May peace radiate

सृष्टि के पदार्थों में सन्तुलन बनाए रखने का उपदेश यजुर्वेद के एक मन्त्र में !!!

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:

पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।

वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:

सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

Om dyauh shaantih Antariksham shaantih

Prithivee shaantih Aapah shaantih

Oshadhayah shaantih Vanaspatayah shaantih

Vishvedevaah shaantih Brahma shaantih

Sarvam shaantih Shaantireva shaantih

Saamaa shaantiredhih

Om shaantih, shaantih, shaantih!

May peace radiate there in the whole sky as well as in the vast ethereal space everywhere.

May peace reign all over this earth, in water and in all herbs, trees and creepers.

May peace flow over the whole universe.

May peace be in the Supreme Being Brahman.

And may there always exist in all peace and peace alone.

Om peace, peace and peace to us and all beings!
यजु. ३६ .१७ ।

इस मन्त्र में मानव को प्राकृतिक पदार्थों में शान्ति अर्थात्‌ सन्तुलन बनाए रखने का उपदेश किया गया है। यजुर्वेद के इस मन्त्र में पर्यावरण समस्या के प्रति मानव को सचेत किया गया है। पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति आदि में शान्ति का अर्थ है- इनका सन्तुलन बने रहना। जब इनका सन्तुलन बिगड़ जाएगा, तभी इनमें विकार उत्पन्न हो जाएगा।

वेद में पृथिवी के पर्यावरण को परिष्कृत करने के साधन सार्वलौकिक तथा सार्वभौम हैं। दूषित पर्यावरण से विभिन्न संक्रामक रोग उत्पन्न होकर मानव के शरीर एवं मस्तिष्क में असाध्य रोग पैदा कर देते हैं। यह भी देखा जाता है कि कभी-कभी स्वतः नैसर्गिक प्रकुपित वायु, सूर्य, वर्षा तथा विद्युत के कारण भी पृथिवी के पर्यावरण में अन्तर आ जाता है। इन्हीं को शमन करने का उल्लेख यजुर्वेद के “शान्तिकरण’ मन्त्रों में पाया जाता है |

Om Namah Shivay

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http://www.vedic-astrology.co.in/

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