किस देवी-देवता की कितनी बार करें परिक्रमा, ताकि मिले मनोवांछित फल-1

भगवान की भक्ति

किसी से यदि पूछें कि वे भगवान को किस प्रकार से याद करते हैं, तो भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्तर प्राप्त होते हैं। कोई कहता है कि प्रभु के नाम का जप करने से उन्हें याद किया जाता है तो कोई कहता है कि रागमयी अंदाज़ से भजन के माध्यम से उन्हें याद किया जाता है। यह भजन हमें ईश्वर से जोड़ते हैं, ऐसा मानते हैं लोग। लेकिन वहीं कुछ लोगों ने प्रभु की आराधना करने के विभिन्न तरीकों में कुछ छोटे-छोटे तरीके भी जोड़ दिए हैं, जिनका अपना ही एक खास अर्थ एवं महत्व है।

परिक्रमा है एक माध्यम

उदाहरण के लिए धार्मिक स्थलों पर भक्तों द्वारा की जा रही परिक्रमा की ही बात कर लीजिए। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या किसी भी अन्य धार्मिक स्थल पर आपने लोगों को उस पवित्र स्थल की, वहं मौजूद भगवान की मूरत की या फिर किसी भी ऐसी चीज़ के आसपास चक्कर लगाते हुए देखा होगा जिसकी जनमानस में काफी मान्यता है।

क्या है मान्यता

लोग कहते हैं कि परिक्रमा करनी जरूरी है, लेकिन क्या कभी आपने जाना है क्यों? परिक्रमा, जिसे संस्कृत में प्रदक्षिणा कहा जाता है, इसे प्रभु की उपासना करने का माध्यम माना गया है। सनातन धर्म के महत्वपूर्ण वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद से हमें प्रदक्षिणा के बारे में जानकारी मिलती है।

ऋग्वेद में क्या लिखा है?

ऋग्वेद के अनुसार प्रदक्षिणा शब्द को दो भागों (प्रा + दक्षिणा) में विभाजित किया गया है। इस शब्द में मौजूद प्रा से तात्पर्य है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब चार दिशाओं में से एक दक्षिण की दिशा। यानी कि ऋग्वेद के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी-देवता की उपासना करना। इस परिक्रमा के दौरान प्रभु हमारे दाईं ओर गर्भ गृह में विराजमान होते हैं। लेकिन यहां महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि प्रदक्षिणा को दक्षिण दिशा में ही करने का नियम क्यों बनाया गया है?

दक्षिण दिशा में हो परिक्रमा

मान्यता है कि परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है तभी हम दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़ते हैं। यहां पर घड़ी की सूई की दिशा में परिक्रमा करने का भी महत्व मौजूद है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के आधार पर ईश्वर हमेशा मध्य में उपस्थित होते हैं। यह स्थान प्रभु के केंद्रित रहने का अनुभव प्रदान करता है।

मध्य में भगवान

यह बीच का स्थान हमेशा एक ही रहता है और यदि हम इसी स्थान से गोलाकार दिशा में चलें तो हमारा और भगवान के बीच का अंतर एक ही रहता है। यह फ़ासला ना बढ़ता है और ना ही घटता है। इससे मनुष्य को ईश्वर से दूर होने का भी आभास नहीं होता और उसमें यह भावना बनी रहती है कि प्रभु उसके आसपास ही हैं।

परिक्रमा करने का लाभ

यदि आप परिक्रमा करने के लाभ जानेंगे तो वाकई खुश हो जाएंगे। क्योंकि परिक्रमा तो भले ही आप करते होंगे, लेकिन शायद ही इससे मिलने वाले आध्यात्मिक एवं शारीरिक फायदों को जानते होंगे। जी हां… परिक्रमा करने से हमारी सेहत को भी लाभ मिलता है।

ऊर्जा मिलती है

यूं तो हम मानते ही हैं कि प्रत्येक धार्मिक स्थल का वातावरण काफी सुखद होता है, लेकिन इसे हम मात्र श्रद्धा का नाम देते हैं। किंतु वैज्ञानिकों ने इस बात को काफी विस्तार से समझा एवं समझाया भी है। उनके अनुसार एक धार्मिक स्थल अपने भीतर कुछ ऊर्जा से लैस होता है, यह ऊर्जा मंत्रों एवं धार्मिक उपदेशों के उच्चारण से पैदा होती है। यही कारण है कि किसी भी धार्मिक स्थल पर जाकर मानसिक शांति मिलती है।

सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति

परिक्रमा से मिलने वाला फायदा भी इसी तथ्य से जुड़ा है। जो भी व्यक्ति किसी धार्मिक स्थान की परिक्रमा करता है, उसे वहां मौजूद सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह ऊर्जा हमें जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। इस तरह ना केवल आध्यात्मिक वरन् मनुष्य के शरीर को भी वैज्ञानिक रूप से लाभ देती है परिक्रमा।

परिक्रमा का इतिहास

यदि परिक्रमा का इतिहास जाना जाए तो सबसे पहली परिक्रमा शायद गणेश जी द्वारा अपने माता-पिता, माता पार्वती एवं भगवान शिव की गयी थी। पुराणों में उल्लिखित इस कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश की परीक्षा लेने का सोचा। उनसे कहा कि जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर सबसे पहले कैलाश पर्वत वापस लौटेगा, वही उनकी नजर में सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा।

Om Namah Shivay

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http://www.vedic-astrology.co.in/

 

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