मनुष्य का कर्तव्य

यदि मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार इस लोक और परलोक में लाभ देनेवाले कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता तो इसको उसकी मूर्खता, अकर्मण्यता और आलस्य के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है ? जो जान-बूझकर प्रमाद, आलस्य, निद्रा और भोगों से चित्त को हटाकर उसे सन्मार्ग में नहीं लगाता और पतन के मार्ग में आगे बढ़ता जाता है वह स्वयं ही अपना शत्रु है | श्रुति कहती है—

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः |
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ||
(केनोपनिषद २ | ५)

‘यदि इस मनुष्य-शरीर में उस परमात्म-तत्त्व को जान लिया जायगा तो सत्य है यानी उत्तम है | और यदि इस जन्म में उसकों नहीं जाना तो महान हानि है | धीर पुरुष सम्पूर्ण भूतों में परमात्मा का चिंतन कर—परमात्मा को समझकर इस देह को छोड़ अमृत को प्राप्त होते हैं अर्थात् इस देह से प्राणों के निकल जानेपर वे अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं |’

मनुष्य को अपनी उन्नति का यह मार्ग स्वयं ही चलकर तय करना पड़ता है , दूसरे के द्वारा यह मार्ग तय नहीं होता | अतएव उसकी इसी में बुद्धिमत्ता और कल्याण है, और यही उसका निश्चित कर्तव्य है कि अत्यन्त सावधानी के साथ प्रतिक्षण अपने को सम्भालते हुए इस लोक और परलोक के कल्याणकारी साधन को खूब जोर के साथ करता रहे | प्रमाद, आलस्य , भोग एवं दुराचार आदि को कल्याण के मार्ग में अत्यन्त बाधक समझकर उन्हें सर्वथा त्याग दे | श्रुति चेतावनी देती हुई कहती है—

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत |
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ||
(कठोपनिषद ३ | १४)

‘उठो, जागो और महापुरुषों के समीप जाकर उनके द्वारा तत्त्वज्ञान के रहस्य को समझो | कविगण इसे तीक्ष्ण क्षुर के धार के समान अत्यंत कठिन मार्ग बताते हैं |’ परन्तु कठिन मानकर हताश होने की कोई आवश्यकता नहीं | भगवान् में चित्त लगाने से भगवत्कृपा से मनुष्य सारी कठिनाइयों से अनायास ही तर जाता है ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |’ भगवान् ने और भी कहा है—

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ||
(गीता ७ | १४)

‘यह मेरी अलौकिक—अति अद्भुत त्रिगुणमयी योगमाया बहुत दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष मेरी ही शरण हो जाते हैं वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से सहज ही तर जाते हैं |’ सब देशों और समस्त पदार्थों में सदा-सर्वदा भगवान् का चिंतन करना और भगवान् की आज्ञा के अनुसार चलना ही शरणागति समझा जाता है | इसी को ईश्वर कि अनन्य भक्ति भी कहते हैं | अतएव जिसका ईश्वर में विश्वास हो, उसके लिए तो ईश्वर का आश्रय ग्रहण करना ही परम कर्तव्य है | जो भलीभांति ईश्वर के शरण हो जाता है, उससे ईश्वर के प्रतिकूल यानी अशुभ कर्म तो बन ही नहीं सकते | वह परम अभय पद को प्राप्त हो जाता है, उसके अंतर में शोक-मोह का आत्यन्तिक अभाव रहता है, उसको सदा के लिए अटल शांति प्राप्त हो जाती है और उसके आनंद का पार ही नहीं रहता | उसकी इस अनिर्वचनीय स्थिति को उदाहरण, वाणी या संकेत के द्वारा समझा या समझाया नहीं जा सकता | ऐसी स्थितिवाले पुरुष स्वयं ही जब उस स्थिति का वर्णन नहीं कर सकते तब दूसरों की तो बात ही क्या है ? मन-वाणी की वहाँ तक पहुँच ही नहीं है | केवल पवित्र हुई शुद्ध बुद्धि के द्वारा पुरुष इसका अनुभव करता है | ऐसा वेद और शास्त्र कहते हैं—

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते |
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ||
(कठोपनिषद १ | ३ | १२)

‘सम्पूर्ण भूतों के हृदय में छिपा हुआ यह आत्मा सबकों प्रतीत नहीं होता, परन्तु यह सूक्ष्मबुद्धिवाले महात्मा पुरुषों से तीक्ष्ण और सूक्ष्मबुद्धि के द्वारा ही देखा जाता है |’ भगवान् स्वयं कहते हैं—

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतिन्द्रियं |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ||
(गीता ६ | २१)

‘इन्द्रियों से अतीव केवल शुद्ध हुई सूक्ष्मबुद्धि द्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनंत आनंद है उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत्स्वरूप से चलायमान नहीं होता |’उसी अवस्था को प्राप्त करने की चेष्टा मनुष्यमात्र को करनी चाहिए, यही सबका परम कर्तव्य है |

Om Namah Shivay

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