शरीर और स्वयं (शरीरी)

प्रत्येक मनुष्य के अनुभव में दो वस्तुएँ आती हैं‒एक शरीर और एक वह स्वयं (शरीरी) । शरीर संसार का अंश है और स्वयं परमात्मा का अंश है । शरीर की संसार से और स्वयं की परमात्मा से सजातीयता अर्थात् सधर्मता है । इसलिये शरीर संसार का तथा संसार के लिये है और स्वयं परमात्मा का तथा परमात्मा के लिये है । शरीरपर हमारा कोई आधिपत्य (वश) नहीं चलता । इसको हम अपने इच्छानुसार बदल नहीं सकते, इच्छानुसार रख नहीं सकते, इच्छानुसार बना नहीं सकते । इसलिये यह हमारा और हमारे लिये हो ही नहीं सकता । शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, बल, विद्या, योग्यता आदि जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब संसार का और संसार के लिये ही है । जब शरीर हमारा और हमारे लिये है ही नहीं, तो फिर उसमें हमारी आसक्ति कैसे हो सकती है ? मोह कैसे हो सकता है ? ममता कैसे हो सकती है ? नहीं हो सकती । अपने साथ शरीर की एकता मानने से आसक्ति का त्याग हो ही नहीं सकता, और संसार के साथ शरीर की एकता मानने से आसक्ति हो ही नहीं सकती । कारण कि संसार के साथ सम्बन्ध मान लेने से अपना सम्बन्ध (शरीर में अपनापन) छूट जाता है । अतः साधक का खास काम केवल इतना ही है कि वह संसार की वस्तु संसार को दे दे और भगवान्‌ की वस्तु भगवान्‌ को दे दे । फिर कामना, ममता, आसक्ति कौन करेगा, किसमें करेगा, कैसे करेगा और क्यों करेगा ? संसार की वस्तु संसार को दे दें तो मुक्ति प्राप्त हो जायगी और भगवान्‌ की वस्तु भगवान्‌ को दे दें तो भक्ति प्राप्त हो जायगी ।

मनुष्य से यह बहुत बड़ी गलती होती है कि वह शरीर को, जो कि संसार की वस्तु है, अपना मान लेता है । संसार की वस्तु को अपना मान लेना बेईमानी है और इसी बेईमानी का दण्ड है‒जन्म-मृत्युरूप महान् दुःख । वास्तव में संसार की वस्तु शरीर को अपना और अपने लिये मानना मूल भूल है और इस मूल भूल को मिटाने के लिये साधक को तीन काम करने होंगे‒

(१) सीधे-सरलभाव से अपनी भूल स्वीकार करना कि संसार की वस्तु को अपना मानकर वास्तव में मैंने बहुत बड़ी भूल की ।

(२) अपनी भूल का दुःख (पश्चात्ताप) करना कि मनुष्य होकर, समझदार होकर, ईमानदार होकर ऐसी भूल मेरे को नहीं करनी चाहिये थी ।

(३) ऐसा निक्षय करना कि अब आगे मैं ऐसी भूल पुनः नहीं करूँगा अर्थात् शरीर को अपना और अपने लिये कभी नहीं मानूँगा ।

इसके बाद साधक का खास कर्तव्य है कि वह ईमानदारी के साथ संसार की वस्तु को संसार की ही मानकर उसकी सेवा में लगा दे और भगवान्‌ की वस्तु को अर्थात् अपने-आपको भगवान्‌ का ही मानकर भगवान्‌ के समर्पित कर दे ।

Om Namah Shivay

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