaiva Siddhanta states that God is One, souls are many and bondage happens because of the three impurities of anava which causes the negativity of soul ­ karma, the law of action-reaction and Maya the cause of all materiality . Maya is real in Shaiva Siddhanta and not an illusion as in Vedanta. Shiva’s Grace alone can help in breaking this bondage and evolution of the Soul to an understanding of the relationship between the Nirakara aspect of the Self and the dynamic aspect of the Self ‘s energy as it manifests .

They say that Shiva is finally within only . But the inscrutable and beautiful outer form of Shiva gives as much solace.

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