भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है-4

अष्टसिद्धि के प्रदाता भैरवनाथ के मुख्यत:आठ स्वरूप ही सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं पूजित हैं। इनमें भी काल भैरव तथा बटुक भैरव की उपासना सबसे ज्यादा प्रचलित है। काशी के कोतवाल कालभैरव की कृपा के बिना बाबा विश्वनाथ का सामीप्य नहीं मिलता है। वाराणसी में निíवघ्न जपतप, निवास, अनुष्ठान की सफलता के लिए कालभैरव का दर्शनपूजन अवश्य करें। इनकी हाजिरी दिए बिना काशी की तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं होती। इसी तरह उज्जयिनी के कालभैरव की बडी महिमा है। महाकालेश्वर की नगरी अवंतिकापुरी(उज्जैन) में स्थित कालभैरव के प्रत्यक्ष मद्यपान को देख कर सभी चकित हो उठते हैं।

धर्मग्रन्थों के अनुशीलन से यह तथ्य विदित होता है कि भगवान शंकर के कालभैरवस्वरूपका आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकालव्यापिनी अष्टमी में हुआ था, अतयह तिथि कालभैरवाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन भैरवमंदिरों में विशेष पूजन और श्रृंगार बडे धूमधाम से होता है। भैरवनाथ के भक्त कालभैरवाष्टमी के व्रत को अत्यन्त श्रद्धा के साथ रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारम्भ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषव्यापिनी अष्टमी के दिन कालभैरव की पूजा, दर्शन तथा व्रत करने से भीषण संकट दूर होते हैं और कार्यसिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।

ज्योतिषशास्त्र की बहुचíचत पुस्तक लाल किताब के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है।  भैरवाष्टमी के दिन भैरवनाथके व्रत एवं दर्शनपूजन से शनि की पीडा का निवारण होगा। कालभैरवकी अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढे साती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति इस कालभैरवाष्टमी से प्रारम्भ करके वर्ष पर्यन्त प्रत्येक कालाष्टमी को व्रत रखकर भैरवनाथ की उपासना करें।

कालाष्टमी में दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकाल में भैरवनाथ की पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। मन्त्रविद्या की एक प्राचीन हस्त लिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला हैॐहंषंनंगंकंसं खंमहाकालभैरवायनम:

इस मंत्र का 21 हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।। साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करे।

साम्बसदाशिव की अष्टमूíतयों में रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्त्‍‌ के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथ भी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरवजी कलियुग के जाग्रत देवता हैं। भक्तिभाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।

इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथ अपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं। 

Om Namah Shivay

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