वैराग्य -१४-A

यहाँ यह बात ध्यान देनेकी है कि प्रहलादजी ने पिता की आज्ञा का त्याग किस विषय में, किस अंश में किया? हिरण्यकशिपु प्रहलादजी को बहुत कष्ट देता था, पर प्रहलादजी उसको प्रसन्नतापूर्वक सहते थे। वे इस बात को मानते थे कि यह शरीर पिताका है; अत; वे इस शरीरको चाहे जैसा रखें, इसपर उनका पूरा अधिकार है। इसीलिये उन्होंने पिताजीसे कभी यह नहीं कहा कि आप मेरेको कष्ट क्यों दे रहे हैं? परन्तु मैं साक्षात्परमात्माका अंश हूँ; अत: मैं भगवान्की सेवामें, भजनमें लगा हूँ; पिताजी इसमें बाधा देते हैं, मुझे रोकते हैंयह उचित नहीं है। इसलिये प्रहलादजीने पिताजीकी उस आज्ञा का त्याग किया, जिससे उनको नरक हो जाय। अगर वे पिताजीकी आज्ञा मानकर भगवद्भक्तिका त्याग कर देते तो इसक दण्ड पिताजीको भोगना पड़ता। पुत्र के द्वारा ऐसा कोई भी काम नहीं होना चाहिये, जिससे पिताको दण्ड भोगना पड़े। इसी दृष्टिसे उन्होंने पिताकी आज्ञा मानकर पिताका हित ही किया।” 

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भयंकर से भयंकर परिस्थिति जाय, तब भी कह दो-“आओ मेरे प्यारे! आओ, आओ, आओ। तुम कोई और नहीं हो। मैं तुम्हें जानता हूँ। तुमने मेरे लिये आवश्यक समझा होगा कि मैं दु: के वेश में आऊँ, इसलिये तुम दु: के वेश में आये हो। स्वागतम्!वैलकम्! आओ आओ चले आओ!” आप देखेंगे कि वह प्रतिकूलता आपके लिये इतनी उपयोगी सिद्ध होगी कि जिस पर अनेकों अनुकूलतायें निछावर की जा सकती है।

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वैराग्य१४-A

परमात्मा के नामजप और उनके स्वरुप का निरन्तर स्मरण करते रहने से ह्रदय का मल ज्योज्यो दूर होता है, त्योंत्यों उसमे उज्ज्वलता आती है | ऐसे उज्जवल और शुद्ध अन्त:करण में वैराग्य की लहरें उठती है, जिनसे विषयानुराग मनसे स्वयमेव ही हट जाता है | इस अवस्था में विशेष विचार की आवश्यकता नहीं रहती | जैसे मैल दर्पण को रूईसे घिसने पर ज्योंज्यों उसका मैल दूर होता , त्योंहीत्यों वह चमकने लगता है और उसमे मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखलाई पडता है, इसी प्रकार परमात्मा के भजनध्यानरुपी रूई की चालू रगड़ से अंत:करणरुपी दर्पण का मल दूर होने पर वह चमकने लगता है और उसमे सुखस्वरूप आत्मा का प्रतिबिम्ब दीखने लगता है | ऐसी स्थिती में जरासा भी बाकी रहा हुआ विषयमलका दाग साधक के हृदय में शूल सा खटकता है | अतएव वह उत्तरोतर अधिक उत्साह के साथ उस दाग को मिटाने के लिए भजनध्यान में तत्पर होकर अन्तमें उसे सर्वथा मिटाकर ही छोड़ता है |

Om Namah Shivay

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