यहां स्थित हैं दुर्योधन और कर्ण के मंदिर, की जाती है उनकी पूजा-2

लेकिन यह मंदिर क्यों बने इसके पीछे भी एक कहानी है। दरअसल सारनौल और सौर गांव की यह भूमि भुब्रूवाहन नाम के एक महान योद्धा की धरती है।

भुब्रूवाहन को अमूमन लोग नहीं जानते, क्योंकि महाभारत का विशेष पात्र बनने से स्वयं श्रीकृष्ण ने ही उसे रोका था। एक कथा के अनुसार कहते हैं कि पाताल लोक का राजा भुब्रूवाहन द्वापरयुग में कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध का हिस्सा बनना चाहता था। मन में यही चाहत लिए वह धरती पर आया, लेकिन भगवान कृष्ण ने बड़ी ही चालाकी से उसे युद्ध से दूर कर दिया, पर क्यों!

क्योंकि श्रीकृष्ण पाताललोक के इस राजा की क्षमता को जान चुके थे। दरअसल भुब्रूवाहन कौरवों की तरफ से युद्ध में शामिल होना चाहता था और श्रीकृष्ण यह जान चुके थे कि यदि भुब्रूवाहन कौरवों की ओर युद्ध में आया तो बड़ी आसानी से अर्जुन को चुनौती दे सकता है, अंतत: उन्होंने भुब्रूवाहन को एक ऐसी चुनौती दी जिसे वह पूरा नहीं कर सका।

इस चुनौती के मुताबिक श्रीकृष्ण ने भुब्रूवाहन से कहा कि वह एक ही तीर से सामने दिखाई दे रहे पेड़ के सभी पत्तों को छेद दे, यदि वह ऐसा करने में सफल हुआ तो वे उसे युद्ध का हिस्सा बनने देंगे। लेकिन इस बीच श्रीकृष्ण ने एक पत्ता तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया।

भुब्रूवाहन का तीर पेड़ पर मौजूद सभी पत्तों को छेदने के बाद श्रीकृष्ण के पैर की तरफ बढ़ रहा था, तभी उन्होंने अपना पैर हटा लिया। कृष्ण किसी भी तरह भुब्रूवाहन को युद्ध से दूर रखना चाहते थे और उन्होंने उसे निष्पक्ष रहने को कहा।

निष्पक्ष रहने का अर्थ युद्ध से दूर रहना था और महाभारत के युद्ध से दूर रहना किसी भी योद्धा को मंजूर नहीं होता, इसलिए कृष्ण ने भुब्रूवाहन से पार पाने का रास्ता निकाल लिया। उन्होंने किसी तरह भुब्रूवाहन का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।

हालांकि कृष्ण ने युद्ध शुरू होने से पहले ही भुब्रूवाहन का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन उसने युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की और भगवान कृष्ण ने उसकी इच्छा पूरी की। श्रीकृष्ण ने भुब्रूवाहन के सिर को एक पेड़ पर टांग दिया और उसने यहीं से महाभारत का पूरा युद्ध देखा।

स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कहानी के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान जब-जब कौरवों की रणनीति विफल होती, जब-जब उन्हें हार का मुंह देखना पड़ता, तब भुब्रूवाहन जोर-जोर से चिल्ल कर उनसे रणनीति बदलने के लिए कहता था। कहते हैं कि वो कौरवों की हार देखकर रोता था और आज भी रो ही रहा है।

दोनों गांव के समीप एक नदी है और ऐसा माना जाता है कि यह नदी भुब्रूवाहन के आंसुओं के कारण ही बनी थी। इसे तमस या टोंस नदी के नाम से जाना जाता है। इसी मान्यता के कारण इस नदी का पानी कोई नहीं पीता।

उत्तरकाशी के लोकगीतों में दुर्योधन के साथ ही भब्रूवाहन और कर्ण की प्रशंसा की जाती है। उन्हें देवताओं के समान पूजा जाता है।

Om Namah Shivay

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