अमरता की चाह में बना था विष्णु का ये प्राचीन मंदिर-1

विश्व में अलगअलग धर्मों और संप्रदायों को मानने वाले लोग रहते हैं। सर्वोच्च सत्ता भले ही एक है लेकिन अलगअलग मान्यताएं होने की वजह से सभी का पूजा करने का तरीका और स्थान भी अलगअलग हैं। मसलन चर्च में जाकर ईसाइयों को अपने ईश्वर नजर आते हैं, वही ईश्वर हिन्दू मंदिर में भी मिलते हैं। मुसलमान मस्जिद जाकर अपने अल्लाह से मिलकर आता है तो सिख गुरुद्वारों की सीढ़ियों को स्वर्ग समझता है। जितने अलग लोग उतनी ही अलग उनकी आस्था।

इन्द्र का मंदिर

खैर, जहां बात आस्था की होती है वहां किसी भी प्रकार का तर्कवितर्क मायने नहीं रखता। इसलिए आज हम आपको एक ऐसे मंदिर की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि स्वयं देवराज इन्द्र ने महल के तौर पर अपने बेटे के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

अंगकोर वाट

कंबोडिया स्थित अंगकोर वाट के विषय में 13वीं शताब्दी में एक चीनी यात्री का कहना था कि इस मंदिर का निर्माण महज एक ही रात में किसी अलौकिक सत्ता के हाथ से हुआ था। यह सब तो इस महल रूपी मंदिर से जुड़ी लोक कहानियां हैं, असल में इस मंदिर का इतिहास बौद्ध और हिन्दू दोनों ही धर्मों से बहुत निकटता से जुड़ा है।

कंबोडिया

अंगकोर वाट नामक विशाल मंदिर का संबंध पौराणिक समय के कंबोदेश और आज के कंबोडिया से है। यह मंदिर मौलिक रूप से हिन्दू धर्म से जुड़ा पवित्र स्थल है, जिसे बाद में बौद्ध रूप दे दिया गया।

हिन्दू और बौद्ध

इतिहास पर नजर डाली जाए तो करीब 27 शासकों ने कंबोदेश पर राज किया, जिनमें से कुछ शासक हिन्दू और कुछ बौद्ध थे। शायद यही वजह है कि कंबोडिया में हिन्दू और बौद्ध दोनों से ही जुड़ी मूर्तियां मिलती हैं।

बौद्ध अनुयायी

कंबोडिया में बौद्ध अनुयायियों की संख्या अत्याधिक है इसलिए जगहजगह भगवान बुद्ध की प्रतिमा मिल जाती है। लेकिन अंगकोर वाट के अलावा शायद ही वहां कोई ऐसा स्थान हो जहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की मूर्तियां एक साथ हों।

विष्णु का मंदिर

इस मंदिर की सबसे बड़ी खास बात यह भी है कि यह विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर भी है। इसकी दीवारें रामायण और महाभारत जैसे विस्तृत और पवित्र धर्मग्रंथों से जुड़ी कहानियां कहती हैं।

विश्व धरोहर

विश्व धरोहर के रूप से पहचाने जाने वाले इस मंदिर को 12 शताब्दी में खमेर वंश से जुड़े सूर्यवर्मन द्वितीय नामक हिन्दू शासक ने बनवाया था। लेकिन चौदहवीं शताब्दी तक आतेआते यहां बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों का शासन स्थापित हो गया और मंदिर को बौद्ध रूप दे दिया गया।

Om Namah Shivay

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