चित्त की अशुद्धि

चित्त की अशुद्धि के अनेक कारण होते हैं, और उसकी शुद्धि के उपाय भी अनेक हैं | उनमें से एक प्रधान कारण अभिमान भी है | अभिमान उसे कहते हैं, जिससे मनुष्य किसी प्रकार के गुण के साथ अपनी एकता करके अपने को दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानने लगता है | इस अभिमान के कारण मनुष्य जिनमें उस गुण का अभाव या कमी देखता है, उनको तुच्छ समझकर उनसे घृणा करने लगता है और जिनमें अपने से अधिक देखता है, उनसे ईर्ष्या करने लगता है | इस प्रकार घृणा और ईर्ष्या के कारण उसका चित्त अशुद्ध हो जाता है |

गुण के अभिमान से मनुष्य को अपने दोषों का दर्शन नहीं होता | अतः वह उनको हटा नहीं सकता | गुणों का अभिमान स्वयं ही एक बड़ा भारी दोष हैं | उसके रहते हुए दूसरे दोषों का नाश कैसे किया जा सके | सन्तो का कहना है कि अभिमानी योगी से पश्चात्ताप करनेवाला पापी अच्छा है; क्योंकि अच्छाई का अभिमान ही बुराई का मूल है |

जो मनुष्य यह समझता है कि मैं सत्यवादी हूँ, उसमें कहीं-न-कहीं झूठ छिपा हुआ है | यदि वह सचमुच सत्यवादी हो तो उसे यह भास ही नहीं होना चाहिए कि मैं सत्यवादी हूँ | अपितु सत्य बोलना उसका जीवन बन जाना चाहिए | जो गुण साधक का जीवन बन जाता है उसमें साधक का अभिमान नहीं होता | वह उसके कारण अपने में किसी प्रकार कि विशेषता का अनुभव नहीं करता | जबतक किसी गुण का गुणबुद्धि से भास होता है, उसमें रसका अनुभव होता रहता है, तबतक मनुष्य में अनेक प्रकार के दोषों की उत्पत्ति होती रहती है, अतः गुण के अभिमान से चित्त अशुद्ध होता रहता है |

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* भगवत्प्राप्ति के जितने भी साधन हैं, उन सबमें उत्तम-से-उत्तम साधन है- भगवान् को हर समय याद रखना | इसके समान और कोई साधन है ही नहीं | चाहे कोई उत्तम-से-उत्तम भी कर्म हो, पर वह भगत्स्मृति के समान नही है |चाहे भक्ति का मार्ग हो, चाहे ज्ञान का, चाहे योग का | सभी मार्गों में भगवान् की स्मृति की ही परम आवश्यकता है |

* चाहे कोई कैसा भी पापी-से-पापी भी क्यों न हो, उसका भी कल्याण हो सकता है | केवल शर्त यही है कि अबसे लेकर मृत्युपर्यंत भगवान् को भूले ही नहीं | भगवान् को हर समय याद रखना ही सबसे बढ़कर उपाय है |

* समय बहुत कम रह गया है-ऐसा समझकर घबराये नहीं कि अब कल्याण कैसे होगा | अबसे लेकर मरणपर्यंत जो भी समय है, उसमें भगवान् को नहीं भूलना चाहिए | हर समय भगवान् को पकड़ें रखना चाहिए | भगवान् को निरंतर याद रखना ही उनको पकड़े रखना है | भगवान् को पकड़ें रखोगे तो फिर तुम्हारे कल्याण में कोई शंका नहीं है | यमराज की भी सामर्थ्य नहीं, जो तुम्हें नरक में ले जा सके |

* मनुष्य-शरीर पाकर यदि परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई, उनका तत्त्वज्ञान नहीं हुआ तो यह जन्म ही व्यर्थ गया | मानवजन्म का समय बहुत ही दामी है, इसको सोच-सोचकर बिताना चाहिए |

Om Namah Shivay

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