कैसे रावण की मृत्यु का कारण बनी ‘दासी मंथरा’?

रामायण और महाभारत की कहानियां

टीवी धारावाहिक देखने के बाद आजकल हर दूसरे इंसान के लिए ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसी कहानियां काफी बदल गई हैं। यह दोनों कहानियां मूल रूप से तो वही हैं, और उसी प्रकार दिखाई जाती हैं लेकिन हर बार जैसे ही कोई नया टीवी धारावाहिक आरंभ होता है, हमें उसमें एक नया ही मोड़ दिखाई देता है।

कहानियों में बदलाव

आज तक शायद ही किसी ने यह जाना होगा कि सीता स्वयंवर में रावण भी आया था। क्योंकि महर्ष वाल्मीकि रचित रामायण में इसका कोई भी उल्लेख नहीं है। इसी तरह से आज आप टीवी पर जब महाभारत देखेंगे, तो आपको नई कहानियां मिलेंगी।

नई कहानियां आई हैं

उदाहरण के तौर पर टीवी के माध्यम से महाभारत की एक कहानी काफी प्रचलित हो रही है जिसके अनुसार पानी के तालाब को फर्श समझ उसमें गिर जाने के बाद द्रौपदी ने दुर्योधन का मज़ाक बनाया, और उसे अंधे का पुत्र बताया था। ऐसी कोई भी घटना असली महाभारत ग्रंथ में मौजूद नहीं है।

संस्करणों में हैं ये कहानियां

ये नई कहानियां कैसे जन्मीं और कहां से आईं, इसके जवाब में कई उप-ग्रंथ सामने आए हैं। कई लोग रामायण एवं महाभारत के विभिन्न ऐसे संस्करणों का दावा करते हैं, जिनमें कई ऐसी कहानियां हैं जिन्हें असली ग्रंथों में शामिल नहीं किया गया था। इसलिए आम लोग इन्हें नहीं जानते।

एक नया मोड़ लाई हैं

ये कहानियां रामायण एवं महाभारत के काल को एक नया मोड़ देती हैं, इस काल के उत्पन्न होने पर एक नया निष्कर्ष निकालती हैं और इनसे जुड़े पात्रों के बारे में कुछ अलग ही व्याख्या करती हैं।

श्रीराम का वनवास

रामायण काल में श्रीराम के वनवास जाने, पीछे से पिता राजा दशरथ की मृत्यु एवं अयोध्या के बुरे समय आने का भागीदार रानी कैकेयी को माना जाता है। रामायण काल में बुरा समय आरंभ होने का सारा जिम्मा ही रानी कैकेयी को दिया गया है, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है।

रानी कैकेयी को ठहराया जिम्मेदार

शोधकर्ताओं ने यह बयान दिया है कि रानी कैकेयी किसी भी बुरे कार्य में अकेली भागीदार नहीं थी, अपितु वे तो स्वयं पुत्र राम को ही अयोध्या के महाराज एक रूप में देखना चाहती थीं। लेकिन उन्हें भड़काने वाली थी उनकी कुबड़ी दासी मंथरा।

लेकिन मंत्र की थी साजिश

विवाहोपरांत कैकेयी के ही साथ अयोध्या आई कुबड़ी मंथरा हर पल कैकेयी के कान भरती रहती। अयोध्या के राजा दशरथ के खिलाफ भी उसे भड़काती रहती और सिर्फ और सिर्फ भरत ही अयोध्या का भावी राजा हो, ऐसा उसने कैकेयी के दिमाग में भर दिया था।

जो बानी रावण की मृत्यु का कारण

कैकेयी भी मंथरा को अपनी दासी कम और अपना शुभचिंतक अधिक मान, उसकी बातों में आ गई। और फिर आगे जो हुआ यह सभी को मालूम है। लेकिन एक और तर्क एक अनुसार मंथरा ना केवल श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास भोगने का कारण बनी, बल्कि साथ ही वह ‘रावण की मृत्यु’ का कारण भी थी।

आश्चर्य की बात

जी हां… यह जान आपको आश्चर्य हो रहा होगा, लेकिन मंथरा को लंकापति रावण की मृत्यु का कारण माना जा रहा है। यह निष्कर्ष केवल कुछ तथ्यों को आधार बनाकर ही दिया गया है। जिसके अनुसार यदि मंथरा कैकेयी के साथ विवाहोपरान्त ना आती तो वह हमेशा केवल कैकेयी के हित की बात ना करती। वह स्वार्थी ना बनती और कैकेयी को कभी ना उकसाती कि कैकयी की कोख से जन्मा पुत्र ही अयोध्या का राजा बने।

स्वार्थ बन कारण

उसके स्वार्थ ने कैकयी के मन में भी स्वार्थपूर्ण विचारों को जगह दी। कैकयी अपने मातृत्व धर्म तथा राम के प्रति अपने स्नेह को भूलकर उस स्वार्थ के चक्रव्यूह में उलझ गई। इस स्वार्थ ने अयोध्या से उनका सर्वश्रेष्ठ राजा राम छीन लिया, एक पिता से अपना पुत्र दूर कर दिया और एक राजकुमार और उनकी पत्नी को वन में रहने के लिए मजबूर कर दिया।

एक अलग दृश्टिकोण

यहां से यह ज्ञात होता है कि शायद सारे गलती कैकेयी की ही थी, और उनके पीछे हाथ था मंथरा का जिसने अयोध्या का भाग्य बदलकर रख दिया। लेकिन इन सभी परिस्थितियों को यदि एक अन्य दृश्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल अयोध्या के ही नहीं, बल्कि साथ ही रावण के भाग्य को भी बदलने की क्षमता रखती थी।

आरम्भ हुआ रावण का विनाश

यही से रावण के विनाश का अंकुर फूटता है। विश्व कल्याण हेतु भगवान राम वन गमन करते हैं तथा ऋषियों को राक्षसों के भय से मुक्त कर रावण का वध करते हैं।

माँ सरस्वती जी की आरती

यह तर्क कितने सत्य हैं इसका आशय हमें सरस्वती माता की आरती में से प्राप्त होता है। आरती की एक पंक्ति में मंथरा, रावण की मृत्यु से कैसे जुड़ी है, यह उल्लिखित है – “पैठि मन्थरा दासी रवण संहार किया। (कहीं कहीं असुर संहार भी प्रयोग किया जाता है) ओम् जय सरस्वती माता।।“

इसमें हैं उल्लेख

इस पंक्ति से यह ज्ञात होता है कि सरस्वती माता जो कि वाक शक्ति हैं ने मन्थरा दासी को वो स्वार्थ भरे शब्द उच्चारण के लिए प्रेरित किया जिसके चलते सारे घटनाक्रम के बाद रावण का संहार हुआ।

Om Namah Shivay

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