सुखी कैसे बने

‘मैं हरि का, हरि मेरे रक्षक, यह भरोस नहिं जाय कभी |
जो हरि करिहैं सो मेरे हित, यह निश्चय नहिं जाय कभी ||

‘ईश्वर का प्रत्येक विधान हमारे लिए कृपामय है’ जब ऐसा पक्का निश्चय हो जाता है, तब ‘दुःख’ शब्द हमारे लिए निरर्थक-सा हो जाता है | माता जब हमारे मनोनुकूल भोजन खिलाती है, उस समय जिस प्रकार हम प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जब हमें ज्वर आता है और माता कड़वी औषध पिलाती है, उस समय भी हमें (यदि हम समझदार हैं तो उतनी ही) प्रसन्नता होती है; क्योंकि हम जानते हैं कि वह हमारे हित के लिए है | इसलिए अनुकूल दीख पड़े या प्रतिकूल-दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ अपने हित के लिए है -ऐसा जिसको ईश्वर के विधान में विश्वास है, उसके लिए संसार में दुःख-जैसी कोई वस्तु नहीं होती, उसके लिए तो प्रत्येक परिस्थिति ही अनुकूल है-सुखमय है |
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विवेकके बिना केवल क्रियासे अन्तःकरणकी शुद्धि नहीं होती* । शक्ति विवेकमें है, क्रियामें नहीं । क्रिया करनेमें करणकी मुख्यता रहेगी तो करणका आदर होगा । करणका आदर (महत्त्व) ही अन्तःकरणकी अशुद्धि है ।

अन्तःकरणकी अशुद्धि वास्तवमें कर्ताकी अशुद्धि है;क्योंकि कर्ताका दोष ही करणमें आता है । जैसे, मनुष्य चोरी करनेसे चोर नहीं बनता, प्रत्युत चोर बनकर चोरी करता है । चोरी करनेसे उसका चोरपना दृढ़ होता है । अगर कर्ताकी नीयत शुद्ध हो तो वह चोरी नहीं कर सकता । अत: करणको शुद्ध करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी कर्ताको शुद्ध होनेकी आवश्यकता है । अगर करणको शुद्ध करेंगे तो परिणाममें क्रिया शुद्ध होगी, कर्ता कैसे शुद्ध होगा ? जैसे,कलम बढ़िया होगी तो लेखन-कार्य बढ़िया होगा, लेखक कैसे बढ़िया हो जायगा ? कर्ता शुद्ध होता है‒अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर और अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है-विवेकका आदर करनेसे ।

एक मार्मिक बात है कि अन्तःकरण अशुद्ध होनेपर भी विवेक जाग्रत् हो सकता है । इसीलिये गीतामें आया है कि पापी-से-पापी और दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी ज्ञान और भक्ति प्राप्त कर सकता है† । तात्पर्य है कि अपने कल्याणका दृढ़ उद्देश्य हो जाय तो पूर्वकृत पाप विवेककी जागृतिमें बाधक नहीं हो सकते । पाप तभी बाधक हो सकते हैं, जब विवेक कर्मोंका फल हो । परन्तु विवेक कर्मोंका फल है ही नहीं । कर्मोंके साथ विवेकका सम्बन्ध है ही नहीं । अत: विवेकका पापोंसे विरोध नहीं है । इसलिये साधकको चाहिये कि वह अपने विवेकको जाग्रत् करे ।

प्रश्न‒विवेक कैसे जाग्रत् होता है ?

उत्तर‒विवेक दो चीजोंसे जाग्रत् होता है‒सत्संगसे‡और दुःख (आफत) से । सत्संग परमात्मामें लगाता है और दुःख संसारसे हटाता है । परमात्मामें लगना भी योग है‘समत्वं योग उचते’ (गीता २ । ४८) और संसारसे हटना भी योग है ‘तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योग सञ्ज्ञितम्’ (गीता ६ । २३) ।

रामचरितमानसमें आया है‒‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ (१ । ३ । ४) । इसका तात्पर्य यह है कि सत्संगके बिना विवेक जाग्रत् नहीं होता । सत्संगसे बहुत विलक्षण लाभ होता है और स्वाभाविक शुद्धि होती है ।

Om Namah Shivay

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