ब्राह्मणत्व की रक्षा परम आवश्यक है -६-

‘समस्त भूतो में स्थावर (वृक्ष) श्रेस्ठ है । उनसे सर्प आदि कीड़े श्रेस्ठ है । उनसे बोध्युक्त प्राणी श्रेस्ठ है । उनसे मनुष्य और मनुष्यों में प्रथमगण श्रेस्ठ है । प्रथमगण से गन्धर्व और गन्धर्वो से सिद्धगण,सिद्धगण से देवताओ के भर्त्य किन्नर आदि श्रेस्ठ है ।

किन्नरों और असुरो की अपेक्षा इन्द्र आदि देवता श्रेस्ठ है । इन्द्रादि देवताओ से दक्ष आदि ब्रह्मा के पुत्र श्रेस्ठ है । दक्ष आदि की अपेक्षा शंकर श्रेस्ठ है और शंकर ब्रह्मा के अंश है इसलिए शंकर से ब्रह्मा श्रेस्ठ है । ब्रह्मा मुझे अपना परम आराध्य परमेश्वर मानते है ।

इसलिए ब्रह्मा से में श्रेस्ठ हु और मैं दिज देव ब्राह्मण को अपना देवता या पूजनीय समजह्ता हु । इसलिए ब्राह्मण मुझसे भी श्रेस्ठ है । इस कारण ब्राह्मण सर्व पूजनीय है, हे ब्राह्मणों ! में इस जगत में दुसरे किसी की ब्राह्मणों के साथ तुलना भी नहीं करता फिर उससे बढ़ कर तो किसी को मान ही कैसे सकता हु ।

ब्राह्मण क्यों श्रेस्ठ है ?

इसका उत्तर तो यही है की मेरे ब्राह्मण रूप मुख में जो श्रधापूर्वक अर्पण किया जाता है (ब्राह्मण भोजन कराया जाता है) उससे मुझे परम तृप्ति होती है; यहाँ तक की मेरे अग्निरूप मुख में हवन रूप करने से भी मुझे वैसी तृप्ति नहीं होती ।’ (श्री मदभागवत ५ । ५ । २१-२३) ।

Om Namah Shivay

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