वैराग्य -१४-B

ज्यो-ज्यों भजन-ध्यान से अंत:करणरुपी दर्पण की सफाई होती है, त्यों-त्यों साधक की आशा और उसका उत्साह बढ़ता रहता है, भजन-ध्यानरुपी साधन-तत्व को न समझने वाले मनुष्य को ही भाररूप प्रतीत होता है | जिसको इसके तत्व का ज्ञान होने लगता है, वह तो उत्तरोतर आनन्द की उपलब्धि करता हुआ पूर्णानन्दकी प्राप्ति के लिए भजन-ध्यान बढाता ही रहता है | उसकी दृष्टी में विषयों में दीखने वाले विषय-सुख की कोई सत्ता ही नहीं रह जाती | इससे उसे दृढ वैराग्य की बहुत शीघ्र प्राप्ति हो जाती है |

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भारतवर्ष आज गरीबों का देश है | करोड़ों नर-नारी ऐसे है, जिनको भर पेट अन्न और लज्जा-निवारण के लिये पर्याप्त वस्त्र नहीं मिलता | ऐसी दशा में जो संपन्न भारतवासी, इन गरीब भाइयो के दुःखकी कुछ भी परवा न करके अपने शरीर और परिवार को आराम पहुचाने में व्यस्त रहते है, उन्हें कुछ विचार करना चाहिये | शास्त्रों में यज्ञसे बचे हुए अन्न को अमृत बतलाया हैं और वैसे अमृतरूप पवित्र अन्न पर जीवन-धारण करने वाले को ब्रह्म की प्राप्ति होती है, ऐसा कहा है | मेरी समझ में इन भूखे भाइयों और बहिनों के पेट में जो क्षुधा का दावानल धधक रहा है, उसी में अन्न की आहुति देनी चाहिये, तभी हमारा शेष अन्न अमृत होगा | मतलब यह की हम जो कुछ भी उपार्जन करे; उसमे से कुछ भाग इन गरीब भाहियों के हितार्थ पहले व्यय करे, तभी हमारा उपार्जन सार्थक है |

Om Namah Shivay

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