कर्तव्य

वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते ।
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कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता । छोटे-से-छोटा और बडे-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है ।
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जिससे दूसरोंका हित होता है, वही कर्तव्य होता है । जिससे किसीका भी अहित होता है, वह अकर्तव्य होता है ।
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राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यको कर्तव्य-पालनमें परिश्रम या कठिनाई प्रतीत होती है ।

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मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें अपने कर्तव्यका पालन कर सकता है । कर्तव्यका यथार्थ स्वरूप है‒सेवा अर्थात् संसारसे मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको संसारके हितमें लगाना ।
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अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है । इसके विपरीत अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यके चित्तमें स्वाभाविक खिन्नता रहती है ।
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साधक आसक्तिरहित तभी हो सकता है, जब वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको ‘मेरी’ अथवा ‘मेरे लिये’ न मानकर, केवल संसारकी और संसारके लिये ही मानकर संसारके हितके लिये तत्परतापूर्वक कर्तव्य-कर्मका आचरण करनेमें लग जाय ।

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असली गुरु वह होता है, जो दूसरेको अपना शिष्य नहीं बनाता, प्रत्युत गुरु ही बनाता है अर्थात् तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त बना देता है, दुनियाका उद्धार करनेवाला बना देता है । ऐसा गुरु गुरुओंकी टकसाल, खान होता है ।

वास्तवमें जो महापुरुष (गुरु) होते हैं, वे शिष्य नहीं बनाते । उनके भीतर यह भाव कभी रहता ही नहीं कि कोई हमारा शिष्य बने तो हम बात बतायें । हाँ, उस महापुरुषसे जिनको ज्ञान मिला है वे उसको अपना गुरु मान लेते हैं । कोई माने, चाहे न माने, जिससे जितना ज्ञान मिला है, उस विषयमें वह गुरु हो ही गया । जिनसे हमें शिक्षा मिलती है, लाभ होता है, जीवनका सही रास्ता मिलता है, ऐसे माता-पिता, शिक्षक, आचार्य आदि भी ‘गुरु’ शब्दके अन्तर्गत आ जाते हैं ।

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‘आशीर्वाद दीजिये’‒ऐसा न कहकर आशीर्वाद पानेका पात्र बनना चाहिये ।
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वर्तमानका ही सुधार करना है । वर्तमान सुधरनेसे भूत और भविष्य दोनों सुधर जाते हैं ।
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दुःखी व्यक्ति ही दूसरेको दुःख देता है । पराधीन व्यक्ति ही दूसरेको अपने अधीन करता है ।
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अज्ञानी तो बीते हुएको स्वप्नकी तरह मानता है, पर ज्ञानी (विवेकी) वर्तमानको स्वप्नकी तरह मानता है ।
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वस्तुका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत उसके सदुपयोगका महत्त्व है ।

Om Namah Shivay

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