श्री गणेश के इन 8 रूपों से जुड़ी अनूठी बातें

1.वक्रतुण्ड – श्री गणेश के इस रूप में मुड़ी हुई सूंड होती है। यह तमाम बाधाओं और कलह का नाश करते हैं।

2.एकदंत – इस रूप में श्री गणेश का एक ही दांत होता है। यह लालच, अहंकार, आसक्ति और दंभ को चूर करते हैं। यह बुद्धिदाता होते हैं।

3. महोदरा – श्री गणेश के इस रूप में बडे उदर यानी पेट वाले होते हैं, जो सुख-समृद्धि और आनंद देते हैं। भूमि-संपत्ति संबंधी बाधा को दूर करते हैं।

4. गजानन – श्री गणेश इस रूप का अर्थ होता है हाथी जैसे मुख वाले धन, दौलत, ऐश्वर्य और कार्य दक्षता और सिद्धि देते हैं। यह शांत और पुरूषार्थी बनाते हैं।

5. लम्बोदर – श्री गणेश के इस रूप का अर्थ होता है- लम्बे पेट वाले। क्रोध व अधर्म को अंत करते हैं।

6. विकट – विपदाओं व संकट के साथ शत्रुभय दूर करते हैं। यह संकटनाशक रूप माना जाता है।

7. विघ्रराज – इस रूप में गणेश कमल के फूल पर विराजित होते हैं। सभी विघ्रों का नाश करते हैं और शुभ कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर रखते हैं।

8. धूम्रवर्ण – श्री गणेश इस रूप में धुएं की तरह रंगवाले होते हैं। हर काम में सफलता देते हैं। दुष्प्रवृत्तियों का नाश करते हैं। ग्रहदोष शांति के लिए इनकी पूजा का महत्व है।
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जो लिंग देवगुरु बृहस्पति एवं देव-श्रेष्ठ इन्द्रादि के द्वारा पूजित, निरंतर नंदनवन के दिव्य पुष्पों द्वारा अर्चित, परात्पर एवं परमात्मास्वरूप है, उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ।
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जिस प्रकार चंद्रमा और सूर्य के बिना सारा संसार अन्धकार मय हो जाता है अर्थात अंधे के समान कुछ भी नहीं देख पाता, उसी प्रकार मनुष्य पुराण के बिना अज्ञानान्धकार में पड़ा रहता है, अतः सर्वदा इनका स्वाध्याय करना चाहिये । विशेषतः कलयुग में पुराण श्रवण को छोड़ कर पुरुष के लिए सिद्धि और मोक्ष प्रदान करनेवाला कोई और धर्म – उपाय नहीं है । जो पुण्य -शीलों, यज्ञकर्ताओं और तपस्वियों की गति कही गयी है, वही गति पुराण-श्रोताओं को बड़ी सरलता से अनायास ही प्राप्त हो जाती है । पुराणों के श्रवण से सारे पापों का क्षय होता है, धर्म की अभि-वृद्धि होती है और मनुष्य ज्ञानी होकर संसार में पुनर्जन्म नहीं लेता । इसलिए प्रयत्न पूर्वक पुराणों का श्रद्धा से श्रवण करना चाहिए।
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जब मनुष्य सभी प्राणियों के प्रति मन, वचन तथा कर्म से पापमय भाव नहीं रखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है । जब वो दूसरे से डरता नहीं, दूसरे लोग भी उससे नहीं डरते,जब वह (दूसरे की) निंदा नहीं करता तथा उससे द्वेष नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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यदि कोई एक क्षण या एक मुहूर्त भी शिव का चिंतन नहीं करता, तो वही (उसकी) महान हानि है, वही उसका दोष है, वही उसका अज्ञान है और वही उसकी मूकता है । जो लोग शिव-भक्ति में संलग्न है, अंतःकरण से शिव को प्रणाम करनेवाले हैं तथा भगवान् शिव के स्मरण में लगे हुए हैं, वे दुःख के पात्र नहीं होते ।
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मन, वाणी तथा कर्म से जो किसी की हिंसा नहीं करता अर्थात उन्हें दुःख नहीं पहुंचाता, ऐसे अहिंसक व्यक्ति की सभी प्राणी सदा रक्षा करते हैं और जो हिंसक हैं, उसे (सभी) कष्ट पहुंचाते हैं । मन, वचन तथा कर्मसे सभी प्राणियों के हित में संलग्न और दयादृष्टि के मार्ग पर चलनेवाले रुद्रलोक को जाते हैं ।

Om Namah Shivay

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