वर्तमान दोषों के निवारण की आवश्यकता -६-

आचार-विचार भी दिन-पर-दिन नष्ट-भ्रष्ट होता जा रहा है । खान-पान विषयक शौचाचार तो होटलों और बाजारू दुकानों के कारण प्राय: नष्ट हो गया है । बहुत से होटलों में मछली, माँस, अंडा, मदिरा आदि घ्रणित पदार्थ भी शामिल रहते है, जो सर्वथा अपवित्र, शास्त्र-निषिद्ध और हिंसा-पूर्ण होने के कारण स्वास्थ्य और धर्म के लिए महान हानिकारक है; अत सर्वथा त्याज्य है ।

स्कूल-कॉलेज आदि शिक्षा-संस्थाओं में धर्मिक-शिक्षा न होने कारण बालकों में चन्चलता और उच्छृखलता भी बहुत बढ़ रही है । प्राचीनकाल में छात्रगण अपने आचार्य ऋषि-मुनियों का बहुत अधिक आदर-सत्कार, सेवा-पूजा किया करते थे; किन्तु इस समय विद्यार्थीगण अपने शिक्षकों का उस प्रकार का आदर-सत्कार-सम्मान नही करते; बल्कि कहीं-कहीं तो विद्यार्थी शिक्षकों का अपमान भी कर बैठते है । यह बहुत ही अनुचित है । विद्यार्थियों को अपने को शिक्षा देनेवाले अध्यापकों का सदा श्रद्धापूर्वक आदर-सत्कार-सम्मान करना चाहिये ।

Om Namah Shivay

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